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कलम को ही अपने संघर्ष का हथियार बनाने वाले उस अदम्स उत्साह के धनी और कलम के सिपाही प्रेमचंद की रचनाएं उनके जीवन की अकथ कहानियां यों ही बयां कर जाती हैं। ऐसी बात नहीं है कि लेखनी और जीवन की सच्चाइयों से उनका मन कभी उकताया न हो, एक बार पैसा कमाने की चाहते में वह बंबई भी फिल्मों की पटकथा लिखने गए थे लेकिन वहां जाकर लेखनी की असलियत का पता चला। थोड़े ही दिनों बाद उनका मन उचट गया और वह यह कहते हुए बंबई छोड़ दिया कि मैं तो वहां दूध बेचने गए थे लेकिन फिल्म निर्माता मुझसे शराब बेचने की हिदायत देने लगे। इन शब्दों की पीड़ा से प्रेमचंद के उस संघर्ष को समझा जा सकता है।

प्रेमचंद न केवल प्रासंगिक बने हुए है बल्कि उनकी लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इसका कारण है उनका विपुल साहित्य। प्रेमचंद का साहित्य लगभग ढाई हजार पृष्ठों का है। उन्होंने लगभग तीन सौ कहानियां और एक दर्जन उपन्यास लिखे हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने नाटक, अनुवाद तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निबंधों के माध्यम से भी अपने विचारों से पाठकों को अवगत कराया ।

‘‘जो व्यक्ति लोक-साहित्य को सभी स्थानों पर एक समान स्तर पर फैला सका, उगने वाले सूरज की किरणों की तरह, बरसने वाले पानी की तरह पवित्र-अपवित्र, प्रकाण्ड विद्वान या अनपढ़, सबके मध्य जिसने अपने साहित्य के माध्यम से एक-सी पहचान अर्जित की, उसे हिन्दी-साहित्य संसार में प्रेमचन्द के नाम से स्मरण किया जाता है।’’ ये उद्गार हैं कलम के सिपाही प्रेमचन्द के विषय में माखन लाल चतुर्वेदी के। कलम के सिपाही, प्रेमचंद का जीवन-संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था। बनारस के पास स्थित लमही गांव में 31 जुलाई, 1880 को प्रेमचन्द ने एक अत्यंत साधनहीन, निर्धन परिवार में जन्म लिया था। पिता मुन्शी अजायबलाल श्रीवास्तव ने उन्हें धनपतराय नाम दिया तो उनके ताऊ उन्हें नवाबराय के नाम से सम्बोधित करते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा एक मौलवी की देखरेख में एक मदरसे में हुई थी, जहां उन्होंने उर्दू सीखी थी। प्रेमचंद जब आठ वर्ष के थे, उनकी मां का देहांत हो गया तब पिता ने दूसरी शादी की। जब प्रेमचंद 15 वर्ष के हुए तो उनकी शादी कर दी गयी। उनकी शादी के एक वर्ष बाद उनके पिता का देहांत हो गया। सौतेली माता का व्यवहार उनके प्रति कठोर रहा। परन्तु उन्होंने अपने व्यवहार में किसी भी प्रकार की कटुता उत्पन्न नहीं होने दी। प्रेमचन्द का दूसरा विवाह एक बाल-विधवा शिवरानी देवी के साथ हुआ। शिवरानी देवी ने प्रेमचंद की मृत्यु के बाद एक किताब प्रेमचंद घर में लिखी थी।

प्रेमचंद न केवल प्रासंगिक बने हुए है बल्कि उनकी लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इसका कारण है उनका विपुल साहित्य। प्रेमचंद का साहित्य लगभग ढाई हजार पृष्ठों का है। उन्होंने लगभग तीन सौ कहानियां और एक दर्जन उपन्यास लिखे हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने नाटक, अनुवाद तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निबंधों के माध्यम से भी अपने विचारों से पाठकों को अवगत कराया है। प्रेमचंद का साहित्यिक जीवन उर्दू के एक स्वतंत्र लेखक के रूप में हुआ। उनकी निगाह में पाठक सर्वोपरि था। सेवासदन उनका पहला उपन्यास था। उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं। प्रेमचंद की रचनाओं में शामिल हैं-उपन्यास-सेवासदन, वरदान, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, गबन, रंगभूमि, कर्मभूमि, गोदान, निर्मला, कायाकल्प /अधूरा/ कहा संग्रह-सोज-ए-वतन /1907 में जब्द/, मानसरोवर /आठ खंड/, नाटक-कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी, वैचारिक निबंध - कुछ विचार।

प्रेमचंद स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी भागीदारी निभाने में पीछे नहीं रहे और मृत प्रायः भारतीय जनमानस में भी उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिये एक नई ताकत, एक नई ऊर्जा का संचार किया। जब उर्दू में लिखा गया उनका कथा संग्रह सोज-ए-वतन ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया और उन्हें अपनी हर लिखी चीज दिखाने का आदेश दिया गया तब उन्होंने प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया। उन्होंने एक बार लिखा था - मैं विद्रोही हूं, जग में, विद्रोह कराने आया हूं, क्रांति-क्रांति का सरल सुनहरा, राग सुनाने आया हूं। प्रेमचंद ने हंस और जागरण जैसी पत्रिकाएं भी निकालीं। इसके अतिरिक्त तीन दशक तक पत्रकारिता कार्य भी किया। इन पत्रों के माध्यम से प्रेमचंद ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध अनवरत संग्राम किया। प्रेमचंद ने पत्रकारिता को मिशन माना, व्यवसाय नहीं, भले ही इसकी कीमत उन्हें पत्र बंद कर देने के रूप चुकानी पड़ी। उनके अनुसार पत्रकार की भूमिका लोकशिक्षक-लोकनायक की होती है। प्रेमचन्द ने बच्चों के लिए 50 से भी अधिक कहानियां लिखीं। उनकी कहानियों में सरसता तथा कोमलता बच्चों को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती।

प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के सबसे बड़े उपन्यासकार थे। प्रेमचंद शायद एक ऐसे अकेले साहित्यकार हैं, जिन्होंने अन्य कला माध्यमों को भी प्रभावित किया है चाहे वे फिल्म, नाटक और टीवी जैसे लोकप्रिय माध्यम हो या चित्रकला। प्रेमचंद साहित्य में हमें एक धर्म-निरपेक्ष भारत नजर आता है। सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध उन्होंने अपनी रचनाओं का माध्यम मनाया। प्रतिज्ञा में उन्होंने विधवा समस्या को उठाया, तो निर्मला में दहेज प्रथा तथा अनमेल विवाह जैसे कुरीतियों को रेंखाकित किया। कायाकल्प और गबन के माध्यम से उन्होंने मध्यम वर्ग के आडम्बर और समस्याओं को उठाया। रंगभूमि में जाति समस्या के खतरों से समाज को सचेत किया। कर्मभूमि में अस्पृश्यता की अमानवीय प्रथा पर चोट की। 58 वर्ष की अल्पायु में 8 अक्तूबर, 1936 को प्रेमचंद इस नश्वर दुनियां को छोड़कर चले गए। परन्तु वे अपने पीछे अमर साहित्य को छोड़कर गए कि उनके माध्यम से वे आज प्रासंगिक बने हुए हैं।
Contributors to this page: hindi and System Administrator .
Page last modified on Sunday April 7, 2013 05:41:18 UTC by hindi.

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