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दूती

दूती एक प्रकार की नायिका होती है। जो दूत कार्य करने में चतुर हो उस नायिका को दूती कहते हैं। भानुदत्त ने दूती को सखी से भिन्न माना है, हालांकि अनेक अन्य हिन्दी तथा संस्कृत के विद्वानों ने दूती तथा सखी का प्रयोग समान अर्थों और रूपों में किया है। दूती श्रृंगार रस के उद्दीपन विभाव के अन्तर्गत आती है।

दूती तीन प्रकार की होती हैं जैसा कि कृपाराम ने इनका विभाजन किया है। ये हैं – उत्तमा, मध्या, तथा अधमा। इन तीनों भेदों को ही अधिसंख्य विद्वानों ने माना है। कुछ ने स्वयंदूतीका को भी स्वीकार किया है। अनेक अन्य विद्वानों ने दूती के अन्य भेद भी किये हैं – जैसे हित, हिताहित, तथा अहित। परन्तु ये केवल शब्दों में ही उत्तमा, मध्या, तथा अधमा से क्रमशः भिन्न हैं, तथ्य में तो समान ही हैं।

उत्तमा दूती वह है जो बड़ी मधुरता तथा चतुरता से अपना काम निकालती है, तथा वह पैर पड़ने में भी नहीं हिचकती। मध्या दूती नायिका मधुर तथा कठोर दोनों तरह के व्यवहार करते हुए बड़ी चतुरता से अपना कार्य सम्पन्न करती है। वह हित तथा अनहित दोनों को समझाने का प्रयत्न करती है। अधमा दूती नायिका स्वभाव से ही उग्र होती है तथा कठोर वचनों का भी प्रयोग करती है। स्वयंदूतिका वह नायिका होती है जो अपना दूत स्वयं होती है।

भरत तथा संस्कृत के अनेक आचार्यों ने पेशे के आधार पर भी दूती के भेद किये हैं। इस प्रकार तोष ने 26, दास ने 18, बेनी ने 12, देव ने 13, तथा श्यामसुन्दर दास ने 8 अन्य प्रकार की दूतियों का उल्लेख किया है।