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लोक कला का सामान्य अर्थ है वह कला जो लोगों में पारंपरिक रुप से व्याप्त है।

इतिहास

कलाओं का विकास शास्त्रबद्ध नियमों के अनुरूप अपने-अपने काल विशेष में चर्मोत्कर्ष पर पहुंचने में समर्थ हुआ वहीं दूसरी ओर लोक कलाओं का संसार अपने अनगढ़ एवं ग्रामीण संस्कारों से जुड़ा रहा। भारत में लोक कलाओं का अध्ययन अपेक्षाकृत उपेक्षित रहा है। हिन्दू स्थापत्य, शिल्पकला, शास्त्रीय संगीत आदि पर समुचित काम हुआ है। भारतीय विद्वानों एवं युरप व अमेरीका आदि के भी अनेक विद्वानों ने हिन्दुकला पर विस्तारपूर्वक अध्ययन किया है। बौद्ध कला व जैन कला का अध्ययन भी गहराई से किया गया है। यहां तक कि मुस्लिमों के आगमन के पश्चात् उनके शासन काल में विकसित स्ािापत्य एवं चित्रकला पर भी अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। लोक कलाओं का अध्ययन इनकी तुलना में नगण्य ही कहा जावेगा। लोक कलाओं के अध्ययन की इतनी अधिक उपेक्षा का कारण उपरोक्त वर्णित अन्य कलाओं की तुलना शायद बुद्धिजीवियों को अनगढ़ एवं अनाकर्षक प्रतीत होता होगा। जहां एक ओर हिन्दू, बौद्ध, जैन व मुस्लिम कलाओं का विकास शास्त्रबद्ध नियमों के अनुरूप अपने-अपने काल विशेष में चर्मोत्कर्ष पर पहुंचने में समर्थ हुआ वहीं दूसरी ओर लोक कलाओं का संसार अपने अनगढ़ एवं ग्रामीण संस्कारों से जुड़ा रहा। उसमें इन शास्त्रीय कलाओं की तरह सूक्ष्मता एवं पूर्णता तो नहीं आ पाइ्र्र किन्तु वह ग्रामीण संस्कारों से प्रतिबद्ध रहते हुए जीवन्त बना रहा जबकि अन्य भारतीय कलाएं शास्त्रबद्ध होकर पूर्णता की ऊंचाइयों को स्पर्श करने लगीं किन्तु वे रूढ़िग्रस्त होकर कुंठित भी होने लगी। मध्य युग में हिन्दू जैन मंदिरों पर निर्मित मूर्तियों में होने वाली पुनरावृत्ति एवं शास्त्रीय एकरूपता भारतीय कलाओं के आए हुए ठहराव के स्पष्ट उदाहरण हैं।

अब हम लोककलाओं के केन्द्र में स्थित उन मूल तत्वों का आंकलन करेंगे, जिनके कारण लोककलाएं अपने सीमित साधनों अभावों व उपेक्षा के बावजूद भी सतत गतिशील व जीवन्त बनी रही हैं। ये मूल तत्व हैं लोक जीवन के धार्मिक विश्वास, जादू एवं सामाजिक व्यवहार व आर्थिक आधार। आज लोककलाओं में प्रयुक्त प्रतीक एक लम्बी सांस्कृतिक प्रक्रिया द्वारा प्रदत्त हैं।


लोक कलाएं इस दौर में भी सतत जीवन्त रहीं, इसका प्रमुख कारण था भारतीय समाज में उसकी गहरी जड़ें विद्यमान थीं। भारतीय ग्रामीण समाज जिस तरह अपने संस्कारों से गहराई से जुड़ा हुआ है, उसी तरह हमारी लोककलाएं भी हमारे ग्रामीण समाज से गहराई से जुड़ी हुई हैं। भारतीय समाज के सुख-दुख, रीति रिवाज, धार्मिक विश्वास, तीज त्यौहार अर्थात जीवन के प्रत्येक पक्ष की अभिव्यक्ति लोक कलाओं के माध्यम से होती है। अपनी सहज अनुभूतियों से लेकर जटिलतम स्थितियों को, आवेग एवं संवेगों को अनुभूतियों को कलात्मक सौंदर्य के साथ अत्यन्त सहज प्रतीकों एवं बिम्बों को माध्यम से भारतीय ग्रामीणजन, परंपरागत लोक कलाओं में अभिव्यक्त करते आए हैं। हजारों वर्षो में समाज विकास की धारा के साथ ये लोक कलाएं विकसित हुई हैं। इसमें संपूर्ण समाज का अनुभूत सौंदर्य बोध एवं सामाजिक यथार्थ कलात्मक स्तर