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भारत का संविधान दुनिया का सबसे बडा लिखित संविधान है। इसमें 395 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं। संविधान में सरकार के संसदीय स्‍वरूप की व्‍यवस्‍था की गई है जिसकी संरचना कुछ अपवादों के अतिरिक्त संघीय है। केन्‍द्रीय कार्यपालिका का सांविधानिक प्रमुख राष्‍ट्रपति है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार, केन्‍द्रीय संसद की परिषद् में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन है जिन्‍हें राज्‍यों की परिषद् राज्‍यसभा तथा लोगों का सदन लोकसभा के नाम से जाना जाता है। संविधान की धारा 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी जिसका प्रमुख प्रधान मंत्री होगा, राष्‍ट्रपति इस मंत्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्‍पादन करेगा। इस प्रकार वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद् में निहित है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है।

उत्तरदायित्व:

मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोगों के सदन (लोक सभा) के प्रति उत्तरदायी है। प्रत्‍येक राज्‍य में एक विधान सभा है। जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्‍यों में एक ऊपरी सदन है जिसे विधान परिषद् कहा जाता है। राज्‍यपाल राज्‍य का प्रमुख है। प्रत्‍येक राज्‍य का एक राज्‍यपाल होगा तथा राज्‍य की कार्यकारी शक्ति उसमें विहित होगी। मंत्रिपरिषद्, जिसका प्रमुख मुख्‍य मंत्री है, राज्‍यपाल को उसके कार्यकारी कार्यों के निष्‍पादन में सलाह देती है। राज्‍य की मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से राज्‍य की विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है।

संविधान की सातवीं अनुसूची में संसद तथा राज्‍य विधायिकाओं के बीच विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है। अवशिष्‍ट शक्तियाँ संसद में विहित हैं। केन्‍द्रीय प्रशासित भू- भागों को संघराज्‍य क्षेत्र कहा जाता है।


इतिहास:

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जुलाई 1945 में ब्रिटेन ने भारत संबन्धी अपनी नई नीति की घोषणा की तथा भारत की संविधान सभा के निर्माण के लिए एक कैबिनेट मिशन भारत भेजा जिसमें 3 मंत्री थे। 15 अगस्त, 1947 को भारत के आजाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। इस संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन मे कुल 166 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। भारत के संविधान के निर्माण में डॉ भीमराव अंबेदकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इसलिए उन्होंने संविधान का निर्माता कहा जाता है.


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भारतीय संविधान की प्रकृति -

संविधान प्रारूप समिति तथा सर्वोच्च न्यायालय ने इसको संघात्मक संविधान माना है परन्तु विद्वानों मे मतभेद है। अमेरीकी विद्वान इस को छद्म-संघात्मक-संविधान कहते हंै, हालांकि पूर्वी संविधानवेत्ता कहते हंै कि अमेरिकी संविधान ही एकमात्र संघात्मक संविधान नहीं हो सकता। संविधान का संघात्मक होना उसमंे निहित संघात्मक लक्षणों पर निर्भर करता है। किन्तु माननीय सर्वोच्च न्यायालय (पि कन्नादासन वाद) ने इसे पूर्ण संघात्मक माना है।


आधारभूत विशेषताएं-

1. शक्ति विभाजन -यह भारतीय संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण है, राज्य की शक्तियां केंद्रीय तथा राज्य सरकारों में विभाजित होती हैं शक्ति विभाजन के चलते दो सत्ता, केन्द्र व राज्य सत्ता होती है।

दोनों सत्ताएँ एक-दूसरे के अधीन नहीं होती हंै, वे संविधान से उत्पन्न तथा नियंत्रित होती हंै दोनों की सत्ता अपने अपने क्षेत्रो मंे पूर्ण होती हैं।

2. संविधान की सर्वोच्चता-संविधान के उपबंध संघ तथा राज्य सरकारों पर समान रूप से बाध्यकारी होते हंै केन्द्र तथा राज्य शक्ति विभाजित करने वाले अनुच्छेद 1 अनुच्छेद 54, 55, 73,162, 241 हैं।

2. भाग-5 सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय राज्य तथा केन्द्र के मध्य वैधानिक संबंध

3. अनुच्छेद 7 के अंतर्गत कोई भी सूची

4. राज्यांे का संसद में प्रतिनिधित्व

5 संविधान मंे संशोधन की शक्ति अनु 368, इन सभी अनुच्छेदांे मंे संसद अकेले संशोधन नहीं ला सकती है उसे राज्यो की सहमति भी चाहिए।

अन्य अनुच्छेद शक्ति विभाजन से सम्बन्धित नहीं है।

3. लिखित संविधान अनिवार्य रूप से लिखित रूप मंे होगा क्योंकि उसमंे शक्ति विभाजन का स्पष्ट वर्णन आवश्यक है। अतः संघ मंे लिखित संविधान अवश्य होगा।

4. संविधान की कठोरता इसका अर्थ है संविधान संशोधन मंे राज्य केन्द्र दोनांे भाग लेंगे।

5 न्यायालयांे की अधिकारिता- इसका अर्थ है कि केन्द्र-राज्य कानून की व्याख्या हेतु एक निष्पक्ष तथा स्वतंत्र सत्ता पर निर्भर करेंगे।

विधि द्वारा स्थापित 1.1 न्यायालय ही संघ-राज्य शक्तियांे के विभाजन का पर्यवेक्षण करेंगे।

1.2 न्यायालय सविन्धान के अंतिम व्याख्याकर्ता होंगे भारत में यह सत्ता सर्वोच्च न्यायालय के पास है ये पांच शर्ते किसी संविधान को संघात्मक बनाने हेतु अनिवार्य है।

भारत में ये पांचों लक्षण संविधान मंे मौजूद है अतः यह संघात्मक है परंतु

भारतीय संविधान मंे कुछ विभेदकारी विशेषताएं भी हंै।

1. यह संघ राज्यों के परस्पर समझौते से नहीं बना है।

2. राज्य अपना पृथक संविधान नहीं रख सकते है, केवल एक ही संविधान केन्द्र तथा राज्य दोनांे पर लागू होता है।

3. भारत मे द्वैध नागरिकता नही है। केवल भारतीय नागरिकता है।

4. भारतीय संविधान मंे आपातकाल लागू करने के उपबन्ध है ‘352’ अनुच्छेद, इसके लागू होने पर राज्य-केन्द्र शक्ति पृथक्करण समाप्त हो जायेगा तथा वह एकात्मक संविधान बन जायेगा। इस स्थिति मंे केन्द्र-राज्यों पर पूर्ण सम्प्रभु हो जाता है।

5. राज्यों का नाम, क्षेत्र तथा सीमा केन्द्र कभी भी परिवर्तित कर सकता है बिना राज्यों की सहमति से, अनुच्छेद 3, अतः राज्य भारतीय संघ के अनिवार्य घटक नही हैं। केन्द्र संघ को पुनर्निमित कर सकती है।

6. संविधान की 7 वीं अनुसूची मंे तीन सूचियाँ हैं संघीय, राज्य, तथा समवर्ती। इनके विषयों का वितरण केन्द्र के पक्ष मंे है।

6.1 संघीय सूची मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय हैं

6.2 इस सूची पर केवल संसद का अधिकार है

6.3 राज्य सूची के विषय कम महत्वपूर्ण हैं, 5 विशेष परिस्थितियों मे राज्य सूची पर संसद विधि निर्माण कर सकती है किंतु किसी एक भी परिस्थिति मे राज्य केन्द्र हेतु विधि निर्माण नहीं कर सकते।

क-1, अनु 249- राज्य सभा यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्रहित हेतु यह आवश्यक है दो तिहाई बहुमत से, किंतु यह बन्धन मात्र 1 वर्ष हेतु लागू होता है।

क-2, अनु 250- राष्ट्र आपातकाल लागू होने पर संसद को राज्य सूची के विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार स्वतः मिल जाता है

क-3, अनु 252-दो या अधिक राज्यों की विधायिका प्रस्ताव पास कर राज्य सभा को यह अधिकार दे सकती है केवल संबंधित राज्यों पर,

क-4 अनु-253--- अंतराष्ट्रीय समझौते के अनुपालन के लिए संसद राज्य सूची विषय पर विधि निर्माण कर सकती है।

क-5 अनु 356-जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होता है, उस स्थिति मे संसद उस राज्य हेतु विधि निर्माण कर सकती है

7. अनुच्छेद 155 -राज्यपालों की नियुक्ति पूर्णतः केन्द्र की इच्छा से होती है इस प्रकार केन्द्र राज्यों पर नियंत्रण रख सकता है।

8. अनु 360- वित्तीय आपातकाल की दशा मंे राज्यों के वित्त पर भी केन्द्र का नियंत्रण हो जाता है। इस दशा मंे केन्द्र राज्यों को धन व्यय करने हेतु निर्देश दे सकता है।

9. प्रशासनिक निर्देश अनु 256-257,-केन्द्र राज्यों को राज्यों की संचार व्यवस्था किस प्रकार लागू की जाये, के बारे मे निर्देश दे सकता है, ये निर्देश किसी भी समय दिये जा सकते है, राज्य इनका पालन करने हेतु बाध्य हैं। यदि राज्य इन निर्देशों का पालन न करंे तो राज्य मे संवैधानिक तंत्र असफल होने का अनुमान लगाया जा सकता है।

10. अनु 312 मे अखिल भारतीय सेवाओं का प्रावधान है ये सेवक नियुक्ति, प्रशिक्षण, अनुशासनात्मक क्षेत्रों मे पूर्णतः केन्द्र के अधीन है जबकि ये सेवा राज्यों में देते हंै राज्य सरकारों का इन पर कोई नियंत्रण नहीं है।

11. एकीकृत न्यायपालिका

12 राज्यों की कार्यपालिक शक्तियां संघीय कार्यपालिक शक्तियों पर प्रभावी नहीं हो सकती है।

संविधान की प्रस्तावना:

संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्रायः उनसे पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व मंे सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण यह ‘हम भारत के लोग’ इस वाक्य से प्रारम्भ होती है। केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद मे कहा गया था कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नहीं करती अतः संविधान विधि की विशेष अनुकृपा प्राप्त नही कर सकता, परंतु न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए संविधान को सर्वोपरि माना है जिस पर कोई प्रश्न नही उठाया जा सकता है।

संविधान के तीन भागः

संविधान के तीन प्रमुख भाग हैं। भाग एक में संघ तथा उसका राज्यक्षेत्रों के विषय में टिप्पणी की गई है तथा यह बताया गया है कि राज्य क्या हैं और उनके अधिकार क्या हैं। दूसरे भाग में नागरिकता के विषय में बताया गया है कि भारतीय नागरिक कहलाने का अधिकार किन लोगों के पास है और किन लोगों के पास नहीं है। विदेश में रहने वाले कौन लोग भारतीय नागरिक के अधिकार प्राप्त कर सकते हैं और कौन नहीं कर सकते। तीसरे भाग में भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के विषय में विस्तार से बताया गया है।

संविधान भाग 4 नीति निर्देशक तत्व

भाग 3 तथा 4 मिलकर संविधान की आत्मा तथा चेतना कहलाते हंै क्योंकि किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए मौलिक अधिकार तथा नीतिनिर्देश देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नीति निर्देशक तत्व जनतांत्रिक संवैधानिक विकास के नवीनतम तत्व हैं सर्वप्रथम ये आयरलैंड के संविधान मंे लागू किये गये थे। ये वे तत्व हंै जो संविधान के विकास के साथ ही विकसित हुए हैं। इन तत्वों का कार्य एक जनकल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। भारतीय संविधान के इस भाग में नीति निर्देशक तत्वों का रूपाकार निश्चित किया गया है, मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक तत्व मंे भेद बताया गया है और नीति निदेशक तत्वों के महत्व को समझाया गया है।

