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दुःखवाद

दुःखवाद एक दर्शन है। यह अनित्यवादी तत्ववाद का ही नैतिक रूप है। इसका प्रारम्भ गौतम बुद्ध (जन्म ईसा पूर्व 544 के लगभग) की उक्ति सव्बं दुक्खं (सर्वं दुःखम्) के साथ हुआ। उनका मानना था कि सब कुछ दुःख है। इसलिए यह लोक दुःख लोक है। मृत्यु को सबसे बड़ा दुःख माना गया जो सभी जीवों के लिए सुनिश्चित है। इसलिए यह मृत्युलोक निश्चित रूप से दुःखलोक है। जरा तथा मरण घोर दुःख है। जन्म, इच्छा, तृष्णा आदि भी दुःख स्वरूप है। समस्त भौतिक जगत दुःख है। मानसिक प्रपंच भी दुःख है।

उपनिषदों में सान्त (सा अन्त, अर्थात् जिसका अन्त होता है), अनित्य, तथा नश्वर को दुःख तथा अनन्त, नित्य, और अमर को सुख माना गया। परन्तु बुद्ध ने किसी भी पदार्थ को अनन्त, नित्य, और अमर नहीं माना। इस प्रकार उन्होंने कहा कि इस जगत में सुख है ही नहीं, जो है सब दुःख ही है। उन्होंने दुःख से बचने का मार्ग भी बताया जिसे अष्टांग-साधना-पद्धति कहा जाता है। ये क्रमिक सीढ़ियां हैं – सम्यक दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् जीविका, सम्यक् प्रयत्न, सम्यक् स्मृति, तथा सम्यक् समाधि। इससे दुःखों से निवृत्ति संभव है जिसे निर्वाण कहते हैं। लेकिन उन्होंने सचेत किया कि इस दुःख के अभाव को ही सुख नहीं समझना चाहिए। यह अवस्था तो सुख-दुःख से उदासीन अवस्था है।

सांख्य दर्शन में प्रकृति को त्रिगुणमयी बताया गया है। ये त्रिगुण हैं – सत्त्व, रज, तथा तम। सत्त्व को सुख के, रज को दुख के, तथा तम को मोह के बंधन में बंधने वाला बताया गया जिसके कारण शुद्ध सुख असंभव माना गया। सुख को सर्वत्र दुःखमिश्रित ही माना गया। दुःख तीन प्रकार के बताये गये – आध्यात्मिक, आधिभौतिक, तथा आधिदैविक। आदि-व्याधि को आध्यात्मिक; गिरने, डूबने आदि आकस्मिक घटनाओं से दुःख को आधिभौतिक; तथा प्रेत-पिशाच या देव दण्ड को आधिदैविक दुःख कहते हैं।

मध्य युग के सन्त साहित्य में दुःखवाद को वैराग्यवाद के पूर्व की अवस्था कहा गया। तुलसीदास ने कहा – जनमत मरत दुसह दुख होई। जन्म ही दुःख का कारण है। यह जगत दुःख का कारण है। बंधु-बांधव सभी दुःख के कारक हैं। शरीर दुःख का कारण है जिसमें आत्मा कैद है। मनुष्य अपनी इन्द्रियों से दुःख भोगता है। इसलिए वैराग्य ही इस दुःख से बचने का एकमात्र उपाय है जिससे आनन्दमय भक्ति उत्पन्न होती है।
आधुनिक यूरोपीय जगत में जर्मनी के शॉपेनहावर तथा हार्टमैन (19वीं शताब्दी) के प्रमुख दुःखवादी हुए। बीसवीं शताब्दी में आस्वाल्ड स्पेंगलर भी दुःखवादी दार्शनिक के रूप में जाने जाते हैं।

दुःखवाद के दो भेद हैं – नित्य दुःखवाद तथा अनित्य दुःखवाद। नित्य दुःखवाद में दुःख के खत्म होने की संभावना ही नहीं है परन्तु अनित्य दुःखवाद में निर्वाण या मुक्ति मिलने पर दुःख की समाप्ति संभव बतायी गयी है। मुक्ति भी अलग-अलग बातों में बतायी गयी है, जैसे बुद्ध ने निर्वाण में, भक्ति काल के सन्तों ने भक्ति में, अनेक अन्य सन्तों ने मुक्ति (मृत्यु के बाद) में, अनेक सन्तों ने जीवन काल में ही वैराग्य में, शॉपेनहावर ने विचार में, आस्वाल्ड ने संस्कृति के पुनर्जन्म में, श्रीमद्भग्वद्गीता ने अनासक्त कर्मवाद में, आदि।

दुःखवाद में दुःख को उर्ध्वगामी बनाने वाला तथा सुख को पतनशील बनाने वाला भी बताया गया है। कहा गया कि दुःख से आत्मा का परिष्कार संभव होता है तथा यह मनुष्य के लिए रचनात्मक तथा प्रेरक शक्ति का स्रोत है। दुःखवाद में धर्म तथा मोक्ष को ही पुरुषार्थ माना गया है, जबकि सुखवाद में अर्थ तथा काम को। दुःखवाद आत्मिक विकास पर बल देता है जबकि सुखवाद भोग-विलास पर। दुःखवाद निवृत्तिमार्ग है जबकि सुखवाद प्रवृत्ति मार्ग।