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सांझी मथुरा (भारत) की अद्भुत लोक कला है।

भारत में इस कला का आगमन कब हुआ- इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। संभव है कि मुस्लिम साम्राज्य से पूर्व चीन से आए यायावरों द्वारा, व्यापार-मार्ग के माध्यम से, यह भारत में आयी हो। यह निश्चिित है कि मुस्लिम साम्राज्य के समय ईरान व मध्य-पूर्व देशों से कलाकार आया करते थे तथा स्टेंशिल की सहायता से दीवारों, महलों के दरवाजों, गुबंदों, किलों व मस्जिदों को रंगीन ज्यामितीय आकृतियों से सजाया करते थे।


स्टेंसिल विधि संध्या यानी सांझ की बेला के कारण ही इस सजावट को साॅंझी कहा जाता है इसका उदय कब और कैसे हुआ, इसके निश्चित समय और स्थान के बारे में कुछ कह पाना संभव नहीं है। फिर भी उपलब्ध ऐतिहासिक ब्यौरों से ज्ञात होता है कि इसका आविष्कार 2000 से 3000 ईसा पूर्व के बीच चीन और रोम में हुआ। चीन और मध्य-पूर्व के बीच के व्यापार-मार्ग के माध्यम से यह कला शैली पहले पश्चिमी यूरोप पहुॅंची और फिर वहाॅं से अमरीका। बारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के बीच यह कला पश्चिमी यूरोप में बहुत प्रचलित थी और वहाॅं के लोग अपने आसपास के स्थानों को सजाने के लिए तथा चर्च, फर्नीचर इत्यादि को रंगने के लिए इस कला शैली का इस्तेमाल किया करते थे।

स्टंेसिल के द्वारा ही दीवारों पर सजाने के लिए कागजों को बनाया जाता था। स्टेंसिल के प्रचलन का कारण उसका सजावट करने का सरल व सस्ता तरीका था। बहुत से यायावर ‘स्टेंसिल कलाकारों’ द्वारा भी इस कला-विधि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुॅंचाया गया। भारत में इस कला का आगमन कब हुआ- इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। संभव है कि मुस्लिम साम्राज्य से पूर्व चीन से आए यायावरों द्वारा, व्यापार-मार्ग के माध्यम से, यह भारत में आयी हो। यह निश्चिित है कि मुस्लिम साम्राज्य के समय ईरान व मध्य-पूर्व देशों से कलाकार आया करते थे तथा स्टेंसिल की सहायता से दीवारों, महलों के दरवाजों, गुबंदों, किलों व मस्जिदों को रंगीन ज्यामितीय आकृतियों से सजाया करते थे।

स्टेेंसिल का प्रचलन हमारे देश में, विशेषतः मुस्लिम आबादी वाले शहरों में, अत्यधिक था। उत्तरप्रदेश, राजस्थान तथा गुजरात में इसका इस्तेमाल लोग बेहिचक किया करते थे। इसके कुछ उदाहरण जयपुर के आमेर के किले तथा उदयपुर में आज भी उपलब्ध हैं। वैष्णवों के मंदिरों में झूले को सजाने के लिए कागज अथवा केले के पत्तों से बने स्टेंसिल को प्रयोग किया जाता था। यह रंगोली की तरह की ही एक कला लगती है।