पर अभिव्यक्ति पा सका है। लोक कलाओं में अभिव्यक्ति के लिए उपयेाग में लाए जाने वाले उपकरण भी अपने आस-पास के परिवेश से जुटाए गए हैं। चित्रकारी हेतु रंगों के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त हिरमिचि, पीली मिट्टी, गेरु, खड़िया, वृक्षों की छाल तथा फूल-पत्तियों से रंग निकाले जाते रहे हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण में काष्ठ का तथा विभिन्न किस्म के पत्थरों का प्रयोग हेाता रहा है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने कुम्हार के चाक का विकास किया और मिट्टी के बर्तन तथा मिट्टी की मूर्तियां बनाना आरंभ किया। सभ्यता के विकास में यह एक महत्वपूर्ण स्थिति थी। मिट्टी के पके हुए बर्तन व मूर्तियों का न सिर्फ समाज की विकासधारा में ऐतिहासिक महत्व है, वरन आज भी लोक जीवन का वह एक महत्वपूर्ण अंग है।

वस्त्रों की बुनाई के लिए अपने इर्द गिर्द अनेक तरह के मजबूत तन्तुओं, छालों व रेशों का उपयोग तथा उनको रंगने के लिए प्रकृति प्रदत्त रंगों का उपयेाग परम्परागत वस्त्रों के निर्माण में तथा परिधानों में आज भी प्रचलित है। रासायनिक पद्धति से निर्मित रंग विज्ञान के इतने अधिक विकास के बावजूद भी प्राकृतिक रंगों का मुकाबला नहीं कर पाते। भारत के पूर्वोंत्तर में नागा तथा अन्य जनजातियों द्वारा निर्मित शालों या कश्मीरियों द्वारा निर्मित गलीचों व पश्मिनों की रंगाई तो आज भी अद्वितीय है। उड़ीसा के बोडो आदिवासियों द्वारा निर्मित स्वयं के उपयोग हेतु परिधान हों अथवा कच्छ के मरुस्थल में विचरण करने वाले रैबारी व मालधारी हों, या भूटान की जनजातियां हों अथवा राजस्थान के बनजारा हों, सभी ने अपने परिवेश से वस्तु सामग्री चुनकर परिधान, रंग तथा अलंकरण का विकास किया है।

कांस्ययुग में ताम्र धातु व जस्ता तथा टिन के सम्मिश्रण से एक नई मिश्र धातु का प्रादुर्भाव हुआ जिसे कांस्य के रूप में जाना जाता है। कांस्य के विकास के साथ ही धातु की ढली हुई मूर्तियों तथा आभूषणों का निर्माण होने लगा इसके पूर्व काष्ठ, पत्थर तथा हड्डियों व हाथी दांतों का प्रयोग मूर्ति तथा कुछ कलात्मक उपकरणें हेतु किया जाता था। कांस्य के विकास ने इतना महत्वपूर्ण योगदान किया कि समाज की इस विकास अवस्था को कांस्य युग की संज्ञा प्रदान की गई। मोहन जोदाड़ों तथा हड़प्पा जो कि सिन्धुघाटी सभ्यता के केन्द्र रहे हैं, खुदाई में वहां से अनेक कलात्मक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। मृदु भांड, कांच के मणियों द्वारा निर्मित आभूषण, धीया पत्थर पर निर्मित मूर्तियां, पकाई हुई मिट्टी के खिलौने तथा कांस्य की नर्तकी की एक अति आकर्षक मूर्ति भी वहां की खुदाई से प्राप्त हुई है। कांस्य की इस मूर्ति का निर्माण मोमक्षय पद्धति कहलाता है। मिट्टी का आकार बनाकर फिर उस पर मोम के पतले पतले तार बनाकर उस पर चढ़ाए जाते हैं। इसके पश्चात् पुनः मिट्टी चढ़ाई जाती है तथा कांस्य को गर्म करके जब पिघल जाता है तो मोम के स्थान पर भर दिया जाता है। मोम धातु की गर्मी से जल जाता है। कांस्य मोम द्वारा छोड़े गये उस खाली स्थान में भर दिया जाता है। कांस्य की मूर्ति निर्माण की यह तकनीक बस्तर तथा उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्रों के घसिया दस्तकार आज भी अपनाए हुए हैं। घसिया शब्द कांस्या का ही बिगड़ा हुआ रूप है। इस जाति का घास काटने से अथवा घोड़ों की देखरेख से किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है जो कालान्तर में कुछ विद्वानों ने भ्रमवश, समझ लिया है।

