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जयपुर घराने के मूर्धन्य कलाकार पंडित बाबूलाल कथक उन नृत्य गुरुओं में एक हैं जिन्होंने अपने अथक परिश्रम और नृत्य नतिभा से कथक को नई ऊचाइयां प्रदान कीं।

राजस्थान के चूरू जिले के बीदासर में 11 जुलाई, 1926 को जन्मे पंडित बाबूलाल कथक को यह कला विरासत में मिली। बाल्यकाल से मिले सांगीतिक परिवेश और नृत्य की बंदिशों पर थिरकते पैरों में बंधे घंुघरुओं की रुनझुन इनके कर्ण-कुहरों में ऐसे समाई कि मात्र सात वर्ष की वय तक पहुंचते-पहुंचते अपने पिता पंडित प्रतापलाल से कथक नृत्य की विधिवत शिक्षा लेना प्रंारम्भ कर दिया।
पंडित प्रतापलाल अपने समय के जाने-माने नृत्य गुरु थे। उनका नृत्य पूरे भारत वर्ष में प्रसिद्ध था और पटियाला, रामगढ़, त्रिपुरा तथा पन्ना आदि रियासतों में उनके नृत्य के आयोजन होते थे।

पंडित जवाहरलाल नेहरू के सम्मान में पंडित बाबूलाल द्वारा सृजित नृत्य नाटिका ‘पंचशील’ में उस्ताद अमीर खां ने अपना स्वर दिया और तबले पर उनकी संगत उस्ताद अल्लाहरखा खां ने की। पंडित जी ने अनेक सिने तारिकाओं जिनमें संध्या, राजश्री, सायराबानू, मधुबाला, स्नेहलता, सुलक्षणा आदि प्रमुख रूप उल्लेखनीय हैं, को नृत्य प्रशिक्षण दिया वहीं इन्जबाला झवेरी, रोहिणी वागले, इंदिरा मेनन, मालती सुवर्णा, सुलोचना शाह, रत्नानभा टाटे, सुरेखा राने और चन्जलेखा जैसी स्वनामधन्य नृत्यंागनाओं ने भी उनसे नृत्य की शिक्षा ली है।


पं. बाबूलाल ने अपने पिता के सान्निध्य में ही नृत्य की बारीकियां सीखीं और प्रांरम्भ में उन्हीं के साथ नृत्य की प्रस्तुतियां दीं। किन्तु नृत्य के प्रति अपने समर्पण, कठिन परिश्रम और अपनी प्रतिभा के बल पर शीघ्र ही वे नृत्य में इतने निष्णात हो गये कि सन् 1935 में मात्र नौ वर्ष की अल्पायु में जब उन्होंने लखप्रं के मोरिस हन्दुस्तानी संगीत महाविद्यालय में अपने एकल नृत्य की प्रस्तुति दी तो उसके प्राचार्य एवं संगीत गुरु नो. रातनजकर उनके पद संचालन और भावभंगिमाओं को देखकर चमत्कृत हो उठे। उनसे मिले आशीर्वाद से बालक बाबूलाल का उत्साह द्विगुणित हो उठा। सन् 1936 में उन्होंने अपने पिता के साथ मैसूर युवराज के समक्ष अपने मनोहारी नृत्य की पुनः प्रस्तुति दी। थोड़े समय के लिए वे हुबली-धारवाड़ में रहे जहां शास्त्रीय संगीत की नसिद्ध गायिका गंगूबाई हंगल ने भी उनके पिता पंडित प्रतापलाल से कथक नृत्य सीखा।


सन् 1937 में वे अपने पिता के साथ मुम्बई आ गये। मुम्बई आकर पंडित नतापलाल ने कथक नृत्य का अध्यापन कार्य शुरू कर दिया। सन् 1938 में मात्र बारह वर्ष की आयु में बाबूलाल ने नसिद्ध गायिका श्री मती हीराबाई बड़ोदकर तथा सन् 1939 में उन्होंने श्रीमती बाई नारवेकर के सान्निध्य में अपनी भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुतियों से सबका मन मोह लिया। सन् 1941 में श्री बाबूराव गोखले के नेतृत्व में पंडित प्रतापलाल ने महाराष्ट्र संगीत विद्यालय में कथक नृत्य गुरु के रूप में अध्यापन शुरू किया।

सन् 1942-43 में पंडित बाबूलाल कथक ने बाल गंधर्व नाटक कम्पनी के लिए नृत्य संयोजन किया तथा उसके उपरान्त पूरे महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक में अपनी एकल नृत्य नस्तुतियां दी।

