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योग भारतीय चितन परम्परा में आध्यात्म का एक अंग है।

योग शब्द का अर्थ है जुड़ना, यदि इस शब्द को आध्यात्मिक अर्थ मंे लेते हंै तो इस का तात्पर्य आत्मा का परमात्मा से मिलन और दोनांे का एकाग्र हो जाना है। भक्त का भगवान से, मानव का ईश्वर से, व्यष्टि का समष्टि से, पिण्ड का ब्रह्माण्ड से मिलन को ही योग कहा गया है। हकीकत मंे देखा जाए तो यौगिक क्रियाओं का उद्देश्य मन को पूर्ण रुप से प्रभु के चरणांे मंे समर्पित कर देना है। ईश्वर अपने आप मंे अविनाशी और परम शक्तिशाली है। जब मानव उसके चरणांे मंे एकलय हो जाता है तो उसे असीम सिद्धि दाता से कुछ अंश प्राप्त हो जाता है। उसी को योग कहते हैं।

चित वृतियों पर नियंत्रण और उस का विरोध ही दर्शन शास्त्र में योग शब्द से विभूषित हुआ है। जब ऐसा हो जाता है और ऐसा होने पर उस व्यक्ति को भूत और भविष्य आंकने मे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होती, वह अपने संकेत से ब्रह्माण्ड को चलायमान कर सकता है।


भारतीय योग शास्त्र मे इसके पांच भेद बताए गए हैं-

1 हठ योग

2 ध्यान योग

3 कर्म योग

4 भक्ति योग

5 ज्ञान योग

मूलतः मनुष्य मंे पांच मुख्य शक्तियां होती हंै उन शक्तियों के अधार पर ही योग के उपर लिखे भेद या विभाजन संभव हो सका है। प्राण शक्ति का हठ योग से, मन शक्ति का ध्यान योग से, क्रिया शक्ति का कर्म योग से, भावना शक्ति का भक्ति योग से, बुद्धि शक्ति का ज्ञान योग से पूर्णतः सम्बन्ध है। वर्तमान काल मंे इस विष्य पर जो ग्रन्थ प्राप्त होते हैं उन में हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, गोरख संहिता, हठ योग सार, तथा कुण्डक योग प्रसिद्ध हैं। पंतजंलि का योग दर्शन इस सम्बन्ध मंे प्रमाणिक ग्रन्थ माना गया है।

महर्षि पतंजलि ने चित की वृतियों का विरोध योग के माध्यम से बताया है और उनके अनुसार योग के आठ अंग हैं, जो कि निम्नलिखित हैं

यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

ऊपर जो आठ अंग बताए गए हैं उनमंे से प्रथम पांच अंग बाहरी तथा अन्तिम तीन अंग भीतरी या मानसी कहे गए हैं।

यम- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का व्रत पालन ही ‘यम’ कहा जाता है।

नियम- स्वाध्याय, सन्तोष, तप, पवित्रता, और ईश्वर के प्रति चिन्तन को नियम कहा जाता है।

आसन- सुविधापूर्वक एक चित और स्थिर होकर बैठने को आसन कहा जाता है।
उष्ट्रासन, चक्रासन, त्राटक

प्राणायाम- श्‍वास और निःश्‍वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को प्राणायाम कहा जाता है।

प्रत्याहार- इन्द्रियों को अपने भौतिक विषयों से हटाकर चित में रम जाने की क्रिया को प्रत्याहार कहा जाता है।

जब यह पांच कर्तव्य सिद्ध हो जाते हैं या इनमें से जब कोई साधक पूर्णता प्राप्त कर लेता है तभी उसे योग के आगे की क्रियायों मंे प्रवेश की अनुमति दी जाती है। प्रत्येक साधक को चाहिए कि वह बाह्य अभ्यासों को सिद्ध करने के बाद ही आगे के तीन अभ्यासों मे प्रवेश करें तभी उसे आगे के जीवन मंे पूर्णता प्राप्त हो सकती है।

धारण- चित्त को किसी एक विचार में बांध लेने की क्रिया को धारण या धारणा कहा जाता है।

ध्यान- जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उसमंे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहां से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते हंै।

समाधि- ध्येय वस्तु के ध्यान मंे जब साधक पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नहीं रहता है तो उसे समाधि कहा जाता है।