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ब्रह्म

भारतीय चिंतन परम्परा में ब्रह्म वह है जो समस्त चराचार जगत् या ब्रह्मांड का आधार है। उनके अंश से ही सब अस्तित्व है, तथा उसी अंश मात्र में ही पूरा अस्तित्व अवस्थित है। वे ही अस्तित्व के मूल कारण हैं तथा उनके अस्तित्व का कोई कारण नहीं। वह साक्षात् अस्तित्व ही हैं। उनका अस्तित्व स्वयं ही है। जीवात्मा जिन्हें भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान समझता है वह काल भी उन्हीं में सर्वथा वर्तमान है। उनका न आदि है और न अन्त। वेदों, उपनिषदों तथा ब्राह्मणों (ग्रंथों) में इस ब्रह्म की चर्चा व्यापक रूप से की गयी है।

बृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य उद्दालक से कहते हैं - यह जो आत्मा या जीव से भिन्न परमात्मा या ब्रह्म है जिसके जीव में स्थित रहते हुए भी मूढ़ जीवात्मा जिसे नही जानता ... उसे तू जान।

उस ब्रह्म को समझाने के लिए ऋषियों ने अनेक प्रयत्न किये तथा अयमात्मा ब्रह्म (यह आत्मा ब्रह्म है), प्रज्ञानं ब्रह्म (प्रज्ञान ही ब्रह्म है), अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूं), तत्त्वमसि ( वह तुम हो) जैसी अभिव्यक्तियों से समझाने की कोशिशें कीं। अनेक लोग समझे तथा अनेक ने स्वयं को ही ईश्वर या ब्रह्म मान लेने का दुःसाहस किया।

लाल गर्म लोहा, जिसे देखकर लोहे को पूर्व से न जानने वाला कह देता है कि वह आग है, जानने वाला कह देता है कि वह लोहा है, परन्तु कई उस अग्नि स्वरूप दिखने वाले लोहे से अलग अग्नि का अस्तित्व मानते हैं जो किसी समय विषेष में लोहे में प्रकट हुआ। यदि उस अवस्था में लोहा कहे कि मैं अग्नि हूं तो वह सत्य प्रतीत हो रहा असत्य ही है। लोहा केवल इस अवस्था में अग्निस्वरूप है, अग्नि नहीं।

इसी प्रकार ब्रह्म के बारे में ऋषियों ने जो कुछ कहा उन्हें यथावत् नहीं समझा गया। योगियों या ऋषियों की ब्रह्ममय यह ब्रह्मस्वरूप अवस्था लोहे की उस अग्निमय अवस्था के समान ही है जब एक मात्र ब्रह्म का अस्तित्व ही दिखायी देता है जिस प्रकार लाल गर्म लोहे के लिए अग्निस्वरूप अवस्था।

इस प्रकार ब्रह्म परमात्मा है जो आत्मा से भिन्न है, ऐसा द्वैतवादी कहते हैं। अद्वैतवादी कहते हैं कि परमात्मा आत्मा से भिन्न नहीं है। विशिष्टाद्वैतवादी कहते हैं कि ये विशेष गुणों से युक्त अभिन्न हैं जबकि द्वैताद्वैतवादी कहते हैं कि ये भिन्न भी हैं तथा अभिन्न भी।

किसी भी स्थिति में किसी मनुष्य के लिए स्वयं को ईश्वर या ब्रह्म घोषित करना ब्रह्म की मूल परिकल्पना वाले अर्थ से ही भिन्न है तथा यह मान्य नहीं है। परन्तु सर्वेश्वरवादियों द्वारा सब में ईश्वर या ब्रह्म की व्यापकता देखना मान्य है।

ब्रह्म के बारे में दो बातें और कही गयीं - कुछ लोग सगुण ब्रह्म की बात कहते हैं तथा कुछ निर्गुण ब्रह्म पर बल देते हैं। परन्तु गंभीरता से विचारण करने पर लगता है कि ब्रह्म का एक ही साथ सगुण या निर्गुण होना दोनों संभव है। जैसे यदि कोई पूछे कि जीवधारी सगुण है या निर्गुण - उत्तर है कि आत्मा या जीव के रूप में निर्गुण तथा गुणों के साथ प्रकट होने से सगुण।

और आगे अर्थों पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि ब्रह्म की परिकल्पना सगुण के रूप में भी की गयी है जैसे वह सर्वशक्तिमान तथा सबसे दयालु है जो उनका गुण है। उनके निर्गुण होने का अर्थ गुणों से भी परे होना है, गुणविहीन होना नहीं। सामान्य लोगों के लिए ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जो ज्ञेय है उसे सगुण तथा जो इससे परे है उस सूक्षम ब्रह्म को निर्गुण ब्रह्म कहा जाता है जिनके होने का अनुमान होता है।

इसी आधार पर ब्रह्म की सगुण या निर्गुण उपासना, स्तुति, या प्रार्थना की जाती है।

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Page last modified on Monday March 24, 2014 06:12:04 GMT-0000 by hindi.