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पंचमहायज्ञ

भारतीय दर्शन परम्परा में पांच यज्ञों को पंच महायज्ञ कहा जाता है। ये पंच महायज्ञ हैं – ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ तथा आतिथ्य यज्ञ।
ब्रह्म यज्ञ - ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना तथा इस ज्ञान को आत्मसात करने को ब्रह्म यज्ञ कहा जाता है। इस यज्ञ में ब्रह्माचरण करते हुए वेद-वेदान्तों का ज्ञान प्राप्त करना होता है। दूसरे अर्थों में ज्ञान यज्ञ का ही दूसरा नाम ब्रह्म यज्ञ है जिसमें ब्रह्मत्व की प्राप्ति ही मूल उद्देश्य है। सत् आचरण या सदाचरण ही इसका आधार है जिसके बिना यह यज्ञ संभव नहीं। ईश्वर की आराधना के नाम पर केवल अनुष्ठान करने वाले दुराचारी व्यक्तियों को ब्रह्म यज्ञ का फल नहीं मिलता।
देव यज्ञ – शतपथ ब्राह्मण का वचन है – विद्वांसो हि देवाः। अर्थात् विद्वान ही देव हैं। इस अर्थ में देव यज्ञ वह यज्ञ है जिसमें देवत्व प्राप्त करना ही मूल उद्देश्य होता है तथा विद्वानों से ज्ञान प्राप्त किया जाता है। विद् कहते हैं ज्ञान को तथा ज्ञानी कहते हैं उनको जो ब्रह्म को जानता है। ज्ञान तथा संत विद्वान के विरूद्ध आचरण करने वाले को केवल अनुष्ठान मात्र से देव यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होता।
पितृ यज्ञ – माता-पिता की सेवा ही पितृ यज्ञ है। जीवित माता-पिता, पितामह, प्रपितामाह की सेवा रूपी पितृ यज्ञ न करने वाले पितरों के नाम पर अनुष्ठान मात्र करने वालों को पितृ यज्ञ का फल नहीं मिलता।
वैश्वदेव यज्ञ – वैश्वदेव इस संसार में भ्रमण करने वाले सदाचारी व्यक्तियों को कहा जाता है। ऐसे संत व्यक्तियों की सेवा को ही वैश्वदेव यज्ञ कहते हैं। सदाचार तथा सदाचारियों के विरूद्ध आचरण करने वालों को वैश्वदेव यज्ञ का फल नहीं मिलता।
आतिथ्य यज्ञ – सदाचारियों के अतिथि के रूप में घर आने पर उनकी सेवा करना ही आतिथ्य यज्ञ कहलाता है। दुराचारियों का सत्कार करने तथा उनके ही सम्मान में ही अनुष्ठान करने वालों को इस यज्ञ का फल नहीं मिलता। सदाचारियों का आतिथ्य न करने वालों को भी विपरीत फल प्राप्त होता है।



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