भाग 4- मूल कर्तव्य

ये रूस से प्रेरित होकर संविधान के भाग 4 (क) के अनुच्छेद 51- अ, मंे रखा गया है। ये कुल 11 हंै। इन्हंे 42 वंे संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है।

भाग 5- संघ

संघीय कार्यपालिका: संघीय कार्यपालिका मंे राष्ट्रपति ,उपराष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद तथा महान्यायवादी आते हंै। रामजवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य वाद मे सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका शक्ति को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है-

1. विधायिका न्यायपालिका के कार्यों को पृथक करने के पश्चात सरकार का बचा कार्य ही कार्यपालिका है।

2. कार्यपालिका में देश का प्रशासन, विधियांे का पालन सरकारी नीति का निर्धारण ,विधेयकों की तैयारी करना, कानून व्यवस्था बनाये रखना, सामाजिक आर्थिक कल्याण को बढ़ावा देना, विदेश नीति निर्धारित करना आदि आता है।

राष्ट्रपति

भारतीय राष्ट्रपति संघ का कार्यपालक अध्यक्ष है। संघ के सभी कार्यपालक कार्य उस के नाम से किये जाते हंै अनु 53 के अनुसार संघ की कार्यपालक शक्ति उसमें निहित है इन शक्तियां कार्यों का प्रयोग क्रियान्वय्ान राष्ट्रपति संविधान के अनुरूप ही सीधे अथवा अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करेगा। वह सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनानायक भी होता है, सभी प्रकार के आपातकाल लगाने व हटाने वाला युद्ध शांति की घोषणा करने वाला होता है वह देश का प्रथम नागरिक है तथा राज्य द्वारा जारी वरीयता क्रम मंे उसका सदैव प्रथम स्थान होता है। भारतीय राष्ट्रपति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है तथा उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए। राष्ट्रपति का चुनाव, उस पर महाभियोग की अवस्थाएँ, उसकी शक्तियाँ, संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति की स्थिति, राष्ट्रपति की संसदीय शक्ति तथा राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियों का वर्णन इस अध्याय में किया गया है।


उपराष्ट्रपति

मंत्रिपरिषद- संसदीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण सिद्धांत

1. राज्य प्रमुख, सरकार प्रमुख न होकर मात्र संवैधानिक प्रमुख ही होता है

2. वास्तविक कार्यपालिका शक्ति, मंत्रिपरिषद जो कि सामूहिक रूप से संसद के निचले सदन के सामने उत्तरदायी होगा के पास होगी

3 मंत्रिपरिषद के सदस्य संसद के सद्स्यों से लिए जायेंगे



परिषद का गठन

1. प्रधानमंत्री के पद पर आते ही यह परिषद गठित हो जाती है यह आवश्यक नही है कि उसके साथ कुछ अन्य मंत्री भी शपथ लें केवल प्रधानमंत्री ही मंत्रिपरिषद होगा।

2 मंत्रिपरिषद की सद्स्य संख्या पर मौलिक संविधान मंे कोई रोक नहीं थी किंतु 91वें संशोधन के द्वारा मंत्रिपरिषद की संख्या लोकसभा के सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत तक सीमित कर दी गयी वही राज्यों मंे भी मंत्रीपरिषद की संख्या विधानसभा के 15 फीसदी से अधिक नहीं होगी परंतु न्यूनतम 12 मंत्री होंगे।

मंत्रियों की श्रेणियाँ-संविधान मंत्रियों की श्रेणी निर्धारित नहीं करता। यह निर्धारण अंग्रेजी प्रथा के आधार पर किया गया है

कुल तीन प्रकार के मंत्री माने गये है-

1. कैबिनेट मंत्री-सर्वाधिक वरिष्ठ मंत्री हंै उनसे ही कैबिनेट का गठन होता है। मंत्रालय मिलने पर वे उसके अध्यक्ष होते हंै उनकी सहायता हेतु राज्य मंत्री तथा उपमंत्री होते हंै। उन्हें कैबिनेट बैठक मंे बैठने का अधिकार होता है। अनु 352 उन्हें मान्यता देता है।


2. राज्य मंत्री- द्वितीय स्तर के मंत्री होते हंै सामान्यतया उन्हंे मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार नहीं मिलता किंतु प्रधानमंत्री चाहे तो यह कर सकता है उन्हें कैबिनेट बैठक में आने का अधिकार नहीं होता।

3. उपमंत्री- कनिष्ठतम मंत्री हंै उनका पद सृजन कैबिनेट या राज्य मंत्री को सहायता देने हेतु किया जाता है वे मंत्रालय या विभाग का स्वतंत्र प्रभार भी नहीं लेते हंै।

4. संसदीय सचिव- सत्तारूढ़ दल के संसद सदस्य होते हंै इस पद पर नियुक्त होने के पश्चात वे मंत्रीगण की संसद तथा इसकी समितियों मंे कार्य करने मंे सहायता देते हंै। वे प्रधानमंत्री की इच्छा से पद ग्रहण करते हंै। वे पद की गोपनीयता की शपथ भी प्रधानमंत्री के द्वारा ग्रहण करते हंै वास्तव में वे मंत्री परिषद के सद्स्य नहीं होते हंै केवल मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।

मंत्रिमंडल

मंत्रिपरिषद एक संयुक्त निकाय है जिसमें 1,2, या 3 प्रकार के मंत्री होते हैं यह बहुत कम मिलता है, चर्चा करता है या निर्णय लेता है वहीं मंत्रिमंडल मे मात्र कैबिनेट प्रकार के मंत्री होते हंै यह समय समय पर मिलती है तथा समस्त महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। इसके द्वारा स्वीकृत निर्णय अपने आप परिषद द्वारा स्वीकृत निर्णय मान लिये जाते हैं। यही देश का सर्वाधिक मह्त्वपूर्ण निर्णय लेने वाला निकाय है।




सम्मिलित उत्तरदायित्व अनु 75-3, के अनुसार मंत्रिपरिषद संसद के सामने सम्मिलित रूप से उत्तरदायी है इसका लक्ष्य मंत्रिपरिषद मंे संगति लाना है ताकि उसमंे आंतरिक रूप से विवाद पैदा न हो।

व्यक्तिगत उत्तरदायित्व अनु 75-2, के अनुसार मंत्री व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति के सामने उत्तरदायी होते हंै किंतु यदि प्रधानमंत्री की सलाह न हो तो राष्ट्रपति मंत्री को पदच्युत नहीं कर सकता है।

भारत का महान्यायवादीः भारत का महान्यायवादी संसद के किसी भी सदन का सदस्य न रहते हुए भी संसद की कार्रवाई में भाग ले सकता है ।

प्रधानमंत्री-प्रधानमंत्री की दशा समानों मे प्रधान की तरह है वह कैबिनेट का मुख्य स्तंभ है। मंत्रीपरिषद का मुख्य सद्स्य भी वही है अनु 74 स्पष्ट रूप से मंत्रिपरिषद की अध्यक्षता तथा संचालन हेतु प्रधानमंत्री की उपस्तिथि आवश्यक मानता है उसकी मृत्यु या त्यागपत्र की द्शा मे समस्त परिषद को पद छोड़ना पड़ता है वह अकेले ही मंत्रीपरिषद का गठन करता है। राष्ट्रपति मंत्रीगण की नियुक्ति उसकी सलाह से ही करता है। मंत्रीगण के विभाग का निर्धारण भी वही करता है। कैबिनेट के कार्य का निर्धारण भी वही करता है। देश के प्रशासन को निर्देश भी वही देता है। सभी नीतिगत निर्णय वही लेता है। राष्ट्रपति तथा मंत्रीपरिषद के मध्य संपर्क सूत्र भी वही है। परिषद का प्रधान प्रवक्ता भी वही है। परिषद के नाम से लड़ी जाने वाली संसदीय बहसों का नेतृत्व करता है। संसद में परिषद के पक्ष मंे लड़ी जा रही किसी भी बहस मंे वह भाग ले सकता है। मन्त्रीगण के मध्य समन्वय भी वही करता है वह किसी भी मंत्रालय से कोई भी सूचना मंगवा सकता है। इन सब कारणों के चलते प्रधानमंत्री को देश का सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक व्यक्तित्व माना जाता है।

सरकार के प्रकार- प्रधानमंत्री सरकार संसदीय सरकार का ही प्रकार है। जिसमे प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करता है। वह कैबिनेट की निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है। वह कैबिनेट से अधिक शक्तिशाली है। उसके निर्णय ही कैबिनेट के निर्णय हैं। देश की सामान्य नीतियाँ कैबिनेट द्वारा निर्धारित नहीं होती हंै। यह कार्य प्रधानमंत्री अपने निकट सहयोगी चाहे वह मंत्रिपरिषद के सद्स्य न हो की, सहायता से करता है जैसे कि इंदिरा गाँधी अपने किचन कैबिनेट की सहायता से करती थी।

प्रधानमंत्री सरकार के लाभ

1 तीव्र तथा कठोर निर्णय ले सकती है

2 देश को राजनैतिक स्थाईत्व मिलता है

इससे कुछ हानि भी हंै

1 कैबिनेट ऐसे निर्णय लेती है जो सत्तारूढ़ दल के हित मंे हो न कि देश के हित में

2 इसके द्वारा गैर संवैधानिक शक्ति केन्द्रों का जन्म होता है

कैबिनेट सरकार

संसदीय सरकार का ही प्रकार है इसमंे नीतिगत निर्णय सामूहिक रूप से कैबिनेट मंत्रिमंडल, लेता है इसमंे प्रधानमंत्री कैबिनेट पर छा नहीं जाता है, इसके निर्णय सामान्यतया संतुलित होते हंै लेकिन कभी कभी वे इस तरह के होते हंै जो अस्पष्ट तथा साहसिक नहीं होते हंै। 1989 के बाद देश मंे प्रधानमंत्री प्रकार का नहीं बल्कि कैबिनेट प्रकार का शासन रहा है।

कामचलाऊ सरकार-बहुमत समाप्त हो जाने के बाद जब मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे देती है तब कामचलाऊ सरकार अस्तित्व मंे आती है। अथवा प्रधानमंत्री की मृत्यु त्यागपत्र की दशा मंे यह स्थिति आती है। यह सरकार अंतरिम प्रकृति की होती है, यह तब तक स्थापित रहती है जब तक नयी मंत्रिपरिषद शपथ न ले ले। यह इसलिए काम करती है ताकि अनु 74 के अनुरूप एक मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति की सहायता हेतु रहे। वी.एन. राव बनाम भारत संघ वाद मंे सुप्रीमकोर्ट ने माना था कि मंत्रिपरिषद सदैव मौजूद रहनी चाहिए यदि यह अनुपस्थित हुई तो राष्ट्रपति अपने काम स्वयं करने लगेगा जिससे सरकार का रूप बदल कर राष्ट्रपति हो जायेगा जो कि संविधान के मूल ढाँचे के खिलाफ होगा। यह कामचलाऊ सरकार कोई भी वित्तीय-नीतिगत निर्णय नहीं ले सकती है। क्योंकि उस समय लोकसभा मौजूद नहीं रहती है। वह केवल देश का दैनिक प्रशासन चलाती है। इस प्रकार की सरकार के सामने सबसे विकट स्थिति तब आ गयी थी। जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को 1999 मे कारगिल युद्ध का संचालन करना पड़ा था। किंतु विकट दशा में इस प्रकार की सरकार भी कोई भी नीति निर्णय ले सकती है।


