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धरती

धरती का सामान्य अर्थ है पृथ्वी या धरा। परन्तु भारतीय चिंतन और दर्शन परम्परा में इसका उपयोग कई अन्य अर्थों में भी किया गया है।

नाथपंथियों में धर अथवा धरा शब्द का उपयोग मूलाधार के अर्थ में किया गया है। इस पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ की एक उक्ति है -
अधरा धरे विचारिया, धर याही मैं सोई।
धर अधर परचा हूआ, तब उती नाहीं कोई।
यहां धर तथा धरा शब्दों का प्रयोग मूलाधार के लिए किया गया है। उनका कहना था कि जो अधर में है (अर्थात् जो आकाश या ब्रह्मरन्ध्र में है) वही धरा (पृथ्वी या मूलाधार) में भी है। जब इस धर (शिव की शक्तिरूपा कुंडलिनी शक्ति जो मूलाधार में अवस्थित है) का परशिव (जो ब्रह्मरन्ध्र में अवस्थित है) से परिचय होता है तो फिर कोई तीसरी सत्ता नहीं रह जाती। शिव तथा शक्ति एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं।

कबीरपंथियों में भी मूलाधार या वहां अवस्थित कुण्डलिनी को धरती माना जाता है। कबीर ने कहा था -
अवधू जागत नींद न कीजै।
धरती उलटि अकासहिं ग्रासै यह पुरिखां कै बांनी।
उन्होंने कहा कि शक्ति (जिसका वास धरनि या मूलाधार में है) के बिना शिव तो शव के समान है। जिस जीव ने कुणडलिनी शक्ति को सोया रहने दिया, उसे जगाकर सहस्रारस्थ शिव से मिलाया नहीं, वह शक्ति तथा शिव दोनों से हीन है।
कबीर कहते हैं - ऐसी जोगिया बदकरमी जाके गगन अकास न धरनी। कबीर की उलटी बानी में कहा गया - जहां धरनि बरसे गगन भीजै चन्द सूरज मेल।
इस प्रकार धरती, धरनी, तथा धरा का प्रयोग कुण्डलिनी के लिए तथा गगन तथा आकाश सहस्रार के लिए मिलता है।