मृद भांडों के सदृश्य ही बांस के बने उपकरणों का भी लोक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बांस को चीरकर पतली-पतली सींकों व खपच्चियों से अनेक आकार प्रकार की चटाइयां व टोकरियां आज भी बड़े पैमाने पर प्रचलन में हैं। धातु के अत्यधिक विकास के बावजूद सस्ता तथा सुलभ व वनज में हल्का होने के कारण उसका तादात्म्य भारतीय जनजीवन के साथ बेजोड़ है। बांस के कई हजार उपयोग गिनाए जा सकते हैं। यही कारण है कि नागा जनजाति के लोग बांस की पूजा करते हैं। बांस की बनी वस्तुओं का उपयोग न सिर्फ वस्तुओं के संग्रहण व एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने के लिए किया जाता है वरन बर्तन, हथियार, औजार, भवन निर्माण तथा संगीत के उपकरणों तथा वाद्य यंत्रों में भी किया जाता है। नागा जनजाति के लोग बड़े मोटे आकार के बांस में पानी भरकर दूरस्थ स्थानों से पीठ पर लादकर अपने घरों को लाते हैं। बांस के बने मदिरा पान करने के पात्र अत्यन्त सुरुचि के साथ बनाए जाते हैं। धनुष, बाण, लाठी व अनेक औजारों के हत्थों के उपयोग में भी बांस लाया जाता है। अनेक प्रकार की बांसुरियां, अलगोझे चिकारे भी बांस से बनते हैं। बांसुरी शब्द का सीधा सम्बन्ध बांस से ही है।

उपरोक्त विस्तृत भूमिका का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि अपने परिवेश में सहज उपलब्ध सामग्री का उपयोग कर मनुष्य ने लोक जीवन व संस्कृति का अभिन्न एवं अक्षुण्ण अंग बना लिया है। समाज विकास की धारा में वस्तु, संस्कृति व परंपराओं को विकसित ही नहीं करती वरन उनको आकार व स्वरूप भी प्रदान करती है। वस्तु संस्कृति ने हमें उपकरण प्रदान किए जिससे लोककलाओं में उपयोग में लाए जाने वाले उपकरणों का प्रादुर्भाव हुआ। अब हम देखेंगे कि लोककलाओं की रचना प्रक्रिया और उसकी अभिव्यक्ति व प्रतिमानों को रचने, गढ़ने व निर्धारित करने में कौन सी सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक व रचनात्मक तथा कलात्मक परिस्थितियां व आकांक्षाएं रही हैं जिनने लोककलाओं के संसार को समृद्ध किया है। हमें लोक कलाओं का अवलोकन व अध्ययन उसके परिवेश एवं संस्कारों के परिप्रेक्ष्य में ही करना चाहिए न कि अन्य अतिविकसित सभ्यताओं की तुलना व संदर्भो में। इसके अलावा हमें हमारे लोक जीवन एवं संस्कृति को आधार बनाकर ही हमारी लोक कलाओं को देखना चाहिए न कि अन्य किसी देश या समाज की लोक कलाओं से तुलना करके लोककलाओं का अध्ययन हमारे देश में अत्यन्त उपेक्षित रहा है। विद्वानों को उसने अपनी ओर विशेष आकर्षित नहीं किया। विदेशी नेतृत्व शास्त्रियों व समाज शास्त्रियों ने ही कुछ छिटपुट प्रयास किए हैं। गत कुछ वर्षांे से विद्वानों व कला समीक्षकों कलामर्मज्ञों की रुचि लोककलाओं की ओर बढ़ी है। उसके दो प्रमुख कारण प्रतीत होते हैं। पहला कारण तो समृद्ध मानी जाने वाली भारतीय