सुस्थापित परंपराए-एक संसदीय सरकार में ये परंपराएं ऐसी प्रथाएँ मानी जाती हैं जो सरकार के सभी अंगों पर वैधानिक रूप से लागू मानी जाती हंै उनका वर्णन करने के लिये कोई विधान नहीं होता है न ही संविधान मंे किसी देश के शासन के बारे मंे पूर्ण वर्णन किया जा सकता है। संविधान निर्माता भविष्य मंे होने वाले विकास तथा देश के शासन पर उनके प्रभाव का अनुमान नहीं लगा सकते अतः वे उनके संबंध मंे संविधान में प्रावधान भी नहीं कर सकते हंै

इस तरह संविधान एक जीवित शरीर तो है परंतु पूर्ण वर्णन नहीं है इस वर्णन मंे बिना संशोधन लाये परिवर्तन भी नहीं हो सकता है वही पंरपराए संविधान के प्रावधानांे की तरह वैधानिक नहीं होती वे सरकार के संचालन में स्नेहक का कार्य करते हैं तथा सरकार का प्रभावी संचालन करने मंे सहायक हैं।

परंपराएं इसलिए पालित की जाती हंै क्योंकि उनके अभाव में राजनैतिक कठिनाइयां आ सकती हंै इसी कारण उन्हें संविधान का पूरक माना जाता है। ब्रिटेन मंे हम इनका सबसे विकसित तथा प्रभावशाली रूप देख सकते हैं।

इनके दो प्रकार हैं प्रथम वे जो संसद तथा मंत्रिपरिषद के मध्य संयोजन का कार्य करती हैं यथा अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर परिषद का त्यागपत्र दे देना।

द्वितीय वे जो विधायिका की कार्यवाहियों से संबंधित हंै जैसे किसी बिल का तीन बार वाचन संसद के तीन सत्र राष्ट्रपति द्वारा धन बिल को स्वीकृति देना, उपस्पीकर का चुनाव विपक्ष से करना, जब स्पीकर सत्ता पक्ष से चुना गया हो आदि।

सरकार के संसदीय तथा राष्ट्रपति प्रकार

संसदीय शासन के समर्थन मे तर्क

1. राष्ट्रपतीय शासन मंे राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका होता है जो जनता द्वारा निश्चित समय के लिये चुना जाता है। वह विधायिका के प्रति उत्तरदायी भी नहीं होता है। उसके मंत्री भी विधायिका के सदस्य नहीं होते हंै तथा उसी के प्रति उत्ततदायी होंगे न कि विधायिका के प्रति।

वही संसदीय शासन मंे शक्ति मंत्रिपरिषद के पास होती है जो विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती हंै

2. भारत की विविधता को देखते हुए संसदीय शासन ज्यादा उपयोगी है इसमंे देश के सभी वर्गों के लोग मंत्रिपरिषद मंे लिये जा सकते हंै

3. इस् शासन मंे संघर्ष होने विधायिका तथा मंत्रिपरिषद के मध्य, की संभावना कम रहती है क्योंकि मंत्री विधायिका के सदस्य भी होते हंै

4. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश मंे सर्वमान्य रूप से राष्ट्रपति का चुनाव करना लगभग असंभव है।

5. मिंटे मार्ले सुधार 1909 के समय से ही संसदीय शासन से भारत के लोग परिचय रखते हैंै।



भाग पाँच, अध्याय 2, संसद

राज्य सभा: राज्यों को संघीय स्तर पर प्रतिनिधित्व देने वाली सभा है जिसका कार्य संघीय स्तर पर राज्य हितों का संरक्षण करना है। इसे संसद का दूसरा सदन कहते हंै इसके सदस्य दो प्रकार से निर्वाचित होते हंै राज्यों से 238 को निर्वाचित करते हैं तथा राष्ट्रपति द्वारा 12 को मनोनीत होते हंै। वर्तमान मंे यह संख्या क्रमश 233 और 12 है ये सद्स्य 6 वर्ष हेतु चुने जाते हैं इनका चयन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के द्वारा होता है। मत एकल संक्रमणीय प्रणाली से डाले जाते हैं। मत खुले डाले जाते हैं. सद्स्य जो निर्वाचित होना चाहते हंै देश के किसी भी संसदीय क्षेत्र से एक निर्वाचक के रूप में पंजीकृत होने चाहिए।

राज्यसभा की विशेष शक्तियाँ

राज्यसभा के पास तीन विशेष शक्तिया होती हैं-

अनु. 249 के अंतर्गत राज्य सूची के विषय पर 1 वर्ष का बिल बनाने का हक

अनु. 312 के अंतर्गत नवीन अखिल भारतीय सेवा का गठन दो तिहाई बहुमत से करना

अनु. 67-ब, उपराष्ट्रपति को हटाने वाला प्रस्ताव राज्यसभा मंे ही लाया जा सकेगा।

राज्य सभा का संघीय स्वरूप

राज्य सभा का गठन ही राज्य परिषद के रूप में संविधान के संघीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व देने के लिये हुआ था।

राज्य सभा के सद्स्य मंत्रिपरिषद के सदस्य बन सकते हैं जिससे संघीय स्तर पर निर्णय लेने मंे राज्य का प्रतिनिधित्व होगा।

राष्ट्रपति के निर्वाचन तथा महाभियोग तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन मंे समान रूप से भाग लेती है।

अनु 249, 312 भी राज्यसभा के संघीय स्वरूप तथा राज्यों के संरक्षक रूप मंे उभारते हैं।

सभी संविधान संशोधन बिल भी इसके द्वारा पृथक सभा कर तथा दो तिहाई बहुमत से पास होंगे।

संसद की स्वीकृति चाहने वाले सभी प्रस्ताव जो कि आपातकाल से जुड़े हांे भी राज्यसभा द्वारा पारित होंगे।

राज्य सभा के गैर संघीय तत्व

संघीय क्षेत्रों को भी राज्य सभा मंे प्रतिनिधित्व मिलता है जिससे इसका स्वरूप गैर संघीय हो जाता है।

राज्यांे का प्रतिनिधित्व राज्यों की समानता के आधार पर नहीं है जैसा कि अमेरिका मंे है वहाँ प्रत्येक राज्य को सीनेट मंे दो स्थान मिलते हंै किंतु भारत मंे स्थानों का आवंटन आबादी के आधार पर किया गया है।


राज्य सभा में मनोनीत सदस्यों का प्रावधान


राज्य सभा का महत्व- किसी भी संघीय शासन मंे संघीय विधायिका का ऊपरी भाग संवैधानिक बाध्यता के चलते राज्य हितों की संघीय स्तर पर रक्षा करने वाला बनाया जाता है। इसी सिद्धांत के चलते राज्य सभा का गठन हुआ है, इसी कारण राज्य सभा को सदनों की समानता के रूप मे देखा जाता है जिसका गठन ही संसद के द्वितीय सदन के रूप में हुआ है।

यह जनतंत्र की मांग है कि जहाँ लोकसभा सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है विशेष शक्तियों का उपभोग करती है

,लोकतंत्र के सिद्धांत के अनुरूप मंत्रिपरिषद भी लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होने के लिये बाध्य करते हंै किंतु ये दो कारण किसी भी प्रकार से राज्यसभा का महत्व कम नहीं करते हैं।

राज्यसभा का गठन एक पुनरीक्षण सदन के रूप मंे हुआ है जो लोकसभा द्वारा पास किये गये प्रस्तावों की पुनरीक्षा करे।

यह मंत्रिपरिषद मंे विशेषज्ञों की कमी भी पूरी कर सकती है क्योंकि कम से कम 12 विशेषज्ञ तो इसमंे मनोनीत होते ही हंै।

आपातकाल लगाने वाले सभी प्रस्ताव जो राष्ट्रपति के सामने जाते है राज्य सभा द्वारा भी पास होने चाहिये।


राज्य सभा का महत्व यह है कि जहाँ लोकसभा सदैव सरकार से सहमत होती है जबकि राज्यसभा सरकार की नीतियों का निष्पक्ष मूल्याँकन कर सकती है।

मात्र नैतिक प्रभाव सरकार पर डालती है किंतु यह लोकस्भा के प्रभाव की तुलना मे ज्यादा होता है। राज्य सभा के पदाधिकारी उनका निर्वाचन, शक्ति, कार्य, उत्तरदायित्व तथा पदच्युति।

लोकसभा

यह संसद का लोकप्रिय सदन है जिसमें निर्वाचित मनोनीत सदस्य होते हंै संविधान के अनुसार लोकसभा का विस्तार राज्यों से चुने गये 530, संघ क्षेत्र से चुने गये 20 और राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 2 आंग्ल भारतीय सदस्यों तक होगा वर्तमान मंे राज्यों से 530 ,संघ क्षेत्रों से 13 तथा 2 आंग्ल भारतीय सद्स्यों से सदन का गठन किया गया है कुछ स्थान अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित है।

प्रत्येक राज्य को उसकी आबादी के आधार पर सदस्य मिलते हैं अगली बार लोकसभा के सदस्यों की संख्या वर्ष 2026 मंे निर्धारित किया जायेगा। वर्तमान मंे यह 1971 की जनसंख्या पर आधारित हैं इससे पहले प्रत्येक दशक की जनगणना के आधार पर सदस्य स्थान निर्धारित होते थे यह कार्य बकायदा 84 वंे संविधान संशोधन से किया गया था ताकि राज्य अपनी आबादी के आधार पर ज्यादा से ज्यादा स्थान प्राप्त करने का प्रयास नहीं करें।

लोकसभा की कार्यावधि 5 वर्ष है परंतु इसे समय से पूर्व भंग किया जा सकता है।


लोकसभा की विशेष शक्तियाँ

मंत्री परिषद केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। अविश्वास प्रस्ताव सरकार के विरूद्ध केवल यही लाया जा सकता है। धन बिल पारित करने मंे यह निर्णायक सदन है।

राष्ट्रीय आपातकाल को जारी रखने वाला प्रस्ताव केवल लोकसभा मंे लाया और पास किया जायेगा।

लोकसभा के पदाधिकारी

स्पीकर: लोकसभा का अध्यक्ष होता है। इसका चुनाव लोकसभा सदस्य अपने मध्य मंे से करते हंै इसके दो कार्य है।

1. लोकसभा की अध्यक्षता करना उसमंे अनुशासन गरिमा तथा प्रतिष्ठा बनाये रखना इस कार्य हेतु वह किसी न्यायालय के सामने उत्तरदायी नहीं होता है।

2. वह लोकसभा से संलग्न सचिवालय का प्रशासनिक अध्यक्ष होता है किंतु इस भूमिका के रूप मे वह न्यायालय के समक्ष उत्तरदायी होगा।

विशेष शक्तियाँ

1. दोनांे सदनों का सम्मिलित सत्र बुलाने पर स्पीकर ही उसका अध्यक्ष होगा उसके अनुपस्थित होने पर उप-स्पीकर तथा उसके भी न होने पर राज्यसभा का उपसभापति अथवा सत्र द्वारा नांमाकित कोई भी सदस्य सत्र का अध्यक्ष होता है।

2. धन बिल का निर्धारण स्पीकर करता है। यदि धन बिल पर स्पीकर साक्ष्यांकित नहीं करता तो वह धन बिल ही नहीं माना जायेगा। उसका निर्धारण अंतिम तथा बाध्यकारी होगा।

3. सभी संसदीय समितियाँ उसकी अधीनता में काम करती हंै उसके किसी समिति का सदस्य चुने जाने पर वह उसका पदेन अध्यक्ष होगा।

4. लोकसभा के विघटन होने पर भी उसका प्रतिनिधित्व करने के लिये स्पीकर पद पर कार्य करता रहता है। नवीन लोकसभा चुने जाने पर वह अपना पद छोड़ देता है।

स्पीकर प्रोटेम कार्यवाहक-जब कोई नवीन लोकसभा चुनी जाती है तब राष्ट्रपति उस सदस्य को कार्यवाहक स्पीकर नियुक्त करता है। जिसको संसद मंे सदस्य होने का सबसे लंबा अनुभव होता है। वह राष्ट्रपति द्वारा शपथ ग्रहण करता है।