मथुरा व उसके आसपास की कृष्ण-भूमि में यह कला खूब मिलती है। भगवान कृष्ण के जीवन से जुडे़ उत्सवों को मनाने के लिए कृष्ण-जीवन से जुड़ी झाॅंकियों को प्रत्येक मंदिर व कभी-कभी कुछ घरों में भी बनाया जाता है। इन झाॅंकियों में कृष्ण-जन्म, बाल-कृष्ण का जेल से गमन, कृष्ण का माखनचोर रुप, गोवर्धन को उठाना, दान-लीला, कालिय मर्दन, होली प्रसंग, राधा-कृष्ण का झूला झूलना, चीरहरण, बाॅंसुरी-वादन इत्यादि प्रमुख हैं। स्टेंसिल द्वारा ऐसी सभी झाॅंकियों को विभिन्न रंगों में कलाकारों द्वारा सुंदर ढंग से बनाया जाता है। दिन भर यह कार्य होता है तथा संध्या समय लोगों के दर्शनों हेतु खोल दिया जाता है। संध्या यानी सांझ की बेला के कारण ही इस सजावट को साॅंझी कहा जाता है। क्योंकि संपूर्ण सजावट स्टेंसिल की सहायता से की जाती है, अतः लोगों ने स्टेंशिल को भी ‘साॅंझी’ नाम से पुकारना शुरु कर दिया। कुछ विद्वानों के मत से ‘साॅंझी’ शब्द ‘साॅंचा’ से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार की झाॅंकियाॅं विशेष रूप दशहरा से पूर्व कई दिनों तक मंदिरों में बनायी जाती हैं। साॅंझी-स्टेंसिल से झाॅंकी बनायी जाती है तथा नित्यप्रति नये-नये दृश्य देखते हैं।

जब लोग ब्रज-भूमि की 84 कोस /200 किलोमीटर/ लंबी परिक्रमा करते हैं, तो उनके आराम-स्थल पर रात के समय उनके लिए साॅंझी का निर्माण किया जाता है। कुछेक विशेष स्थलों पर भी साॅंझी को सजाया जाता है, जैसे गोर्वधन तथा बरसाने पर क्रमशः कृष्ण के पर्वत उठाने की तथा राधा व गोपियों संग लीला करते हुए होली खेलने की साॅंझी को बनाया जाता है।

अक्सर जल पर तैरती हुई साॅझी का भी निर्माण किया जाता है। इसके निर्माण में देवता के सम्मुख थाली रखी जाती है। सरसों के तेल की कुछ बॅंुदें थाली के नीचे बिखेर दी जाती हैं। यह तेल की बूॅंदें जल पर एक पतली पर्त का निर्माण करती हैं तथा उस पर एक कागज का कटा हुआ स्टेंसिल रख दिया जाता है। फिर कागज पर तरह-तरह के रंग बिखेरे जाते हैं और यह सूखे हुए रंग तेल की पर्त पर ठहर जाते हैं। पेपर-स्टेंसिल को सावधानी से उठाया जाता है ताकि रंगों मे हलचल न हो फिर थाली के कोनों से धीरे से पानी खिसकाया जाता है। पानी के मिलते ही तेल की पर्त, पानी से हल्की होने के कारण, उूपर आकर साॅंझी के बने हुए रंगीन दृश्य के साथ तैरने लगती हैै। तीन-चार थालियों में बने हुए अलग-अलग साॅंझी-दृश्य अत्यधिक लुभावने लगते हैं। आरती से समय कभी-कभी दीयों के साथ-साथ भक्त लोग साॅंझी को भी जलधार में अर्पित करते हैं। साॅंझी दृश्य को प्रस्तुत करने वाली थाली को धीरे से पानी में डुबो दिया जाता है तथा साॅंझी दृश्य नदी में तैरने लगता है। यमुना के किनारे खड़े लोग कई सौ जलते हुए दीयों के बीच तैरती हुई साॅंझी को देखकर प्रफुल्लित हो उठते हैं। ऐसे दृश्यों को देखने और सुनने को अंतर महसूस होता है। इसी प्रकार गाॅंव के भक्त-लोग भी साॅझी-स्टेंसिल खरीद कर अपने घरों की दीवारों को कृष्ण-जीवन संबंधी दृश्यों से सजाते हैं अथवा अपने आसपास के उदास वातावरण में रंगों से एक नया जीवन भरते हैंै।

