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हिन्दी साहित्य में उत्तरमध्यकाल

हिन्दी साहित्य में मध्यकाल के दो भागों में उत्तरार्ध को उत्तरमध्यकाल कहा जाता है। इसे रीतिकाल या श्रृंगारयुग के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रकार सन् 1658 से 1857 की अवधि हिन्दी साहित्य का उत्तरमध्यकाल माना जाता है।

इस काल का प्रारम्भ शाहजहां के शासनकाल की समाप्ति से होता है तथा अवसान भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम 1857 के विद्रोह के साथ होता है। यह मुगल शासन के क्रमशः पतन का काल है।

इसके प्रारम्भ काल में चिन्तामणि त्रिपाठी प्रमुख साहित्यकार थे और समाप्ति काल में प्रताप शाही।

1757 में पलासी के युद्ध के बाद अंग्रजी शासन, अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी संस्कृति का प्रभाव हिन्दी साहित्य में भी बढ़ता गया था।

यह काल भक्तिकाल की समाप्ति के बाद आया था परन्तु विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों, जैसे सगुण, निर्गुण , सूफी आदि, की परम्पराओं का विकास होता गया। राम और कृष्ण की उपासना में भी श्रृंगार का तत्व बढ़ता गया। ऐहिक दृष्टिकोण इस युग का प्रधान दृष्टिकोण बना। परम्परापालन और रूढ़िवादिता का यह दौर था तथा धीरे-धीरे बुद्धिवाद भी बढ़ता गया। इसके प्रभाव में हिन्दी भाषा का संस्कार और साहित्य का कलात्मक उत्कर्ष हुआ। ब्रजभाषा के स्वरूप में ही हिन्दी फली-फूली। महाराष्ट्र के पुणे, हैदराबाद से लेकर उत्तर भारत के कुमाऊं तक ब्रजभाषा को जानने समझने वाले लोग थे।


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