उसके दो कार्य होते हंै-

1. संसद सदस्यों को शपथ दिलवाना

2. नवीन स्पीकर चुनाव प्रक्रिया का अध्यक्ष भी वही बनता है

उप-स्पीकर

विधायिका संसद- राज्य विधायिका, मंे बहुमत के प्रकार-

1. सामान्य बहुमत-उपस्थित सदस्यों तथा मतदान करने वालों के 50 प्रतिशत से अधिक सदस्य ही सामान्य बहुमत हंै इस बहुमत का सदन की कुल सदस्य संख्या से कोई संबंध नहीं होता है।

भारतीय संविधान के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास प्रस्ताव, कामरोको प्रस्ताव, सभापति ,उपसभापति तथा अध्यक्ष के चुनाव हेतु सदन के यदि संविधान संशोधन का प्रस्ताव राज्य विधायिकाओं को भेजना हो, सामान्य बिल, धन बिल, राष्ट्रपति शासन, वित्तीय आपातकाल लगाने हेतु सामान्य बहुमत को मान्यता प्राप्त है। यदि बहुमत के प्रकार का निर्देश न होने पर उसे सदैव सामान्य बहुमत समझा जाता है।

2. पूर्ण बहुमत-सदन के 50 प्रतिशत से अधिक सदस्यों का बहुमत खाली सीटंे भी गिनी जाती हंै, लोकसभा मंे 273, राज्यसभा मंे 123 सदस्यों का समर्थन. इसका राजनैतिक मह्त्व है न कि वैधानिक महत्व।

3. प्रभावी बहुमत- मतदान के समय उपस्थित सदन के 50 प्रतिशत से अधिक सदस्यों की खाली सीटों को छोड़कर, यह तब प्रयोग आती है जब लोक सभा अध्यक्ष उपाध्यक्ष या राज्यसभा के उपसभापति को पद से हटाना हो या जब राज्यसभा उपराष्ट्रपति को पद से हटाने हेतु मतदान करे

4. विशेष बहुमत- प्रथम तीनांे प्रकार के बहुमत से भिन्न होता है इसके तीन प्रकार है

क, अनु 249 के अनुसार- उपस्थित तथा मतदान देने वालों के दो तिहाई संख्या को विशेष बहुमत कहा गया है

ख, अनु 368 के अनुसार- संशोधन बिल सदन के उपस्थित तथा सदन में मत देने वालों के दो तिहाई संख्या जो कि सदन के कुल सदस्य संख्या का भी बहुमत हो। लोकसभा मंे 273 सदस्य, इस बहुमत से संविधान संशोधन, न्यायधीशॉ को पद से हटाना तथा राष्ट्रीय आपातकाल लगाना, राज्य विधान सभा द्वारा विधान परिषद की स्थापना अथवा विच्छेदन की मांग के प्रस्ताव पारित किये जाते हैं।

ग, अनु 61 के अनुसार- केवल राष्ट्रपति के महाभियोग हेतु सदन के कुल संख्या का कम से कम दो तिहाई लोकसभा मंे 364 सदस्य होने पर।

लोकसभा के सत्र

अनु 85 के अनुसार संसद सदैव इस तरह से आयोजित की जाती रहेगी कि संसद के दो सत्रों के मध्य 6 मास से अधिक अंतर न हो पंरपरानुसार संसद के तीन नियमित सत्रों तथा विशेष सत्रों मंे आयोजित की जाती है।

सत्रों का आयोजन राष्ट्रपति की विज्ञप्ति से होता है

1. बजट सत्र वर्ष का पहला सत्र होता है सामान्यतः फरवरी मई के मध्य चलता है। यह सबसे लंबा तथा महत्वपूर्ण सत्र माना जाता है इसी सत्र मंे बजट प्रस्तावित तथा पारित होता है। सत्र के प्रांरभ मंे राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है।

2. मानसून सत्र जुलाई अगस्त के मध्य होता है

3. शरद सत्र नवम्बर-दिसम्बर के मध्य होता है सबसे कम समयावधि का सत्र होता है

विशेष सत्र- इस के दो भेद हैं

1. संसद के विशेष सत्र.

2. लोकसभा के विशेष सत्र.

संसद के विशेष सत्र-मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति इनका आयोजन करता है। ये किसी नियमित सत्र के मध्य अथवा उससे पृथक आयोजित किये जाते हंै।

एक विशेष सत्र मंे कोई विशेष कार्य चर्चित तथा पारित किया जाता है। यदि सदन चाहे भी तो अन्य कार्य नहीं कर सकता है।

लोकसभा का विशेष सत्र- अनु 352 मंे इसका वर्णन है किंतु इसे 44 वें संशोधन 1978 से स्थापित किया गया है यदि

लोकसभा के कम से कम 1/10 सदस्य एक प्रस्ताव लाते हंै जिसमंे राष्ट्रीय आपातकाल को जारी न रखने

की बात कही गयी हैं तो नोटिस देने के 14 दिन के भीतर सत्र बुलाया जायेगा

सत्रावसान- मंत्रिपरिषद की सलाह पर सदन का सत्रावसान राष्ट्रपति करता है। इसमें संसद का एक सत्र समाप्त हो जाता है तथा संसद दुबारा तभी सत्र कर सकती है जब राष्ट्रपति सत्रांरभ का सम्मन जारी कर दे। सत्रावसान की दशा मंे संसद के समक्ष लम्बित कार्य समाप्त नहीं हो जाते हंै।

स्थगन- किसी सदन के सभापति द्वारा सत्र के मध्य एक लघु अवधि का अन्तराल लाया जाता है इससे

सत्र समाप्त नहीं हो जाता, न उसके समक्ष लम्बित कार्य समाप्त हो जाते हंै, यह दो प्रकार का होता है

1. अनिश्चित कालीन 2. जब अगली मीटिग का समय दे दिया जाता है।

लोकसभा का विघटन- राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया है। इससे लोकसभा का जीवन समाप्त हो जाता है। इसके बाद आमचुनाव ही होते हंै। विघटन के बाद सभी लंबित कार्य जो लोकसभा के समक्ष होते हंै समाप्त हो जाते हैं किंतु बिल जो राज्यसभा मंे लाये गये हों और वही लंबित होते हंै। समाप्त नहीं होते या या बिल जो राष्ट्रपति के सामने विचाराधीन हो वे भी समाप्त नहीं होते हैं या राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की लोकसभा विघटन से पूर्व संयुक्त बैठक बुला लें।

विधायिका संबंधी कार्यवाही

प्रक्रिया बिल विधेयक के प्रकार कुल 4 प्रकार होते हैं

सामान्य बिल
इसकी 6 विशेषताएँ हंै

1. परिभाषित हो

2. राष्ट्रपति की अनुमति हो

3. बिल कहाँ प्रस्तावित हो

4. सदन की विशेष शक्तियों मंे आता हो

5. कितना बहुमत चाहिए

6. गतिवरोध पैदा होना

यह वह विधेयक होता है जो संविधान संशोधन धन या वित्त विधेयक नहीं है। यह संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। यदि अनुच्छेद 3 से जुड़ा न हो तो इसको राष्ट्रप्ति की अनुंशसा भी नहीं चाहिए।

इस बिल को पारित करने में दोनांे सदनों की विधायी शक्तियाँ बराबर होती हंै इसे पारित करने मंे सामान्य बहुमत

चाहिए एक सदन द्वारा अस्वीकृत कर देने पर यदि गतिवरोध पैदा हो जाये तो राष्ट्रपति दोनांे सद्नों की संयुक्त बैठक मंत्रिपरिषद की सलाह पर बुला लेता है।

राष्ट्रपति के समक्ष यह विधेयक आने पर वह इस को संसद को वापस भेज सकता है या स्वीकृति दे सकता है या अनिश्चित काल हेतु रोक सकता है।

धन बिल-विधेयक जो पूर्णतः एक या अधिक मामलों जिनका वर्णन अनुच्छेद 110 में किया गया हो से जुड़ा हो, धन बिल कहलाता है, ये मामलें हैं-

1. किसी कर को लगाना, हटाना, नियमन

2. धन उधार लेना या कोई वित्तीय जिम्मेदारी जो भारत सरकार ले

3. भारत की आपात संचित निधि से धन की निकासी/जमा करना

4. संचित निधि की धन मात्रा का निर्धारण

5. ऐसे व्यय जिन्हें भारत की संचित निधि पर भारित या घोषित करना हो

6. संचित निधि मंे धन निकालने की स्वीकृति लेना

7. ऐसा कोई मामला लेना जो इस सबसे भिन्न हो

धन बिल केवल लोकसभा मंे प्रस्तावित किए जा सकते हंै। इसे लाने से पूर्व राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है। इन्हें पास करने के लिये सदन का सामान्य बहुमत आवश्यक होता है।

धन बिल मंे न तो राज्य सभा संशोधन कर सकती है न अस्वीकार।

जब कोई धन बिल लोकसभा पारित करती है तो स्पीकर के प्रमाणन के साथ यह बिल राज्यसभा मंे ले जाया जाता है। राज्यसभा इस बिल को पारित कर सकती है या 14 दिन के लिये रोक सकती है। किंतु उस के बाद यह बिल दोनों सदनों द्वारा पारित माना जायेगा। राज्य सभा द्वारा सुझाया कोई भी संशोधन लोक सभा की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वह स्वीकार करे या न करे। जब इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा तो वह सदैव इसे स्वीकृति दे देगा।

फायनंेसियल बिल वह विधेयक जो एक या अधिक मनीबिल प्रावधानों से पृथक हो तथा गैर मनी मामलों से भी संबधित हो एक फाइनेंस विधेयक मंे धन प्रावधानों के साथ-साथ सामान्य विधायन से जुड़े मामले भी होते हंै। इस प्रकार के विधेयक को पारित करने की शक्ति दोनांे सदनों मंे समान होती है।

संविधान संशोधन विधेयक

अनु. 368 के अंतर्गत प्रस्तावित बिल जो कि संविधान के एक या अधिक प्रस्तावों को संशोधित करना चाहता है, संशोधन बिल कहलाता है। यह किसी भी संसद के सदन में बिना राष्ट्रपति की स्वीकृति के लाया जा सकता है। इस विधेयक को सदन द्वारा कुल उपस्थित सदस्यों की दो तिहाई संख्या तथा सदन के कुल बहुमत द्वारा ही पास किया जायेगा। दूसरा सदन भी इसे इसी प्रकार पारित करेगा। किंतु इस विधेयक को सदनों के पृथक सम्मेलन मंे पारित किया जायेगा। गतिरोध आने की दशा मंे जैसा कि सामान्य विधेयक की स्थिति मंे होता है, सदनों की संयुक्त बैठक नहीं बुलायी जायेगी। 24 वंे संविधान संशोधन 1971 के बाद से यह अनिवार्य कर दिया गया है कि राष्ट्रपति इस बिल को अपनी स्वीकृति दे ही दंे।

विधेयक पारित करने मे आया गतिरोध

जब संसद के दोनों सदनों के मध्य बिल को पास करने से संबंधित विवाद हो या जब एक सदन द्वारा पारित बिल को दूसरा अस्वीकृत कर दे या इस तरह के संशोधन कर दे जिसे मूल सदन अस्वीकर कर दे या इसे 6 मास तक रोके रखे तब सदनों के मध्य गतिरोध की स्थिति जन्म लेती है। अनु. 108 के अनुसार राष्ट्रपति इस दशा में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला लेगा जिसमें सामान्य बहुमत से फैसला हो जायेगा। अब तक मात्र तीन अवसरों पर इस प्रकार की बैठक बुलायी गयी है।

1. दहेज निषेध एक्ट 1961

बैंकिग सेवा नियोजन संशोधन एक्ट 1978
पोटा एक्ट 2002
संशोधन के विरूद्ध सुरक्षा उपाय

