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दार्शनिक आदर्शवाद

दार्शनिक आदर्शवाद एक दर्शन है जिसके अनुसार जगत का वास्तविक स्वरूप भौतिक नहीं है। यह वास्तव में चिन्मय, विज्ञानमय तथा मनोमय है।

यह सिद्धान्त चेतना एवं मानसिकता को प्रधानता एवं प्राथमिकता देता है। यह कहता है कि मन या चेतना ही परमसत्य है तथा भौतिक द्रव्य उनसे ही उद्भूत है। यह जगत न तो यन्त्रमात्र है और न ही जड़ मात्र है। परमतत्व चेतन है तथा जगत की व्यवस्था में यही आधारभूत कारण है। प्रकृति को स्वयं में पूर्ण मानना एक भूल है, एक भ्रम है। वास्तव में प्रकृति चैतन्य पर ही निर्भर है।

इसके अनुसार इन्द्रियों से अनुभूत होने वाला यह जगत, जैसा कि अनुभूत होता है, वह वैसा ही नहीं है। सत्य इस अनुभूति से भी परे है। इसलिए जगत् सोद्देश्य और अर्थपूर्ण है।

दार्शनिक आदर्शवाद मूल्यों तथा आदर्शों को जीवन और जगत के सापेक्ष भर नहीं मानता। वह इसे निरपेक्ष परम मूल्य मानता है जिसका दर्शन मानव अपनी अन्तरात्मा में करता है। यह स्वयं परमतत्व के रूप अस्तित्व में है। कुल मिलाकर यही ईश्वर है।

अद्वैत दर्शन के आदर्शवाद में कहा गया कि ईश्वर अनन्त तथा समस्त सत्ता का अधिष्ठान है।

दार्शनिक आदर्शवाद के अनेक भेद हैं जैसे विषयपरक आदर्शवाद, व्यष्टिपरक आदर्शवाद, निरपेक्ष आदर्शवाद आदि।

भारतीय दर्शन में वेद, उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्गीता आदि इस दार्शनिक आदर्शवाद को ध्वनित करते हैं।

दार्शिनक आदर्शवाद संसार भर के अनेक महान चिंतकों तथा विचारकों में पाया जाता है।


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