कला का रूढ़ी ग्रस्त होकर कंुठित हो जाना, तथा दूसरा कारण तथाकथित आधुनिक कला का अत्यधिक पाश्चात्य कला पर आश्रित होकर उनके संस्कारों से जुड़े बगैर ही अंधाधुन्ध अनुकरण करना, आयात करके अपनाई गई भारतीय आधुनिकता व कला की जड़ें हमारी संस्कृति में नहीं होने के कारण ही सर्व साधारण को वह अपरिचित लगती है। भारतीय मानस ने बौद्धिक स्तर पर भले ही आधुनिक कला को स्वीकार कर लिया हो, किन्तु वह हमारी सांस्कृतिक चेतना व अभिव्यक्ति का अंग व जरिया नहीं बन सकी है। शायद इसीलिए अपनी जमीन की तलाश या जड़ों से जुडकर ऊर्जा प्राप्त करने की ललक में कला मर्मज्ञों का ध्यान लोक कला के अध्ययन की ओर गया है। लोक कलाओं के उपकरणों को अब भी वे पाश्चात्य विद्वानों के ज्ञान व अध्ययन की कसौटी पर कसकर पुनः भूल कर रहे हैं। अफ्रीका महाद्वीप की जनजातियों कल कला पैसिफिक के महाद्वीप व द्वीपों की जनजातियों की कला के अध्ययन से निर्मित प्रतिमान भारतीय लोककलाओं पर जस के तस लागू करना नासमझी होगी। अफ्रीका दक्षिण अमेरिका या पैसिफिक के अन्य द्वीपों की जनजातियों का सम्बन्ध बाहरी दुनियां से बहुत बाद में हुआ है। वहां की सांस्कृतिक परंपरा महान तथा अक्षुण्ण रही है। बाह्य आक्रामणों का दबाव तथा प्रभाव उन पर अपेक्षाकत नगण्य रहा है। भारतीय जनजातियों पर बाह्य दबाव के कारण वे निरीह, असहाय तथा पिछड़े हुए समझे जाने वाले लोगों की कला मानी गई है जो अपने सीमित साधनों व कला उपकरणों का उपयोग करके भी जीवित रह सकी है। भारतीय लोककला को वनांचल की वनस्पति या वहां पुष्पित फूलों की भीनी गंध के अनुरूप ही ग्रहण करना उचित होगा। भारतीय जनजातियां राजनैतिक रूप से दमित, शोषित व शासित रही हैं। भारतीय ग्रामीण संस्कृति लम्बे समय तक अंधकार में डूबी रही है। कला उपकरणेां के अभाव में बहुत कुछ अभिव्यक्ति पाने से वंचित रह गया है। बहुत कुछ जो अभिव्यक्ति पाता रहा है वह हमारे प्रबुद्ध वर्ग के सांस्कृतिक अलगाव की प्रक्रिया में अनदेखा हो गया है। भारतीय वर्ण व्यवस्था के कारण ब्राम्हण संस्कृति में पैदा हुआ प्रबुद्ध वर्ग सभी दस्ताकरों को क्षुद्र समझ कर उनकी दस्तकारियों व कलाओं को हेय व निकृष्ट समझता रहा है। यह द्विज दृष्टि जो हाथ से काम करने वाली जातियों को अछूत समझती हैं, उनके द्वारा निर्मित दस्तकारी व कला को भी तुच्छ समझती है। द्विज समाज का यह हिन्दू दृष्टिकोण वर्णव्यवस्था व जातिगत समाज से आदिवासी समाज में पहुंच गया है। आदिवासी भी हिन्दुओं की तरह ही घसिया, बढ़ई, बुनकर व लोहार आदि को अछूत समझता है। बस्तर के मुरिया व माड़िया गोंड न सिर्फ अत्यन्त सुन्दर कलाकृतियां व आभूषण बनाने वाली घसिया जाति को अछूत समझते हैं, वरन उन्हीं में से निकलकर लोहारी व बढ़ईगिरी करने वाले कारीगरों को भी अपने से नीची जाति का समझते हैं। अत्यन्त सुन्दर कपड़ा बुनने वाले महरा, पनिका व मिरगान भी हिन्दुओं की तरह ही मुरिया, माड़िया अथवा भतरा आदिवासियों के लिए भी अछूत हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि उनके देवी-देवताओं की अत्यन्त कलात्मक मूर्तियां व आभूषण बनाने वाले घसिया /घडुवा/ भी जातीय धरातल पर नीचे स्तर पर अछूत माने जाते हैं। कलात्मक वस्तुएं बनाने वाले कारीगर जाति के लोग न सिर्फ उन्हें छिपाते हैं, वरन समुचित प्रशंसा व सम्मान के अभाव में अपनी कलात्मक उपलब्धियों का स्वयं भी ठीक-ठीक महत्व नहीं समझते। अनेक जनजातियों में व्याप्त भयावह गरीबी अज्ञान व तथा हिन्दुओं व ईसाई धर्म से शामिल हुए लोगों के संपर्क से उनमें जो हीनता का भाव जन्म लेता रहा है उसने भी दस्तकारियों व लोक कलाओं को क्षति पहुंचाई है।

अब हम लोककलाओं के केन्द्र में स्थित उन मूल तत्वों का आकलन करेंगे, जिनके कारण लोककलाएं अपने सीमित साधनों अभावों व उपेक्षा के बावजूद भी सतत गतिशील व जीवन्त बनी रही हैं। ये मूल तत्व हैं लोक जीवन के धार्मिक विश्वास, जादू एवं सामाजिक व्यवहार व आर्थिक आधार। आज लोककलाओं में प्रयुक्त प्रतीक एक लम्बी सांस्कृतिक प्रक्रिया द्वारा प्रदत्त है। जनजातियों व ग्रामीण समाज के मिथक व धार्मिक रीति रिवाज मनुष्य व अदृश्य शक्तियों अथवा ईश्वर व मनुष्य के सम्बन्धों के प्रति गहन जिज्ञासा से उत्पन्न गूढ़ रहस्यों व जादू व धार्मिक विश्वास से पैदा हुए सामाजिक संगठन व सर्वमान्य प्रतिष्ठान हैं। इस मानसिकता व धार्मिक विश्वासों की पृष्ठभूमि में ही अनेक प्रतीक विकसित हुए हैं जिनकी लोक जीवन में गहरी जड़ें हैं। हमें इन प्रतीकों का अध्ययन उनके इन्हीं धार्मिक विश्वासों की पृष्ठभूमि में करना होगा। आज बहुत से ज्यामितीय अलंकरण जितने सरल व सहज लगते हैं वे दरअसल उतने सरल नहीं हैं। अनेक ज्यामितीय अलंकरण अत्यन्त परिष्कृत व सूक्ष्म आकारों का कलात्मक अमूर्तन हैं। इसी प्रकार अनेक पशु, पक्षी, वृक्ष तथा जीव जन्तुओं के प्रतीकों का प्रयोग भी अपने पीछे एक लम्बी सांस्कृतिक प्रक्रिया से जन्मा है। इन प्रतीकों में बहुत से प्रतीक अति प्राचीन जनजातियों के टोटेम प्रतीक हैं। ये टोटेम प्रतीक भी कलात्मक अमूर्तन की प्रक्रिया में ज्यामितीय आकारों में परिवर्तित हो गए हैं। हमारी लोक कलाओं के अनेक प्रतीक अति प्राचीन जन जातियों व कबीलों के मिथक हैं। वैदिक समाज के पूर्व में ही वे प्रतीक मिथक के रूप में स्थापित हो चुके थे। सर्प, बैल, चंद्रमा, सूर्य, वृक्ष, अग्नि, मछली, कछुवा आदि अनेक मिथक भारतीय सभ्यता के पूर्व में ही अन्यत्र विकसित होकर स्थापित व स्वीकृत हो चुके थे। आर्यो के भारत में आगमन के साथ ये प्रतीक भी बाहर से उनके धार्मिक मिथकों के रूप में भारत आ गए। प्रजनन की जटिलता व महत्व ने मात्र देवियों के मिथक व प्रतीकों को जन्म दिया। सर्प युग्य भी प्रजनन का ही प्रतीक था। वृक्ष भी प्रजनन का ही प्रतीक था।

हमारी लोक कला के संस्कार हमारी अत्यन्त प्राचीन सभ्यता के विकास की परम्परा में हैं। आज लोक कला में अभिव्यक्त प्रतीकों में से अनेक प्रतीकों सभ्यता के आरंभिक काल में जब मानव शिकारी जीवन व्यतीत करता था तब ही विकसित होना आरंभ हो गया था। गुफा मानव की इस अवस्था में उसने अपनी गुफा कंदराओं में आवास करते हुए भित्ति चित्र बनाना आरंभ कर दिया था। उस युग में जीवन यापन अत्यन्त कठिन व संघर्ष पूर्ण था। प्राकृतिक विपत्तियां भी बहुत अधिक थी। ऐसे समय जादू के इर्द-गिर्द विश्वासों का निर्माण हुआ था। शैलाश्रयों की चट्टानों पर जो चित्र सभ्यता के आरंभिक काल में गुहा मानव द्वारा अंकित किए गए हैं