1. न्यायिक पुनरीक्षा का पात्र है

2. संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध न हो

3. संसद की संशोधन शक्ति के भीतर आता हो

4. संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन तीनों अंगांे का संतुलन बना रहे।

5. संघ के ढाँचे से जुड़ा होने पर आधे राज्यों की विधायिका से स्वीकृति मिले।

6. गठबंधन राजनीति भी संविधान संशोधन के विरूद्ध प्रभावी सुरक्षा उपाय देती है। क्योंकि एकदलीय पूर्ण बहुमत के दिन समाप्त हो चुके होते हैं।

अध्यादेश जारी करना

अनु. 123 राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है। यह तब जारी होगा जब राष्ट्रपति संतुष्ट हो जाये कि परिस्थितियाँ ऐसी हो कि तुरंत कार्यवाही करने की जरूरत है तथा संसद का एक या दोनों सदन सत्र मंे नहीं है तो वह अध्यादेश जारी कर सकता है। यह अध्यादेश संसद के पुनः सत्र के 6 सप्ताह के भीतर अपना प्रभाव खो देगा। यधपि दोनांे सदनों द्वारा स्वीकृति देने पर यह जारी रहेगा यह शक्ति भी न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण की पात्र है किंतु शक्ति के गलत प्रयोग या दुर्भावना को सिद्ध करने का कार्य उस व्यक्ति पर होगा जो इसे चुनौती दे। अध्यादेश जारी करने हेतु संसद का सत्रावसान करना भी उचित हो सकता है क्योंकि अध्यादेश की जरूरत तुरंत हो सकती है। जबकि संसद कोई भी अधिनियम पारित करने मंे समय लेती है, अध्यादेश को हम अस्थाई विधि मान सकते हंै। यह राष्ट्रपति की विधायिका शक्ति के अन्दर आता है न कि कार्यपालिका। वैसे ये कार्य भी वह मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है, यदि कभी संसद किसी अध्यादेश को अस्वीकार दे तो वह नष्ट भले ही हो जाये किंतु उसके अंतर्गत किये गये कार्य अवैधानिक नहीं हो जाते हंै।

राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति पर नियंत्रण

1. प्रत्येक जारी किया हुआ अध्यादेश संसद के दोनांे सदनांे द्वारा उनके सत्र शुरु होने के 6 हफ्ते के भीतर स्वीकृत करवाना होगा। इस प्रकार कोई अध्यादेश संसद की स्वीकृति के बिना 6 मास, 6 सप्ताह से अधिक नहीं चल सकता है।

2. लोकसभा एक अध्यादेश को अस्वीकृत करने वाला प्रस्ताव 6 सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पूर्व पास कर सकती है

3. राष्ट्रपति का अध्यादेश न्यायिक समीक्षा का विषय हो सकता है

संसद मे राष्ट्रपति का अभिभाषण

यह सदैव मंत्रिपरिषद तैयार करती है। यह सिवाय सरकारी नीतियांे की घोषणा के कुछ नहीं होता है। सत्र के अंत मंे इस पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जाता है यदि लोकसभा मंे यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाता है तो यह सरकार की नीतिगत पराजय मानी जाती है तथा सरकार को तुरंत अपना बहुमत सिद्ध करना पड़ता है। संसद के प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र में तथा लोकसभा चुनाव के तुरंत पश्चात दोनों सदनों की सम्मिलित बैठक को राष्ट्रपति संबोधित करते हंै यह संबोधन वर्ष के प्रथम सत्र का परिचायक है, इन सयुंक्त बैठकों का सभापति खुद राष्ट्रपति होता है।

अभिभाषण मंे सरकार की उपलब्धियां तथा नीतियांे का वर्णन तथा समीक्षा होती है। जो पिछले वर्ष मे हुई थी, आतंरिक समस्याओं से जुड़ी नीतियाँ भी इसी मंे घोषित होती हंै, प्रस्तावित विधायिका कार्यवाहियां जो कि संसद के सामने उस वर्ष के सत्र मंे लानी हो का वर्णन भी अभिभाषण मंे होता है। अभिभाषण के बाद दोनांे सद्न पृथक बैठक करके उस पर चर्चा करते हंै जिसे पर्याप्त समय दिया जाता है।

संचित निधि- संविधान के अनु. 266 के तहत स्थापित है। यह ऐसी निधि है जिसमंे समस्त एकत्र कर, राजस्व जमा, लिये गये ऋण जमा किये जाते हैं। यह भारत की सर्वाधिक बड़ी निधि है जो कि संसद के अधीन रखी गयी है। कोई भी धन इसमंे बिना संसद की पूर्व स्वीकृति के निकाला/जमा या भारित नहीं किया जा सकता है। अनु. 266 प्रत्येक राज्य की समेकित निधि का वर्णन भी करता है।

भारत की लोक निधि--- अनु. 266 इसका वर्णन भी करता है। वह धन जिसे भारत सरकार कर एकत्रीकरण प्राप्त आय, उगाहे गये ऋण के अलावा एकत्र करे, भारत की लोकनिधि कहलाती है। कर्मचारी भविष्य निधि को भारत की लोकनिधि में जमा किया गया है यह कार्यपालिका के अधीन निधि है। इससे व्यय धन महालेखानियंत्रक द्वारा जाँचा जाता है। अनु. 266 राज्यों की लोकनिधि का भी वर्णन करता है।

भारत की आपातकाल निधि--- अनु. 267 संसद को, वह निधि जो कि आपातकाल मंे प्रयोग की जा सकती हो स्थापित करने का अधिकार देता है। यह निधि राष्ट्रपति के अधीन है। इससे खर्च धन राष्ट्रपति की स्वीकृति से होता है। परंतु संसद के समक्ष इसकी स्वीकृति ली जाती है। यदि संसद स्वीकृति दे देती है तो व्यय धन के बराबर धन भारत की संचित निधि से निकाल कर इसमंे डाल दिया जाता है। अनु. 267 राज्यों को अपनी अपनी आपातकाल निधि स्थापित करने का अधिकार भी देता है।

भारित व्यय--वे व्यय जो कि भारत की संचित निधि पर बिना संसदीय स्वीकृति के भारित होते हंै, ये व्यय या तो संविधान द्वारा स्वीकृत होते हंै या संसद विधि बना कर डाल देती है। कुछ संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता बनाये रखने के लिये यह व्यय प्रयोग लाये गये हंै। अनु 112, 3, मे कुछ भारित व्ययों की सूची है।

1. राष्ट्रपति के वेतन, भत्ते, कार्यालय से जुड़ा व्यय है

2. राज्यसभा लोकसभा के सभापतियों, उपसभापतियों के वेतन भत्ते 3. ऋण भार जिनके लिये भारत सरकार उत्तरदायी है, ब्याज सहित,

4. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों के वेतन, भत्ते, पेंशन तथा उच्च न्यायालय की पेंशनंे इस पर भारित हैं

5. महालेखानियंत्रक तथा परीक्षक ‘केग’, के वेतन भत्ते

6. किसी न्यायिक अवार्ड/डिक्री निर्णय के लिये आवश्यक धन जो न्यायालय/ट्रिब्यूनल द्वारा पारित हो

7. संसद द्वारा विधि बना कर किसी भी व्यय को भारित व्यय कहा जा सकता है

अभी तक संसद ने निर्वाचन आयुक्तों के वेतन भत्ते पेंशन, केन्द्रीय सर्तकता आयोग सदस्यों के वेतन भत्ते पेंशन भी इस पर भारित किये हैं।

वित्त व्यवस्था पर संसद का नियंत्रण

अनु. 265 के अनुसार कोई भी कर कार्यपालिका द्वारा बिना विधि के अधिकार के न तो आरोपित किया जायेगा और न ही वसूला जायेगा। अनु. 266 के अनुसार भारत की समेकित निधि से कोई धन व्यय/जमा भारित करने से पूर्व संसद की स्वीकृति जरूरी है।

अनु. 112 के अनुसार राष्ट्रपति भारत सरकार के वार्षिक वित्तीय लेखा को संसद के सामने रखेगा। यह वित्तीय लेखा ही बजट है।

बजट

1. अनुमानित आय व्यय जो कि भारत सरकार ने भावी वर्ष मंे करना हो

2. यह भावी वर्ष के व्यय के लिये राजस्व उगाहने का वर्णन करता है

3. बजट मे पिछले वर्ष के वास्तविक आय व्यय का विवरण होता है

बजट सामान्यत वित्तमंत्री द्वारा सामान्यतः फरवरी के आखरी दिन लोकसभा मे प्रस्तुत किया जाता है उसी समय राज्यसभा में भी बजट के कागजात रखे जाते है यह एक धन बिल है।

कटौती प्रस्ताव: बजट प्रक्रिया का ही भाग है केवल लोकसभा मंे प्रस्तुत किया जाता है ये वे उपकरण है जो लोकसभा सदस्य कार्यपालिका पर नियंत्रण हेतु उपयोग लाते है ये अनुदानों मंे कटौती कर सकते है इसके तीन प्रकार है

नीति सबंधी कटौती- इस प्रस्ताव का ल्क्ष्य लेखानुदान संबंधित नीति की अस्वीकृति है यह इस रूप मे होती है ‘-----‘ मांग को कम कर मात्र 1 रुपया किया जाता है यदि इस प्रस्ताव को पारित कर दिया जाये तो यह सरकार की नीति संबंधी पराजय मानी जाती है उसे तुरंत अपना विश्वास सिद्ध करना होता है


2. किफायती कटौती--- भारत सरकार के व्यय को उससीमा तक कम कर देती है जो संसद के मतानुसार किफायती होगी यह कटौती सरकार की नीतिगत पराजय नहीं मानी जाती है


3. सांकेतिक कटौती--- इन कटौतीयों का ल्क्ष्य संसद सदस्यॉ की विशेष शिकायतें जो भारत सरकार से संबंधित है को निपटाने हेतु प्रयोग होती है जिसके अंतर्गत मांगे गये धन से मात्र 100 रु की कटौती की जाती है यह कटौती भी नीतिगत पराजय नही मानी जाती है

वोट आॅन अकाउंट: अनु. 116 इस प्रावधान का वर्णन करता है इसके अनुसार लोकसभा वोट आॅन अकाउंट नामक तात्कालिक उपाय प्रयोग लाती है। इस उपाय द्वारा वह भारत सरकार को भावी वित्तीय वर्ष में भी तब तक व्यय करने की छूट देती है जब तक बजट पारित नहीं हो जाता है। यह सामान्यतः बजट का अंग होता है। किंतु यदि मंत्रिपरिषद इसे ही पारित करवाना चाहे तो यही अंतरिम बजट बन जाता है। जैसा कि 2004 मे एन.डी.ए. सरकार के अंतिम बजट के समय हुआ था। फिर बजट नयी यू.पी.ए सरकार ने पेश किया था।

वोट ओन क्रेडिट: लोकसभा किसी ऐसे व्यय के लिये धन दे सकती है जिसका वर्णन किसी पैमाने या किसी सेवा मद मंे रखा जा सकना संभव ना हो। मसलन अचानक युद्ध हो जाने पर उस पर व्यय होता है। उसे किस शीर्षक के अंतर्गत रखे? यह लोकसभा द्वारा पारित खाली चैक माना जा सकता है। आज तक इसे प्रयोग नही किया जा सका है।

जिलेटीन प्रयोगः समयाभाव के चलते लोकसभा सभी मंत्रालयों के व्ययानुदानों को एकमुश्त पास कर देती है। उसपर कोई चर्चा नहीं करती है। यही जिलेटीन प्रयोग है। यह संसद के वित्तीय नियंत्रण की दुर्बलता दिखाता है।