कागज के स्टेंसिल बनाने की विधि बहुत सरल है। पहले अपनी मनपसंद तस्वीर को कागज पर उतारा जाता है। फिर संपूर्ण तस्वीर की रेखाओं के समानंतर एक रेखा लगभग 3/16 इंच की दूरी पर खींची जाती है। फिर दोनों समानंतर रेखाओं के बीच छोटे-छोटे पुल बनाये जाते हैं अर्थात उन्हें कहीं-कहीं से जोड़ा जाता है। इन पुलों को छोड़कर शेष भाग को काट दिया जाता है। शुरू-शुरू में स्टेंसिल पर ट्ेसिंग से भी चित्र उतारा जा सकता है परंतु अनुभवी कलाकार अपनी मनपसंद तस्वीर को ही कागज पर उतारता है। किसी भी कृति को अपनी सुविधानुसार घटा या बढ़ा कर स्टंेसिल पर उतारा जा सकता है। आजकल ‘फोटोकाॅपी’ की सुविधा से किसी भी आकृति को उतारना संभव हो गया है। विशेष रूप से काटने की कला में ही अभ्यास, तल्लीनता तथा धैर्य की आवश्यता होती है। काटने का कार्य तेज ब्लेड अथवा कैंची अथवा एक्स-एक्टो चाकू /माॅडल 11 या 16 अथवा शैफील्ड इंग्लैंड में बना स्टैनले मैट चाकू माॅडल 299 से किया जाता है। चित्र के छोटे होने अथवा उसमें कम पुलों के होने पर काटने का कार्य और भी नाजुक हो जाता है क्योंकि ऐसे में जरा-सी भूल से ही संपूर्ण आकृति का स्वरूप बिगड़ जाता है।
विदेशों में, विशेष रूप से जापान, चीन, स्विट्जरलैंड, फ्रांस एवं अमरीका मे, स्टंेसिल की कला से दीवारों, फर्शों, छतों, फर्नीचर, टेलीविजन इत्यादि को सजाया जाता है। भारत में भी अब यह कला विद्यालयों में पढ़ाई जा रही है और कुछ श्रेष्ठ कलाकारों ने अपना स्थान बनाया है। दिल्ली एयरपोर्ट पर टंगे हुए इस कला के कुछ सुंदर नमूने देखे जा सकते हैं।

मथुरा की साॅॅंझी का विशेष महत्व यह है कि इस कला को धर्म के उत्थान के लिए प्रयोग किया गया है। मथुरा में नारायण दास वर्मा तथा उनके सुपुत्र चैनसुख दास वर्मा पिछले तीस सालों से कागज के स्टेंसिल बनाते रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व ही दोनों की मृत्यु हुई है। वे इस कला में बहुत अनुभवी थे। उन्होंने कृष्ण-जीवन संबंधी अत्यधिक बारीक, नाजुक तथा सुंदर स्टेंसिल प्रस्तुत किये थे। नारायण दास को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 1980 में पुरस्कार भी मिला था। वे एक महान् कलाकार थे। उन्हें केवल कागज काटने में ही उच्चता प्राप्त न थी बल्कि उनके बनाये कुछ चित्र कला के वास्तविक नमूने थे। उनकी श्रेष्ठतम कृतियों की आज भी बहुत कीमत लगायी जाती है। इस कला का चलन उनके परिवार में पिछली पाॅंच पीढ़ियों से रहा है। आजकल कंसखर बाजार, मथुरा की उसी पुरानी दुकान में उन्नीस वर्षीय विजय कुमार तथा उसके दो छोटे भाइयों द्वारा इस कला को आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्हें ‘डिजाइन बिंदी वाले’ के नाम से पुकारा जाता है क्योंकि आजकल वे छोटी-छोटी बिंदियों के डिजाइन भी बनाते हैं जोकि पाॅंच-पाॅंच पैसे में बिकती हैं औरतें डिजाइनर बिंदियों को माथे पर लगाती हैं। साॅंझी कृष्ण-लीला के अलावा उनके पास अपने पिता व दादा द्वारा छोड़े गये सैकड़ों बिंदियों के डिजाइन हैं। ये युवा अपनी कला में निरंतर प्रगति कर रहे हैं, परंतु अभी उन्होंने नये डिजाइन विकसित नहीं किये हैं।

