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हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल

हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ उन्नीसवीं शताब्दी से माना जाता है। अट्ठारवीं शताब्दी तक भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना हो चुकी थी और इसके साथ ही लोगों की चिंतन तथा सृजन प्रक्रिया बदलनी शुरु हुई। वास्तव में यह प्रक्रिया अट्ठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सन् 1707 में मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद ही स्थितियां बदलने लगी थीं। राजनीतिक और सामाजिक स्थितियां भी बदलीं, जिसमें 1757 के बाद अंग्रेजी राज में गति आयी।

प्रिंटिंग प्रेस के आने के कारण साहित्य तथा अन्य पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ी। समाचार पत्रों से भी साहित्य का विकास हुआ। खड़ीबोली में साहित्य की उपलब्धता बढ़ी जिसके कारण हिन्दी का पुराना साहित्य जो ब्रजभाषा या राजस्थानी या अन्य अपभ्रंश की भाषा में उपलब्ध था वह कम होते गया। आधुनिक हिन्दी भाषा खड़ी बोली वाली भाषा हो गयी जिसका प्रारम्भ पहले गद्य से ही हुआ। ऐसी आधुनिकता कलकत्ता सिविलाइजेशन और फोर्ट विलियम कॉलेज से प्रकट हुई। इसलिए अनेक विद्वान मानते हैं कि हिन्दी साहित्य में आधुनिकता गद्य लेखन से आयी। गद्य में कहानी, उपन्यास और अन्य पुस्तकों के अलावा समाचार पत्र, पत्रिकाएं आदि बहुतायत में उपलब्ध हुए इसलिए हिन्दी साहित्य के इतिहासकार इस आधुनिक काल को गद्यकाल भी कहते हैं।

अंग्रेजी और अंग्रेजी चिंतन धीरे-धीरे हिन्दी साहित्य में आया। इससे हिन्दी गद्य तथा पद्य दोनों प्रभावित हुए। हिन्दी साहित्य अपने बाह्य तथा आन्तरिक दोनों स्वरूपों में बदला।

आधुनिक हिन्दी साहित्य को कई भागों में बांटकर देखा जाता है।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध के हिन्दी साहित्य में ब्रजभाषा के काव्य की ही प्रमुखता रही। खड़ीबोली के गद्य का प्रारम्भ इसी काल से हुआ। इस गद्य ने अंग्रेजी के शब्दों तथा विचारों को आत्मासात करना प्रारम्भ किया।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ललित साहित्य की रचना शुरू हुई। हिन्दी साहित्य में इसे भारतेन्दु काल भी कहा जाता है। इसी काल में गद्य में नाटक, उपन्यास, निबंध, जीवनी, समालोचना आदि साहित्य के अनेक रूप सामने आये। कविता में ब्रजभाषा की प्रधानता कम होती गयी। खड़ी बोली में भी कविताएं आने लगीं। सन् 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना के साथ ही हिन्दी साहित्य का मिजाज बदला। भारतेन्दु का निधन 1885 में हुआ परन्तु साहित्य में उनका असर 1900 तक देखा गया। इसलिए 1850 से 1900 तक के काल को हिन्दी साहित्य का भारतेन्दु काल माना जाता है।

इसके बाद प्ररम्भ होता है हिन्दी साहित्य का द्विवेदी युग जो 1903 से सरस्वती पत्रिका में उनके सम्पादन का भार संभालने के साथ ही प्रारम्भ होता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी का युग प्रथम विश्वयुद्ध तक रहा। हिन्दी कहानी इसी युग की देन है तथा इसी युग में खड़ी बोली का व्यापक रूप से परिमार्जन हुआ। ब्रजभाषा का साहित्य लगभग समाप्त सा हो गया। ब्रजभाषा में केवल एक कवि रत्नाकर ही उच्च कोटि के कवि बचे।

सन् 1918 अर्थात् प्रथम विश्व युद्ध के बाद से लेकर 1936 तक में खड़ीबोली हिन्दी पूर्णतः स्थापित हो गयी। यही हिन्दी भाषा का आधुनिक स्वरूप है। इस युग को हिन्दी साहित्य का छायावादी और रहस्यवादी युग कहा जाता है। भारत की स्वतंत्रता के लिए चल रहे आन्दोलन का प्रभाव भी हिन्दी साहित्य पर पड़ा। प्राचीन मूल्यों का पुनर्मूल्यांन भी हुआ। साहित्य के अनेक विधाएं सामने आयीं जिनमें एकांकी नाटक भी एक है।

सन् 1936 के बाद से हिन्दी साहित्य में वामपंथी विचारचाराएं आने लगीं। ऐसे साहित्य को प्रगतिवादी साहित्य कहा गाया। परन्तु 1936 से 1945 तक के हिन्दी साहित्य में इतने प्रयोग किये गये कि उससे हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद का जन्म हुआ।

भारत की स्वतंत्रता के बाद हिन्दी साहित्य को और भी विस्तार हु्आ। नयी कविता, नयी कहानी, अकविता आदि स्वरूप सामने आये। लेखकों और कवियों ने स्वयं को अनेक पुरानी मान्यताओं से मुक्त किया तथा उनमें से कई तो स्वच्छन्दतावादी हो गये। इसका असर कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में देखा जाता है। साहित्य का सामाजिक संदर्भ आज व्यक्तिगत संदर्भ से पीछे हो गया दिख रहा है। यह व्यक्तिगत सन्दर्भ, व्यक्तिगत मनोदशा, संवेदना, और चेतना तक पहुंच गया है।

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