संसद मे लाये जाने वाले प्रस्ताव

अविश्वास प्रस्ताव-लोकसभा के क्रियान्वयन नियमों मंे इस प्रस्ताव का वर्णन है। विपक्ष यह प्रस्ताव लोकसभा मंे मंत्रिपरिषद के विरूद्ध लाता है। इसे लाने हेतु लोकसभा के 50 सद्स्यों का समर्थन जरूरी है। यह सरकार के विरूद्ध लगाये जाने वाले आरोपों का वर्णन नहीं करता है। केवल यह बताता है कि सदन मंत्रिपरिषद में विश्वास नहीं करता है। एक बार प्रस्तुत करने पर यह प्रस्ताव् सिवाय धन्यवाद प्रस्ताव के सभी अन्य प्रस्तावों पर प्रभावी हो जाता है। इस प्रस्ताव हेतु पर्याप्त समय दिया जाता है। इस पर चर्चा करते समय समस्त सरकारी कृत्यों नीतियों की चर्चा हो सकती है। लोकसभा द्वारा प्रस्ताव पारित कर दिये जाने पर मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को त्याग पत्र सौंप देती है। संसद के एक सत्र में एक से अधिक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाये जा सकते हंै।

विश्वास प्रस्ताव--- लोकसभा नियमों मंे इस प्रस्ताव का कोई वर्णन नहीं है। यह आवश्यकतानुसार उत्पन्न हुआ है ताकि मंत्रिपरिषद अपनी सत्ता सिद्ध कर सके। यह सदैव मंत्रिपरिषद लाती है। इसके गिर जाने पर उसे त्यागपत्र देना पड़ता है।

निंदा प्रस्ताव--- लोकसभा मंे विपक्ष यह प्रस्ताव लाकर सरकार की किसी विशेष नीति का विरोध/निंदा करता है। इसे लाने हेतु कोई पूर्वानुमति जरूरी नहीं है। यदि लोकसभा मंे पारित हो जाये तो मंत्रिपरिषद निर्धारित समय मंे विश्वास प्रस्ताव लाकर अपने स्थायित्व का परिचय देती है। उसके लिये यह अनिवार्य है।

कामरोको प्रस्ताव--- लोकसभा में विपक्ष यह प्रस्ताव लाता है। यह एक अद्वितीय प्रस्ताव है। जिसमंे सदन की समस्त कार्यवाही रोक कर तात्कालीन जन महत्व के किसी एक मुद्दे को उठाया जाता है। प्रस्ताव पारित होने पर सरकार पर निंदा प्रस्ताव के समान प्रभाव छोड़ता है।

संघीय न्यायपालिका- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति, 25 जज तथा 1 मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के प्रावधान का वर्णन संविधान में है। अनु 124, 2, के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय इच्छानुसार राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह लेगा। वही अन्य जजों की नियुक्ति के समय उसे अनिवार्य रूप से मुख्य न्यायाधीश की सलाह माननी पड़ेगी।

सुप्रीम कोर्ट-- एडवोकेट्स आन रिकार्ड एसो बनाम भारत संघ वाद 1993 मंे दिये गये निर्णय के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के जजों के तबादले इस प्रकार की प्रक्रियाएं हंै जो सर्वाधिक योग्य उपलब्ध व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सके। सी.जे.आई. का मत प्राथमिकता पायेगा। वह एक मात्र अधिकारी होगा। उच्च न्यायपालिका मंे कोई नियुक्ति बिना उसकी सहमति के नहीं होती है। संवैधानिक सत्ताओं के संघर्ष के समय सी.जे आई. न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करेगा। राष्ट्रपति सी.जे.आई. को अपने मत पर फिर से विचार करने को तभी कहेगा जब इस हेतु कोई तार्किक कारण मौजूद होगा। पुनःविचार के बाद उसका मत राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होगा। यद्यपि अपना मत प्रकट करते समय वह सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्टतम न्यायधीशों का मत जरूर लेगा। पुनःविचार की दशा मंे फिर से उसे दो वरिष्ठतम न्यायधीशों की राय लेनी होगी। वह चाहे तो उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय के अन्य जजों की राय भी ले सकता है। लेकिन सभी राय सदैव लिखित में हांेगे।

बाद मे अपना मत बदल्ते हुए न्यायालय ने कम से कम 4 जजों के साथ सलाह करना अनिवार्य कर दिया था। वह कोई भी सलाह राष्ट्रपति को अग्रेषित नहीं करेगा। यदि दो या ज्यादा जजों की सलाह इसके विरूद्ध हो, किंतु 4 जजों की सलाह उसे अन्य जजों जिनसे वह चाहे सलाह लेने से नहीं रोकेगी।

न्यायपालिका के न्यायधीशों की पदच्युति- इस कोटि के जजों को राष्ट्रपति तब पदच्युत करेगा जब संसद के दोनांे सदनों के कम से कम दो तिहाई उपस्थित तथा मत देने वाले तथा सदन के कुल बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव जो कि सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर लाया गया हो के द्वारा उसे अधिकार दिया गया हो। ये आदेश उसी संसद सत्र में लाया जायेगा, जिस सत्र में ये प्रस्ताव संसद ने पारित किया हो। अनु 124, 5, मंे वह प्रक्रिया वर्णित है जिससे जज पद्च्युत होते हंै। इस प्रक्रिया के आधार पर संसद ने न्यायाधीश अक्षमता अधिनियम 1968 पारित किया था। इसके अंतर्गत

1. संसद के किसी भी सदन मंे प्रस्ताव लाया जा सकता है। लोकसभा मंे 100 राज्यसभा मंे 50 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है

2. प्रस्ताव मिलने पर सदन का सभापति एक 3 सदस्यीय समिति बनायेगा जो आरोपों की जाँच करेगी। समिति का अध्यक्ष सप्रीम कोर्ट का कार्यकारी जज होगा। दूसरा सदस्य किसी हाई कोर्ट का मुख्य कार्यकारी जज होगा, तीसरा सदस्य माना हुआ विधिवेत्ता होगा। इस की जाँच रिपोर्ट सदन के सामने आयेगी यदि इसमें जज को दोषी बताया हो तब भी सदन प्रस्ताव पारित करने को बाध्य नहीं होता। किंतु यदि समिति आरोपों को खारिज कर दे तो सदन प्रस्ताव पारित नहीं कर सकता है।

अभी तक सिर्फ एक बार किसी जज के विरूद्ध जांच की गयी है जज रामास्वामी दोषी सिद्ध हो गये थे। किंतु संसद मंे आवश्यक बहुमत के अभाव के चलते प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका था।

अभिलेख न्यायालय- अनु. 129 सुप्रीम कोर्ट को तथा अनु. 215 उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है। यह संकल्पना इंग्लिश विधि से ली गयी है। अभिलेख न्यायालय का अर्थ अनु. 129 सुप्रीम कोर्ट को तथा अनु. 215 उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है। यह संकल्पना इंग्लिश विधि से ली गयी है। अभिलेख न्यायालय का अर्थ है---

1. न्यायालय की कार्यवाही तथा निर्णय को दूसरे न्यायालय मंे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकेगा

2. न्यायालय को अधिकार है कि वो अवमानना करने वाले व्यक्ति को दण्ड दे सके। यह शक्ति अधीनस्थ न्यायालय को प्राप्त नहीं है इस शक्ति को नियमित करने हेतु संसद ने न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 पारित किया है। अवमानना के दो भेद हंै। सिविल और आपराधिक जब कोई व्यक्ति आदेश निर्देश का पालन न करे या उल्लंघन करे तो यह सिविल अवमानना है। परंतु यदि कोई व्यक्ति न्यायालय को बदनाम करें। जजों को बदनाम तथा विवादित बताने का प्रयास करे तो यह आपराधिक अवमानना होगी। जिसके लिये कारावास/जुर्माना दोनांे देना पडे़गा। वही सिविल अवमानना मंे कारावास संभव नहीं है, यह शक्ति भारत मंे काफी कुख्यात तथा विवादस्पद है।

सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ-अनु. 130 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली मंे होगा परंतु यह भारत में और कहीं भी मुख्य न्यायाधीश के निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति की स्वीकृति से सुनवाई कर सकेगा।

क्षेत्रीय खंडपीठों का प्रश्न- विधि आयोग अपनी रिपोर्ट के माध्यम से क्षेत्रीय खंडपीठों के गठन की अनुसंशा कर चुका है। न्यायालय के वकीलों ने भी प्राथर्ना की है कि वह अपनी क्षेत्रीय खंडपीठों का गठन करे ताकि देश के विभिन्न भागों मंे निवास करने वाले वादियों के धन तथा समय दोनों की बचत हो सके। किंतु न्यायालय ने इस प्रश्न पर विचार करने के बाद निर्णय दिया है कि पीठों के गठन से

1. ये पीठ क्षेत्र के राजनैतिक दबाव में आ जायंेगी

2. इनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट के एकात्मक चरित्र तथा संगठन को हानि पहुँच सकती है

किंतु इसके विरोध मे भी तर्क दिये गये हैं

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

जनहित याचिकाएँ ---इस प्रकार की याचिकाओं का विचार अमेरिका में जन्मा। वहाँ इसे सामाजिक कार्यवाही याचिका कहते हंै यह न्यायपालिका का आविष्कार तथा न्यायधीश निर्मित विधि है।

जनहित याचिका भारत मे पी.एन. भगवती ने प्रारंभ की थी। ये याचिकाएं जनहित को सुरक्षित तथा बढ़ाना चाहती हंै, ये लोकहित भावना पर कार्य करती हैं।

ये ऐसे न्यायिक उपकरण हंै जिनका लक्ष्य जनहित प्राप्त करना है। इनका लक्ष्य तीव्र तथा सस्ता न्याय एक आम आदमी को दिलवाना तथा कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कार्य करवाने हेतु किया जाता है।

ये समूह हित मंे काम आती हैं न कि व्यक्तिहित में। यदि इनका दुरूपयोग किया जाये तो याचिकाकर्ता पर जुर्माना तक किया जा सकता है। इनको स्वीकारना या ना स्वीकारना न्यायालय पर निर्भर करता है।

इनकी स्वीकृति हेतु सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नियम बनाये हैं---

1. लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति, संगठन इन्हंे ला सकता है

2. कोर्ट को दिया गया पोस्टकार्ड भी रिट याचिका मान कर सम्मन जारी की जा सकती है

3. कोर्ट को अधिकार होगा कि वह इस याचिका हेतु सामान्य न्यायालय शुल्क भी माफ कर दे

4. ये राज्य के साथ ही निजी संस्थान के विरूद्ध भी लायी जा सकती है



इसके लाभ

1. इस याचिका से जनता में स्वयं के अधिकारों तथा न्यायपालिका की भूमिका के बारे में चेतना बढ़ती है। यह मौलिक अधिकारों के क्षेत्र को वृहद बनाती है। इसमंे व्यक्ति को कई नये अधिकार मिल जाते हैं।

2. यह कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कर्तव्य करने के लिये बाधित करती हंै, साथ ही यह भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की सुनिश्चितता करती है।

आलोचनाएं--

1. ये सामान्य न्यायिक संचालन मे बाधा डालती हैं

2. इनके दुरूपयोग की प्रवृति परवान पर है

इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने खुद कुछ बन्धन इनके प्रयोग पर लगाये हंै

न्यायिक सक्रियता- न्यायिक सक्रियता का अर्थ न्यायपालिका द्वारा निभायी जाने वाली वह सक्रिय भूमिका है जिसमें राज्य के अन्य अंगों को उनके संवैधानिक कृत्य करने को बाधय करे। यदि वे अंग अपने कृत्य संपादित करने मंे सफल रहे तो जनतंत्र तथा विधि शासन के लिये न्यायपालिका उनकी शक्तियों की भूमिका का निर्वाह सीमित समय के लिये करेगी। यह सक्रियता जनतंत्र की शक्ति तथा जन विश्वास को पुनस्र्थापित करती है।