सन् 1944 में वे प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक वी. शांताराम के सम्पर्क में आये तथा सन् 1946 में जारी उनकी फिल्म ‘रामजोशी’ में उन्होंने नायिका हंसा वाडकर के साथ नृत्य किया। 5 नवम्बर, 1949 में पंडित प्रतापलाल का निधन हो गया। फलस्वरूप सन् 1950 में पंडित बाबूलाल ने भारतीय संगीत विद्यालय में कथक नृत्य गुरु के रूप में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया। नो. बी. आर. देवधर इस विद्यालय के प्रिंसीपल थे। पंडित बाबूलाल ने कथक नृत्य के प्रदर्शन और अध्यापन का सिलसिला जारी रखा और वी. शांताराम के सम्पर्क में आने से भारतीय सिनेमा के रुपहले पर्दे के लिए भी अविस्मरणीय कार्य किया। उन्होंने वी. शांताराम की अनेक फिल्मों में नृत्य निर्देशन का कार्य किया। जिन फिल्मों में नृत्य निर्देशन किया उनमें से ‘सुबह का तारा’, ‘तूफान और दिया’, ‘स्त्री’, ‘जल बिन मछली’ प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं। जल बिन मछली में उन्होंने थाली नृत्य नस्तुत किया और झनक झनक पायल बाजे में नृत्य के बोल- ‘मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया’ इन्हीं के द्वारा तैयार किये गये थे।

उन्होंने एस.डी.नारंग की फिल्म ‘शहनाई’ का नृत्य निर्देशन भी किया। इस फिल्म में राजश्री ने एक नृत्य प्रस्तुत किया था। इस नकार उन्होंने करीब दो दशकों तक फिल्मों में नृत्य निर्देशन का कार्य किया। आगे चलकर उन्होंने वृंदावन फिल्म कम्पनी के लिए संगीत संयोजन का काम भी किया जिसमें आशा भोंसले, आमिर बाई कर्नाटकी, जोहराबाई अम्बालेवाली तथा मुबारक बेगम ने उनकी संगीत रचनाओं को मूर्रा रूप दिया। इन्होंने करीब चालीस गीतों को संगीत से संवारा।

उनके नृत्य नदर्शनों में मुम्बई में आयोजित नृत्य ‘पंचशील’ सर्वाधिक प्रसिद्ध है। उनके जीवन के वे क्षण सर्वाधिक अविस्मरणीय हैं तब सन् 1955 में उन्होंने अपनी शिष्या चन्जलेखा के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और राष्टडपति डाॅ. राजेन्द्र नसाद के समक्ष तीन मूर्ति भवन तथा राष्ट्रपति भवन में अपने भावपूर्ण कथक नृत्य की प्रस्तुतियां दीं। ईरान के शाह व रानी सुरैया भी उनकी नृत्य रचनाओं से मंत्रमुग्ध हो चुकी हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू के सम्मान में पंडित बाबूलाल द्वारा सृजित नृत्य नाटिका ‘पंचशील’ में उस्ताद अमीर खां ने अपना स्वर दिया और तबले पर उनकी संगत उस्ताद अल्लाहरखा खां ने की। पंडित जी ने अनेक सिने तारिकाओं जिनमें संध्या, राजश्री, सायराबानू, मधुबाला, स्नेहलता, सुलक्षणा आदि नमुख रूप उल्लेखनीय हैं, को नृत्य प्रशिक्षण दिया वहीं इन्जबाला झवेरी, रोहिणी वागले, इंदिरा मेनन, मालती सुवर्णा, सुलोचना शाह, रत्नानभा टाटे, सुरेखा राने और चन्जलेखा जैसी स्वनामधन्य नृत्यंागनाओं ने भी उनसे नृत्य की शिक्षा ली है।
पंडित जी अनेक संगीत संस्थाओं और रियासती दरबारों से सम्मानित एवं पुरस्कृत हो चुके हैं। कथक नृत्य के लिए की गई उनकी अविस्मरणीय सेवाओं के लिए उन्हें हाल ही में जयपुर में आयोजित एक भव्य समारोह में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी सम्मान से विभूषित किया गया। पंडित जी 76 वर्ष की इस उम्र में भी नृत्य साधना में विरत रहते हैं और अपने शिष्यों को नृत्य की बारीकियां सिखाते हैं।