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दिव्य

दिव्य का सामान्य अर्थ है अलौकिक। परन्तु शपथ लेने या किरिया लेने के एक विशेष अर्थ में भी इसका उपयोग होता है।

लोक साहित्य में सत् की परीक्षा लेने, विशेषकर स्त्रियों के सतीत्व की परीक्षा के सम्बन्ध में इसका उल्लेख मिलता है। भोजपुरी लोकगीतों में कुछ गीत वैसे भी मिलते हैं जिनमें स्त्रियां अपने पतियों के परदेश से लौटने पर किरिया लेकर बताती हैं कि उन्होंने पति की अनुपस्थिति में पतिव्रत धर्म का पालन किया।

याज्ञवल्क्य तथा नारद स्मृतियों में कहा गया है कि दिव्य या तो सूर्योदय के बाद या पूर्वाह्न को ही देना चाहिए।

भोजपुरी में किरिया धराते हैं या लेते हैं। लोकगीतों में किरिया के लिए छह दिव्यों – अग्नि, आदित्य, जल, तुलसी, तैल, और सर्प – का उल्लेख किया जाता है। शास्त्रों में तुलसी तथा आदित्य दिव्यों का उल्लेख नहीं मिलता। जल दिव्य ‘गंगा विचार’, तैल दिव्य ‘तप्तमापदिव्य’ तथा सर्पदिव्य ‘घटसर्प’ दिव्य है।

कौल साधना
कौल साधना पद्धति में दिव्य तीन भावों में से एक है। दिव्य भाव के अतिरिक्त दो अन्य भाव हैं – वीर भाव तथा पशु भाव।

दिव्य भाव का साधक साधना का उत्कृष्ट अधिकारी होता है, जबकि वीर मध्यम तथा पशु अधम कोटि का।

दिव्य भाव साधक की सर्वोच्च तथा अन्तिम स्थिति है, जहां साधक पशु, सभाव पशु, विभाव पशु, सभाव वीर, तथा विभाव वीर नामक स्थितियों से क्रमशः गुजरता हुआ पहुंचता है तथा अन्ततः जीवनमुक्त हो जाता है।