इस तरह यह सक्रियता न्यायपालिका पर एक असंवेदनशील/गैर जिम्मेदार शासन के कृत्यों के कारण लादा गया बोझ है। यह सक्रियता न्यायिक प्रयास है जो मजबूरी में किया गया है। यह शक्ति उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट के पास ही है। ये उनकी पुनरीक्षा तथा रिट क्षेत्राधिकार मंे आती हंै जनहित याचिका को हम न्यायिक सक्रियता का मुख्य माधयम मान सकते हंै।

इसका समर्थन एक सीमित सीमा तक ही किया जा सकता है। इसके विरोध के स्वर भी आप कार्य पालिका तथा विधायिका में सुन सकते हंै। इसके चलते ही हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने खुद संयम बरतने की बात स्वीकारी है तथा कई मामलों मंे हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है।

संविधान विकास मंे सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

एक तरफ यह संविधान का संरक्ष्क अंतिम व्याख्याकर्ता, मौलिक अधिकारों का रक्षक, केन्द्र राज्य विवादों मे एक मात्र मध्यस्थ है वही यह संविधान के विकास मंे भी भूमिका निभाता रहा है। इसने माना है कि निरंतर संवैधानिक विकास होना चाहिए। ताकि समाज के हित संवर्धित हांे, न्यायिक पुनरीक्षण शक्ति के कारण यह संवैधानिक विकास में सहायता करता है। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विकास यह है कि भारत में संविधान सर्वोच्च है। इसने संविधान के मूल ढाँचे का अदभुत सिद्धांत दिया है। जिसके चलते संविधान काफी सुरक्षित हो गया है। इसे मनमाने ढंग से बदला नहीं जा सकता है।

इसने मौलिक अधिकारों का विस्तार भी किया है। इसने अनु. 356 के दुरूपयोग को भी रोका है।

सुप्रीम कोर्ट इस उक्ति का पालन करता है कि संविधान खुद नहीं बोलता है। यह अपनी वाणी न्यायपालिका के माधयम से बोलता है।

संविधान भाग-6

राज्य कार्यपालिका

राज्यपाल- राज्य कार्यपालिका का प्रमुख होता है राज्यपाल। वह राज्य मंे केन्द्र का प्रतिनिधि होता है तथा राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत ही पद पर बना रहता है। वह कभी भी पद से हटाया जा सकता है।

उसका पद तथा भूमिका भारतीय राजनीति मंे दीर्घ काल से विवाद का कारण रही है। जिसके चलते काफी विवाद हुए हैं सरकारिया आयोग ने अपनी रिपोर्ट मंे इस तरह की सिफारिश दी थी।

1. एक राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति राज्य के मुख्यमंत्री की सलाह के बाद ही राष्ट्रपति करें

2. वह जीवन के किसी क्षेत्र का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हो

3. वह राज्य के बाहर का रहने वाला हो

4. वह राजनैतिक रूप से कम से कम पिछले 5 वर्षांे से राष्ट्रीय रूप से सक्रिय न रहा हो तथा नियुक्ति वाले राज्य मंे कभी भी सक्रिय न रहा हो

5. उसे सामान्यतः अपने पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने दिया जाये ताकि वह निष्पक्ष रूप से काम कर सके

6. केन्द्र पर सत्तारूढ़ राजनैतिक गठबन्धन का सदस्य ऐसे राज्य का राज्यपाल नहीं बनाया जाये जो विपक्ष द्वारा शासित हो

7. राज्यपाल द्वारा पाक्षिक रिपोर्ट भेजने की प्रथा जारी रहनी चाहिए

8. यदि राज्यपाल राष्ट्रपति को अनु. 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करे तो उसे उन कारणों, स्थितियों का वर्णन रिकार्ड मंे रखना चाहिए। जिनके आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा हो।

इसके अलावा राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख है जो अपने कर्तव्य मंत्रिपरिषद की सलाह, सहायता से करता है परंतु उसकी संवैधानिक स्थिति उसकी मंत्रिपरिषद की तुलना मंे बहुत सुरक्षित है। वह राष्ट्रपति के समान असहाय नहीं है। राष्ट्रपति के पास मात्र विवेकाधीन शक्ति ही हंै जिसके अलावा वह सदैव प्रभाव का ही प्रयोग करता है। किंतु संविधान राज्यपाल को प्रभाव तथा शक्ति दोनों देता है, उसका पद उतना ही शोभात्मक है उतना ही कायात्मक भी है।

राज्यपाल उन सभी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग भी करता है जो राष्ट्रपति को मिलती हैं। इसके अलावा वह इन अतिरिक्त शक्तियों का प्रयोग भी करता है।

अनु. 166, 2, के अंर्तगत यदि कोई प्रशन उठता है कि राजयपाल की शक्ति विवेकाधीन है या नहीं तो उसी का निर्णय अंतिम माना जाता है। अनु 166, 3, राज्यपाल इन शक्तियों का प्रयोग उन नियमों के निर्माण हेतु कर सकता है। जिनसे राज्यकार्यों को सुगमतापूर्वक संचालन हो। साथ ही वह मंत्रियों मंे कार्य विभाजन भी कर सकता है।

अनु. 200 के अधीन राज्यपाल अपनी विवेकशक्ति का प्रयोग राज्य विधायिका द्वारा पारित बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु सुरक्षित रख सकने मंे कर सकता है।

अनु. 356 के अधीन राज्यपाल राष्ट्रपति को राज के प्रशासन को अधिग्रहित करने हेतु निमंत्रण दे सकता है। यदि यह संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं चल सकता हो

विशेष विवेकाधीन शक्ति

पंरपरा के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली पाक्षिक रिपोर्ट के सम्बन्ध मंे निर्णय ले सकता है कुछ राज्यों के राज्यपालों को विशेष उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना होता है। विशेष उत्तरदायित्व का अर्थ है कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद से सलाह तो ले किंतु इसे मानने हेतु वह बाध्य ना हो और ना ही उसे सलाह लेने की जरूरत पड़ती हो।

राज्य विधायिका

संविधान में 6 राज्यों हेतु द्विसदनीय विधायिका का प्रावधान किया गया है। उपरी सदन स्थापना तथा उन्मूलन अनु. 169 के अनुसार यह शक्ति केवल संसद को है।

ऊपरी सदन का महत्व- यह सदन प्रथम श्रेणी का नहीं होता यह विधान सभा द्वारा पारित बिल को अस्वीकृत संशोधित नहीं कर सकता है। केवल किसी बिल को ज्यादा से ज्यादा 4 मास के लिये रोक सकता है। इसके अलावा मंत्रिपरिषद मंे विशेषज्ञों की नियुक्ति हेतु इसका प्रयोग हो सकता है। क्योंकि यहाँ मनोनीत सदस्यों की सुविधा भी है।

विधायिका की प्रक्रियाएँ तीन प्रकार के बिल धन, फाइनेंस तथा सामान्य होते हंै, धन बिल संसद की तरह ही पास होते हैं, फाइनेंस बिल केवल निचले सदन में ही पेश होते हंै, सामान्य बिल जो ऊपरी सदन मंे पेश होंगे व पारित हो यदि बाद में निचले सदन में अस्वीकृत हो जायंे तो समाप्त हो जाते हंै।

निचले सदन द्वारा पारित बिल को ऊपरी सदन केवल 3 मास के लिये रोक सकता है उसके बाद वे पारित माने जाते हैं।

राज्य न्यायपालिका-राज्य न्यायपालिका मंे तीन प्रकार की पीठें होती हंै। एकल जिसके निर्णय को उच्च न्यायालय की डिवीजनल खंडपीठ सर्वोच्च न्यायालय मंे चुनौती दी जा सकती है।

डिवीजन बेंच 2 या 3 जजों के मेल से बनी होती है। जिसके निर्णय केवल सुप्रीम कोर्ट मंे चुनौती पा सकते हंै।

संवैधानिक फुल बेंच--सभी संवैधानिक व्याख्या से संबधित वाद इस प्रकार की पीठ सुनती है इसमंे कम से कम 5 जज होते हंै।

अधीनस्थ न्यायालय

इस स्तर पर सिविल आपराधिक मामलों की सुनवाई अलग-अलग होती है। इस स्तर पर सिविल तथा सेशन कोर्ट अलग अलग होते हैं। इस स्तर के जज सामान्य भर्ती परीक्षा के आधार पर भर्ती होते हैं। उनकी नियुक्ति राज्यपाल, राज्य मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर करता है।

फास्ट ट्रेक कोर्ट--ये अतिरिक्त सत्र न्यायालय है, इनका गठन दीर्घावधि से लंबित अपराध तथा अंडर ट्रायल वादों के तीव्रता से निपटारे हेतु किया गया है।

ये अतिरिक्त सत्र न्यायालय हंै, इनक गठन दीर्घावधि से लंबित अपराध तथा अंडर ट्रायल वादों के तीव्रता से निपटारे हेतु किया गया है।

इसके पीछे कारण यह था कि वाद लम्बा चलने से न्याय की क्षति होती है तथा न्याय की निरोधक शक्ति कम पड़ जाती है। जेल मंे भीड़ बढ़ जाती है। 10वंे वित्त आयोग की सलाह पर केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को 1 अप्रैल 2001 से 1734 फास्ट ट्रेक कोर्ट गठित करने का आदेश दिया। अतिरिक्त सेशन जज या उंचे पद से सेवानिवृत जज इस प्रकार के कोर्टो मंे जज होता है। इस प्रकार के कोर्टों मंे वाद लंबित करना संभव नहीं होता है। हर वाद को निर्धारित स्मय में निपटाना होता है।

आलोचना 1. निर्धारित संख्या मे गठन नहीं हुआ

2. वादों का निर्णय संक्षिप्त ढँग से होता है। जिसमें अभियुक्त को रक्षा करने का पूरा मौका नहीं मिलता है।

3. न्यायधीशों हेतु कोई सेवा नियम नहीं है।



लोक अदालत — जनता की अदालतें हैं। ये नियमित कोर्ट से अलग होती हंै। पदेन या सेवानिवृत्त जज तथा दो सदस्य एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक वकील इसके सदस्य होते हंै। सुनवाई केवल तभी करती है जब दोनों पक्ष इसकी स्वीकृति देते हांे ये बीमा दावों, क्षतिपूर्ति के रूप वाले वादों को निपटा देती हैंै। इनके पास वैधानिक दर्जा होता है वकील पक्ष नहीं प्रस्तुत करते हैं।

इनके लाभ — 1. न्यायालय शुल्क नहीं लगते

2. यहाँ प्रक्रिया संहिताः साक्ष्य एक्ट नहीं लागू होते

3. दोनों पक्ष न्यायधीश से सीधे बात कर समझौते पर पहुचँ जाते हंै

4. इनके निर्णय के खिलाफ अपील नहीं ला सकते हैं

आलोचनाएँ 1. ये नियमित अंतराल से काम नहीं करती हंै

2. जब कभी काम पर आती है तो बिना सुनवाई के बड़ी संख्या मंे मामले निपटा देती हंै।

3. जनता लोक अदालतों की उपस्थिति तथा लाभों के प्रति जागरूक नहीं है।




जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति

संवैधानिक प्रावधान स्वतः जम्मू तथा कश्मीर पर लागू नहीं होते। केवल वहीं प्रावधान जिनमंे स्पष्ट रूप से कहा जाए कि वे जम्मू कश्मीर पर लागू होते हंै उस पर लागू होते हंै।

जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति का ज्ञान इन तथ्यों से होता है