वे इन्हीं विश्वासों के द्वारा प्रभावित हैं। शिकार में सफलता की कामना एवं सफलता के पश्चात होने वाले आल्हाद की अभिवयक्ति को अभिव्यक्त करने वाले गुआ मानव द्वारा अंकित शैल चित्रों में वन्य पशुओं, आखेट करते आदिम मनुष्यों उनके हथियारों आदि के ऐसे अनेकानेक चित्र कई देशों में पाए गए हैं। सर्व प्रथम स्पेन में इस प्रकार के प्राचीन शैलाश्रयों की खोज हुई। भारत में भी सिंझानपुर कबरा पहाड़, कोटा, सागर-पथरिया, भीमबेटका, पंचमढ़ी, एवं मिर्जापुर आदि अनेक क्षेत्रों में शैलाश्रयों का पता लगा। इन शैलाश्रयों में पच्चीस तीस हजार वर्षो से ईसा पूर्व पांच हजार वर्षो तक गुहा मानव द्वारा अंकित अनेक चित्र उपलब्ध हुए हैं। इन चित्रों में आदि मानव के परिवेश तथा उसके रहन सहन के तरीके व उपकरणेां के अलावा उसके विश्वासों का भी पता चलता है। इन्हीं धार्मिक या जादू पर आधारित विश्वासों का विकास कालान्तर में कांस्य युग में और भी दृढ़ हुआ व उसने अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकों की रचना की। हमारी प्राचीन संस्कृति के अनेक प्रतीक कांस्य युग के धरोहर ही हैं। कालान्तर में पशुपालन अवस्था के साथ साथ नए अनुभव के साथ विकास की महती संभावना के द्वार खुले। जमीन जोत कर कृषि करने के साथ साथ गांवों में बसना शुरु हुआ। गांवों की संख्या में शनैः शनैः वृद्धि हुई। इसी काल में मेसोपोटामियां में नदियों के कछारी क्षेत्र में एक विकसित सभ्यता का उदय हुआ जिसमें मंदिरों में पूजा होने लगी। लिपि का विकास हुआ। गणित शास्त्र का विकास आरंभ हुआ। वस्तुकला का श्रीगणेश हुआ। तथा साथ ही राज्य की उत्पत्ति एवं उसके संचालन का विज्ञान भी आरंभ हुआ। कालान्तर में यही ज्ञान मिश्र, क्रेते, सिन्धुघाटी व चाइना, मेक्सिको व पेरू आदि सुदूर प्रदेशों तक फैल गया। आदिम युग के विकास तक आराध्य देवी मातृ देवी हुआ करती थी। जो धरती माता का प्रतीक थी व मृत्योपरांत दाह संस्कार अथवा दफन के लिए मृत शरीर को समाहित कर पुनर्जन्म हेतु मार्ग प्रशस्त करती थी। इस काल की बनी हुई मूर्तियां मिली हैं, उनमें मातृ देवियों के वक्ष बहुत भारी बनाए गए हैं। सिंधु सभ्यता की खुदाई में प्राप्त मृण्य मूर्तियों में भी मातृ देवियों के वक्षों का आकार विशाल रूप में अंकित किया गया है। मातृ देवी का यह स्वरूप आरंभ में ग्राम मातृका या देवी का था या क्षेत्रीय देवी का। सभ्यता को विकास के साथ यही मातृका रूप नये आयामों को समाहित कर एक शक्तिशाली रूप में परिणित हो गया। भारतवर्ष में आदि शक्ति या शक्ति की देवी के रूप में जन्मदात्री पालनकर्ती, दुष्टों, की संहार करने वाले दयामयी, करुणामयी एवं ममतामयी स्थापित हुई। इसके अनेक रूप भारतीय संस्कृति एवं धर्म ग्रन्थों में वर्णित हैं। कांस्ययुग से लौह युग में सभ्यता के प्रवेश के साथ ही आक्रमणकारी योद्धाओं का प्रादुर्भाव हुआ। इन योद्धाओं ने ग्रीस, सीमाइट तथा सीरिया से निकलकर जहां वे पशुपालन करते थे न सिर्फ ऊंट को पालतू बनाया वरन घोड़ों को पालतू बनाकर उनकी सवारी करना आरंभ किया। इन आक्रामक योद्धाओं के साथ साथ सभ्यता के विकास में मातृका देवियों के बाद वीर योद्धाओं का समावेश भी धार्मिक व सांस्कृतिक प्रतीकों में होने लगा।