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श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता महर्षि व्यास द्वारा रचित एक ग्रंथ है। यह महाभारत के भीष्म पर्व में आता है। भीष्म पर्व के 25वें अध्याय से 42वें अध्याय तक के अट्ठारह अध्यायों को श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से जाना जाता है। यह गीता के नाम से भी लोकप्रिय है।

इसमें कुल 700 श्लोक हैं, परन्तु कुछ संस्करणों जैसे कश्मीरी संस्करण में 701 श्लोक है। यह एक अतिरिक्त श्लोक तेरहवें अध्याय के प्रारम्भ में जोड़ा गया है जो इस प्रकार है -

अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।
एतद् वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।

शेष श्लोक हर संस्करण में सामान हैं। इस श्लोक के कारण उद्धरण के समय श्लोक संख्या लिखने में दिक्कत न आये जिसके लिए एक तरीका उपर्युक्त श्लोक तथा इसके बाद वाले श्लोक की गिनती एक साथ पहले श्लोक के रूप में कर ली जाती है।

संजय के 10 दिनों तक महाभारत के युद्ध के मैदान में रहने तथा भीष्म के घायल होकर मृत्यु शय्या पर पड़ने के बाद उनके वापस हस्तिनापुर लौट जाने पर धृतराष्ट्र के इस प्रश्न के साथ इसका प्रारम्भ होता है कि संजय, धर्मक्षेत्र में, कुरूक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्रित मेरे और पांडवों के पुत्र ने क्या किया?

गीता के पहले अध्याय का नाम है अर्जुनविषादयोग। इसमें 47 श्लोक हैं। इसमें पाण्डव तथा कौरव सेना के मुख्य महारथियों के नाम हैं, दोनों ओर से शंख नाद का वर्णन है, अर्जुन द्वारा कौरव सेना का निरीक्षण है तथा अन्त में शोकाविष्ट होकर घोर विषाद में युद्ध न करने की इच्छा की अभिव्यक्ति है।

दूसरे अध्याय में सांख्य योग से भगवान श्रीकृष्ण ने उपदेश देना प्रारम्भ किया इसलिए इसका नाम सांख्ययोग है। इसमें 72 श्लोक हैं।

तीसरे अध्याय का नाम कर्मयोग है। इसमें 43 श्लोक हैं।

चौथे अध्याय का नाम ज्ञानकर्मसन्न्यासयोग है। इसमें 42 श्लोक हैं।

पांचवें अध्याय का नाम कर्मसन्न्यासयोग है। इसमें 29 श्लोक हैं।

छठे अध्याय का नाम आत्मसंयमयोग है। इसमें 47 श्लोक हैं।

सातवे अध्याय का नाम ज्ञानविज्ञानयोग है। इसमें 30 श्लोक हैं।

आठवें अध्याय का नाम अक्षरब्रह्मयोग है। इसमें 28 श्लोक हैं।

नौवें अध्याय का नाम राजविद्याराजगुह्ययोग है। इसमें 34 श्लोक हैं।

दसवें अध्याय का नाम विभूतियोग है। इसमें 42 श्लोक हैं।

ग्यारहवें अध्याय का नाम विश्वरूपदर्शनयोग है। इसमें 55 श्लोक हैं।

बारहवें अध्याय का नाम भक्तियोग है। इसमें 20 श्लोक हैं।

तेरहवें अध्याय का नाम क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग है। इसमें 34 श्लोक हैं।

चौदहवें अध्याय का नाम गुणत्रयविभागयोग है। इसमें 27 श्लोक हैं।

पंद्रहवें अध्याय का नाम पुरूषोत्तमयोग है। इसमें 20 श्लोक हैं।

सोलहवें अध्याय का नाम दैवासुरसम्पद्विभागयोग है। इसमें 24 श्लोक हैं।

सत्रहवें अध्याय का नाम श्रद्धात्रयविभागयोग है। इसमें 28 श्लोक हैं। तथा

अट्ठारहवें अध्याय का नाम मोक्षसन्न्यासयोग है। इसमें 78 श्लोक हैं।

इस ग्रंथ में एक श्लोक धृतराष्ट्र द्वारा कहा गया है, 41 श्लोक संजय द्वारा, 84 श्लोक अर्जुन द्वारा तथा 574 श्लोक भगवान कृष्ण द्वारा कहे गये हैं।

Contributors to this page: hindi .
Page last modified on Sunday July 13, 2014 14:39:34 GMT-0000 by hindi.