वे अपने पिता व दादा द्वारा छोड़े गये पुराने साॅंझी के डिजाइन ही प्रयोग में ला रहे हैं। वे अपने दादा नारायण दास द्वारा छोड़ी गयी एक विशेष प्रकार की कैंची का ही प्रयोग करते हैं। इस कैंची की भुजाएॅं लंबी तथा ब्लेड बहुत ही सूक्ष्म व तेज होते हैं। ब्लेड छोटे होने से काटने वाली लाईन को देखने में आसानी रहती है। छोटे ब्लेड आसानी से चलाये भी जा सकते हैं। शुरू-शुरू में साॅंझी बनाने के लिए साधारण कागज का प्रयोग किया जाता था। पहले एक कागज पर चित्र बना लिया जाता था। फिर चार-पाॅंच कागज एक के ऊपर एक रखकर चारों कोनों पर पिन लगा दिये जाते थे। फिर चित्र रखकर उन्हें काटा जाता था। इस तरह से एक साथ कई कागज के स्टेंसिल बन जाते थे। कागजों पर वार्निश भी कर दी जाती थी ताकि एक-दो-बार इस्तेमाल करने पर स्टेंसिल समाप्त न हो जाये।

पिछले दशक से प्लास्टिक की शीट से ही स्टेंसिल बनाये जा रहे हैं। उन पर पानी के रंगों का कुप्रभाव नहीं पड़ता ते जल्दी से फटते भी नहीं। अतएव परंपरागत साॅंझी-स्टेंसिल बनाने वाले के समय के साथ-साथ उन्हें बनाने के लिए सामग्री में परिवर्तन भी करते जा रहें हैं।
छठे दशक में नारायण दास वर्मा व उनके सुपुत्र चैनसुख दास वर्मा द्वारा बनाये गये साॅझी के कागज-स्टेंसिल बहुत सस्ते में बिका करते थे। उनकी कीमत कृति की बारीकी व बनाने की मेहनत अनुसार पाॅंच पैसे से लेकर पच्चीस रुपये तक होती थी। परंतु रुपये का अवमुल्य हो जाने पर अब वे मॅंहगे हो गये हैं। विभिन्न रंगों की अबरी लेकर एक जौहरी की तरह लेखक ने उन्हें स्टेंसिल के नीचे जोड़ा है। इसके लिए अत्यधिक मेहनत, संयम व कलात्मक शक्ति की आवश्यकता होती है। अबरी लगा देने से बाद साॅंझी-स्टेंसिल एक तरह की कलाकृति बन जाते हैं। लेखक ने अपने इस कार्य की प्रदर्शनी 1983 में राजधानी में प्रदर्शित की थी, जिसे कलाकारों तथा कला-आलोचकों की अत्यंत सराहना प्राप्त हुई।

कोई भी कला प्रस्तुति व प्रशंसा के बिना जिंदा नहीं रह सकती। साॅंझी लोककला को भी इसकी आवश्यकता है। कलाप्रेमियों के प्रोत्साहन व प्रेम से ही साॅंझी कला से आजकल जुडे़ विजय कुमार व उसके दो छोटे भाई आगे बढ़ सकते हैं। सरकार व सामाजिक संस्थाओं को भी साॅझी की रक्षा के लिए वातावरण तैयार करना चाहिए। जब तक इस कला को सामूहिक रूप से उत्थान नहीं मिलता, खतरा है कि कहीं इस मशीनी युग में एक फैशन बन कर ही यह कला न रह जाये। साॅंझी कला को मथुरा की भूमि से खींचकर भारत के कोने-कोने में फैलाने का प्रयास निश्चित ही आज की बहुत बड़ी आवश्यकता है।