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नयी कविता

नयी कविता हिन्दी साहित्य की एक विधा है। वैयक्तिक तथा सामाजिक यथार्थों के आलोक में नये भाव-बोध तथा नयी दृष्टि इन कविताओं की मूल धारा है। इसमें गद्य का यथार्थ एवं काव्य की संवेदनशीलता दोनों होती है। व्यक्तिगत अनुभूतियों का इसमें प्रमुख स्थान है। यह समसामयिक मानव-विशिष्टता से उद्भूत लघु मानव के लघु परिवेश की अभिव्यक्ति है। आज की समस्त कटुता और विषमता के बीच कवि के अपने व्यक्तित्व को सुरक्षित रखने की तड़प इसमें दिखती है।

सन् 1951 में 'दूसरा सप्तक' के प्रकाशन के बाद नयी कविता का जन्म हुआ, जो 1953 में 'नये पत्ते' के प्रकाशन के साथ विकसित हुई। सन् 1954 में 'नयी कविता' नाम से जगदीश गुप्त तथा रामस्वरूप चतुर्वेदी ने एक काव्य संकलन संपादित किया था जिसमें ऐसी कविताओं के समस्त संभावित प्रतिमान प्रकाश में आये थे।

नयी कविता के चार प्रमुख तत्व हैं -
पहला, नयी कविता का विश्वास आधुनिकता में है।
दूसरा, यह जिस आधुनिकता की बात करती है वह मुक्त यथार्थ का समर्थन है तथा उसमें वर्जनाओं तथा कुण्ठाओं का प्रतिरोध है। यहां आधुनिकता का अर्थ वैज्ञानिकता, मानवीय दृष्टि, तथा यथार्थ की दृष्टि है, आधुनिक विकृतियां नहीं।
तीसरा, यह मुक्त यथार्थ का साक्षात्मकार विवेक के आधार पर करना ही न्यायोचित मानती है। तथा
चौथा, इन तीनों के साथ वह समसामयिकता के दायित्व को स्वीकार करती है।

नयी कविता का उद्देश्य मनुष्य के समस्त विद्रूपताओं तथा विषमताओं के बावजूद उसकी मूल मर्यादा, निजत्व, तथा अस्तित्व के प्रति जागरूक करना है।

नयी कविता के प्रमुख कवि हैं - अज्ञेय, गजानन मुक्तिबोध, कुंवर नारायण, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, प्रभाकर माचवे, मदन वात्स्यायन, गिरिजाकुमार माथुर, नेमिचन्द्र जैन, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकान्त वर्मा, भवानी प्रसाद मिश्र, विजयदेव नारायण साही, जगदीश गुप्त, केदारनाथ सिंह, शमशेर बहादुर सिंह आदि।