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दोहा

दोहा एक मात्रिक अर्धसम छन्द है। दो पंक्तियों के इस छन्द में चार पाद होते हैं। पहले तथा तीसरे पाद में 13-13 मात्राएं, तथा दूसरे एवं चौथे पाद में 11-11 मात्राएं होती हैं। पादान्त में यति होती है। अन्त में लघु होता है। विषम चरणों के प्रारम्भ में जगण नहीं होता। सम पादों में तुक मिलता है। मात्रिक गणों का क्रम 6, 4, 3 एवं 6, 4, 1 होता है।
दोहा मुक्तक काव्य का प्रधान छन्द है। दोहे स्वतन्त्र रूप से भी उपलब्ध हैं तथा चौपाइयों के साथ भी। हिन्दी तथा अपभ्रंश के कवियों में दोहे काफी लोकप्रिय रहे हैं। दोहे के 23 भेद बताये गये हैं।
दोहों में अनेक प्रयोग भी हुए हैं। कबीर ने साखियों में इसका प्रयोग किया जो दोहों का ही अव्यवस्थित रूप है। जायसी ने विषम पद में 12 तथा सम छन्द में 11 मात्राओं का प्रयोग किया है। उन्होंने कुछ विषम पदों में 16 मात्राओं का भी प्रयोग किया। तुलसीदास ने कई स्थानों पर विषम पदों में 12 मात्राओं का भी प्रयोग किया।

दोहा का एक उदाहरण देखें –
रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय।