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द्वैताद्वैतवाद

द्वैताद्वैत का अर्थ है द्वैत और अद्वैत दोनों। अर्थात् यह संसार ब्रह्म से भिन्न भी है और अभिन्न भी। सत् एक भी है और दो भी। निम्बार्क के इसी सिद्धान्त को द्वैताद्वैतवाद कहा जाता है।

शंकर के अद्वैत (जगत ब्रह्म से अभिन्न है), तथा रामानुज के विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त (जगत ब्रह्म से भिन्न है परन्तु दोनों की अभिन्नता इसकी प्रमुख विशेषता है), से अलग निम्बार्क ने कहा कि ब्रह्म से संसार की भिन्नता तथा अभिन्नता दोनों समान महत्व की हैं। संसार परिणाम है तथा ब्रह्म कारण। कारण और परिणाम भिन्न हैं और अभिन्न भी। ब्रह्म अद्वैत है तथा संसार द्वैत (नानाविध)। दोनों नित्य सत्य हैं।

निम्बार्क (11वीं शताब्दी) को इस मत का प्रवर्तक माना जाता है परन्तु इसका इतिहास उनसे भी प्राचीन है। ब्रह्मसूत्रकार बादरायण के पूर्व औडुलोमि और आश्मरथ्य भेदाभेदवादी थे। बाद के समय में भी अनेक भेदाभेदवादी हुए।

इस मत के अनुसार ईश्वर, चित्, तथा अचित् तीन परमतत्त्व हैं। ईश्वर में अनन्त वस्तुओं के सृजन की शक्ति है तथा सभी वस्तुएं उसी शक्ति में सारतः विद्यमान हैं। चित् और अचित् ईश्वर की शक्ति हैं, उनके अंगभूत नहीं। अर्थात् जीव और जड़ पदार्थ ईश्वर के अंश नहीं हैं, अपितु शक्ति हैं। ईश्वर नियंता है तथा जीव नियम्य। जीव या चित् ज्ञाता, कर्ता, और भोक्ता है।

द्वैताद्वैत मत में जड़ पदार्थ तीन हैं - प्राकृत, अप्राकृत, तथा काल। ईश्वर सगुण तथा दोषरहित है। जो कुछ भी बोधगम्य या दृष्टिगोचर है उसके बाहर और भीतर ईश्वर व्याप्त है।

इस मत के अनुसार मुक्ति के लिए जीव को प्रपत्ति (ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण) करने का विधान है। प्रपत्ति के छह अंग हैं - आनुकूल्यस्य संकल्पः (अनुकूल संकल्प), प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् (प्रतिकूल की वर्जना), रक्षिष्यतीति विश्वासः (जो कुछ भी है उसी रक्षा करता है का विश्वास), गोप्तृत्ववरणम् ( गोप्तृत्व का वरण), आत्मनिक्षेपः (स्वयं को ईश्वर पर न्योछावर करना), तथा कार्पण्यम् (निरीहता का बोध)।

यह मत मूलतः भक्ति मार्ग है। सगुण तथा निर्गुण दोनों प्रकार की भक्ति की परम्परा इस मार्ग में रही है परन्तु सगुण भक्ति अधिक लोकप्रिय रहा है। निम्बार्क राधा-कृष्ण की भक्ति में लीन थे। वृन्दावन तथा बंगाल में इस मत का विशेष प्रचार हुआ। बाद में वल्लभ सम्प्रदाय, सखी सम्प्रदाय, आदि अनेक सम्प्रदाय इस मत की शाखाओं को रूप में विकसित हुए।