1. जम्मू कश्मीर संविधान सभा द्वारा निर्मित राज्य संविधान से वहाँ का कार्य चलता है ये संविधान जम्मू कश्मीर के लोगों को राज्य की नागरिकता भी देता है। केवल इस राज्य के नागरिक ही संपत्ति खरीद सकते हंै या चुनाव लड़ सकते हंै या सरकारी सेवा ले सकते हंै।

2. संसद जम्मू कश्मीर से संबंध रखने वाला ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती है जो इसकी राज्य सूची का विषय हो।

3. अवशेष शक्ति जम्मू कश्मीर विधान सभा के पास होती है।

4. इस राज्य पर सशस्त्र विद्रोह की दशा में या वित्तीय संकट की दशा मे आपातकाल लागू नहीं होता ह।ै

5. संसद राज्य का नाम क्षेत्र सीमा बिना राज्य विधायिका की स्वीकृति को नहीं बदलेगीं

6. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति राज्य मुख्यमंत्री की सलाह के बाद करंेगे।

7. संसद द्वारा पारित निवारक निरोध नियम राज्य पर अपने आप लागू नहीं होगा।

8. राज्य की पृथक दंड संहिता तथा दंड प्रक्रिया संहिता है

विधायिका स्तर पर सम्बन्ध

संविधान की सातंवी अनुसूची विधायिका के विषय केन्द्र राज्य के मध्य विभाजित करती है। संघ सूची मंे महत्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विषय हैं।

राज्यों पर केन्द्र का विधान संबंधी नियंत्रण

1. अनु. 31.1, के अनुसार राज्य विधायिका को अधिकार देता है कि वे निजी संपत्ति जनहित हेतु विधि बना कर ग्रहित कर लंे परंतु ऐसी कोई विधि असंवैधानिक रद्द नहीं की जायेगी यदि यह अनु. 14 व अनु. 19 का उल्लघंन करे। परंतु यह न्यायिक पुनरीक्षण का पात्र होगा। किंतु यदि इस विधि को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु रखा गया और उससे स्वीकृति मिली भी हो तो वह न्यायिक पुनरीक्षा का पात्र नहीं होगा।

2. अनु. 31.ब, के द्वारा नौवीं अनुसूची भी जोड़ी गयी है तथा उन सभी अधिनियमों को जो राज्य विधायिका द्वारा पारित हो तथा अनुसूची के अधीन रखें गये हांे को भी न्यायिक पुनरीक्षा से छूट मिल जाती है। लेकिन यह कार्य संसद की स्वीकृति से होता है

3. अनु. 200 राज्य का राज्यपाल धन बिल, सहित बिल जिसे राज्य विधायिका ने पास किया हो को राष्ट्रपति की सहमति के लिये आरक्षित कर सकता है

4. अनु 288.2, राज्य विधायिका को करारोपण की शक्ति उन केन्द्रीय अधिकरणों पर नहीं देता जो कि जल संग्रह, विधुत उत्पादन, तथा विधुत उपभोग ,वितरण ,उपभोग, से संबंधित हो ऐसा बिल पहले राष्ट्रपति की स्वीकृति पायेगा।

5. अनु 305.ब, के अनुसार राज्य विधायिका को शक्ति देता है कि वो अंतर राज्य व्यापार वाणिज्य पर युक्ति निर्बधंन लगाये। परंतु राज्य विधायिका मंे लाया गया बिल केवल राष्ट्रपति की अनुशंसा से ही लाया जा सकता है।

केन्द्र राज्य प्रशासनिक संबंध


अनु. 256 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्तियाँ इस तरह प्रयोग लायी जायें कि संसद द्वारा पारित विधियों का पालन हो सके। इस तरह संसद की विधि के अधीन विधियों का पालन हो सके। इस तरह संसद की विधि के अधीन राज्य कार्यपालिका शक्ति आ गयी है। केन्द्र राज्य को ऐसे निर्देश दे सकता है जो इस संबंध मंे आवश्यक हो।

अनु. 257- कुछ मामलों मंे राज्य पर केन्द्र नियंत्रण की बात करता है। राज्य कार्यपालिका शक्ति इस तरह प्रयोग लायी जायंे कि वह संघ कार्यपालिका से संघर्ष न करे। केन्द्र अनेक क्षेत्रों मंे राज्य को उसकी कार्यपालिका शक्ति कैसे प्रयोग करंे इसपर निर्देश दे सकता है। यदि राज्य निर्देश पालन मंे असफल रहा तो राज्य में राष्ट्रपति शासन तक लाया जा सकता है।

अनु 258.2, के अनुसार-संसद को राज्य प्रशासनिक तंत्र को उस तरह प्रयोग लेने की शक्ति देता है जिनसे संघीय विधि पालित हो। केन्द्र को अधिकार है कि वह राज्य में बिना उसकी मर्जी के सेना, केन्द्रीय सुरक्षा बल तैनात कर सकता है।

अखिल भारतीय सेवाएँ भी केन्द्र को राज्य प्रशासन पर नियंत्रण प्राप्त करने मंे सहायता देती हंै। अनु. 262 संसद को अधिकार देता है कि वह अंतरराज्य जल विवाद को सुलझाने हेतु विधि का निर्माण करे संसद ने अंतरराज्य जल विवाद तथा बोर्ड एक्ट पारित किये थे।

अनु. 263 राष्ट्रपति को शक्ति देता है कि वह अंतरराज्य परिषद स्थापित करे ताकि राज्यों के मध्य उत्पन्न मत विभिन्नता सुलझा सकें।

निर्वाचन आयोग: कार्यप्रणाली एवं कार्य

1. निर्वाचन आयोग के पास यह उत्तरदायित्व है कि वह निर्वाचनों का पर्यवेक्षण, निर्देशन तथा आयोजन करवाये, वह राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति, संसद, राज्यविधानसभा के चुनाव करता है।

2. निर्वाचक नामावली तैयार करवाता है।

3 राजनैतिक दलों का पंजीकरण करता है।

4. राजनैतिक दलों का राष्ट्रीय, राज्य स्तर के दलों के रूप मंे वर्गीकरण, मान्यता देना, दलों-निर्दलीयों को चुनाव चिन्ह देना।

5. सांसद-विधायक की अयोग्यता दल-बदल को छोड़कर जाने वाले पर राष्ट्रपति/राज्यपाल को सलाह देना।

6. गलत निर्वाचन उपायों का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को निर्वाचन के लिये अयोग्य घोषित करना।

निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ अनु 324.1, निर्वाचन आयोग को निम्न शक्तियाँ देता है---

1. सभी निर्वाचनों का पर्यवेक्षण, नियंत्रण, आयोजन करवाना।

2. सुप्रीम कोर्ट के निर्णयानुसार अनु 324.1, मंे निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ कार्यपालिका द्वारा नियंत्रित नहीं हो सकती। उसकी शक्तियां केवल उन निर्वाचन संबंधी संवैधानिक उपायों तथा संसद निर्मित निर्वाचन विधि से नियंत्रित होती हंै। निर्वाचन का पर्यवेक्षण, निर्देशन, नियंत्रण तथा आयोजन करवाने की शक्ति मंे देश मंे मुक्त तथा निष्पक्ष चुनाव आयोजित करवाना भी निहित है। जहां कहीं संसद विधि निर्वाचन के संबंध मंे मौन है वहां निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिये निर्वाचन आयोग असीमित शक्ति रखता है। यद्यपि प्राकृतिक न्याय, विधि का शासन तथा उसके द्वारा शक्ति का सदुपयोग होना चाहिए।

निर्वाचन आयोग विधायिका निर्मित विधि का उल्लंघन नहीं कर सकता है और न ही ये स्वेच्छापूर्ण कार्य कर सकता है। उसके निर्णय न्यायिक पुनरीक्षण के पात्र होते हैं।

निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ निर्वाचन विधियों की पूरक है न कि उन पर प्रभावी तथा वैध प्रक्रिया से बनी। विधि के विरूद्ध प्रयोग नहीं की जा सकती है।

यह आयोग चुनाव का कार्यक्रम निर्धारित कर सकता है चुनाव चिन्ह आवंटित करने तथा निष्पक्ष चुनाव करवाने के निर्देश देने की शक्ति रखता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी शक्तियों की व्याख्या करते हुए कहा कि वह एकमात्र अधिकरण है जो चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करे चुनाव करवाना केवल उसी का कार्य है।

जनप्रतिनिधित्व एक्ट 1951 के अनु. 14-15 भी राष्ट्रपति, राज्यपाल को निर्वाचन अधिसूचना जारी करने का अधिकार निर्वाचन आयोग की सलाह के अनुरूप ही जारी करने का अधिकार देते हंै।

भारत मे निर्वाचन सुधार

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम संशोधन 1988 से इस प्रकार के संशोधन किये गये हैं.

1. इलैक्ट्राॅनिक मतदान मशीन का प्रयोग किया जा सकेगा. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में इनका सर्वत्र प्रयोग हुआ

2. राजनैतिक दलों का निर्वाचन आयोग के पास अनिवार्य पंजीकरण करवाना होगा यदि वह चुनाव लड़ना चाहे तो कोई दल तभी पंजीकृत होगा जब वह संविधान के मौलिक सिद्धांतों के पालन करे तथा उनका समावेश अपने दलीय संविधान में करे।

3. मतदान केन्द्र पर कब्जा, जाली मत

त्रुटियां-परस्पर विरोधी, मिल्कियत या संपदा का अधिकार मूल अधिकार रहा। कई साल तक शिक्षा का मूल अधिकार न होकर नीति के निदेशक के कारण भ्रष्टाचार में वृद्धि होती रही और गरीब, गरीब होते रहें।

फेडरेशन तथा कंफेडरेशन का भेद

फेडरेशन--दो या अधिक संघटकांे का औपचारिक संगठन सम्प्रभु तथा स्वतंत्र परंतु उसके संघटक सम्प्रभु तथा स्वतंत्र नहीं होते संघटक संघ से स्वतंत्र होने की शक्ति नहीं रखते हंै। संघ तथा उसके निवासियांे के मध्य वैधानिक सम्बन्ध होता है।

नागरिकता- नागरिको के अधिकार तथा कर्तव्य होते हैं

कनफेडरेशन-दो या अधिक संघटकांे का ढीला संघटन राष्ट्रमंडल, संघटक सम्प्रभु तथा स्वतंत्र होते हंै परंतु खुद कनफेडरेशन मंे ये गुण नहीं होते हंै।

संघटक स्वतंत्र होने की शक्ति रखते है--निवासी परिसंघ के नागरिक नहीं होते बल्कि उसके संघटकांे के नागरिक होते हंै।

शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत

यह सिद्धांत फ्रेंच दार्शनिक मान्टेस्कयू ने दिया था उसके अनुसार राज्य की शक्ति उसके तीन भागों, कार्यों, विधान तथा न्यायपालिकाओं मे बांट देनी चाहिये।

ये सिद्धांत राज्य को सर्वाधिकारवादी होने से बचा सकता है तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

अमेरिकी संविधान पहला ऐसा संविधान था जिसमंे ये सिद्धांत अपनाया गया था।

शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत भारतीय संविधान मंे संविधान में इसका साफ वर्णन न होकर संकेत मात्र है। इस हेतु संविधान मंे तीनांे अंगांे का पृथक वर्णन है। संसदीय लोकतंत्र होने के कारण भारत मंे कार्यपालिका तथा विधायिका में पूरा अलगाव नहीं हो सका है कार्यपालिका, मंत्रीपरिषद, विधायिका मंे से ही चुनी जाती है तथा उसके निचले सदन के प्रति ही उत्तरदायी होती है।

अनु. 51 के अनुसार कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को पृथक होना चाहिए। इसलिये ही 1973 में दंड प्रक्रिया संहिता पारित की गयी जिसके द्वारा जिला मजिस्ट्रटांे की न्यायिक शक्ति लेकर न्यायिक मजिस्ट्रटांे को दे दी गयी थी।