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दादूपंथ

दादूपंथ एक सम्प्रदाय है जिसे ब्रह्म सम्प्रदाय या परब्रह्म सम्प्रदाय के नाम से भी जाना जाता है। इस पंथ का नाम इसके संस्थापक संत दादू (1544-1603) के नाम पर पड़ा। दादू के आदि गुरु स्वयं परब्रह्म थे, इसी कारण इसका नामकरण परब्रह्म-सम्प्रदाय किया गया। दादू के सुप्रसिद्ध शिष्य सन्त कवि सुन्दरदास तथा रज्जब साहब ने अपनी रचनाओं में पारब्रह्म या परब्रह्म सम्प्रदाय का उल्लेख किया है।

दादू पंथ की स्थापना के काल को लेकर मतभेद हैं। ‘दादू जन्म लीला परची’ में इसका स्थापना काल 1583 के आसपास बताया गया है। परन्तु परशुराम चतुर्वेदी ने इसका स्थापना काल 1573 बताया है। क्षितिमोहन सेन के अनुसार संत दादू ने इसकी स्थापना गृहस्थ जीवन में प्रवेश के अनन्तर की। उन्होंने अपने साथियों की मण्डली में आध्यात्मिक चर्चा के द्वारा इसकी स्थापना की थी। इस पंथ का प्रभाव राजस्थान में सर्वाधिक रहा।

दादूपंथी साहित्य में परमतत्व या ब्रह्म परमपद, पनर्वाण, शून्य, सहज, सत्य आदि नामों से व्यक्त किया गया है। दादूपंथी मानते हैं कि परमतत्व अनिर्वचनीय, प्रेम का प्रदर्शक, तथा जगन्मय है। अर्थात् यह जगत ब्रह्ममय ही है। वही ब्रह्म जगत का निमित्त भी है तथा उपादान भी। वह सहज सुन्न (शून्य) है। उसी से सूर्य, चन्द्र, आकाश, पृथ्वी, जल, पावक आदि की उत्पत्ति है। ओंकार सृष्टि का कारण है। वह घट-घट वासी है, अर्थात् एक ही आत्मा सबमें व्याप्त है। वही परमतत्व संसार का सर्वश्रेष्ठ सेवक है जो वासना से मुक्त रहकर समान रूप से सबकी सेवा में रत है। उनकी ही सेवा भाव का अनुकरण वायु, सूर्य, चन्द्र, आदि सभी कर रहे हैं। उनका मानना है कि साधक को जिस मुक्ति या परमपद, चन्द्रलोक, सत्यलोक, शिवलोक, बिहिश्त आदि के पाने की बात कही जाती है वह सब इसी जीवन में प्राप्त हो जाता है। उनके अनुसार जीवनमुक्त वह व्यक्ति है जिसके संशय नष्ट हो गये हैं। बाह्याडम्बर माया है और वह त्याज्य है।

निर्गुण धारा के इस पंथ की स्थापना का उद्देश्य तथा आदर्श निम्न पद में अन्तर्निहित है –

भाई रे, ऐसा पन्थ हमारा।
द्वैपष रहित पन्थ गहि पूरा, अवरण एक अधारा।
वाद विवाद काहू सौं नाहीं, माहीं जग थै न्यारा।
समदृष्टि सुभाइ सहज में, आपहि आप विचारा।।1।।
मैं तैं मेरी यहु मति नाहीं, निर्वैरी निरकारा।
पूरण सबै दे पिया आपा पर, निरालंब निर्धारा।।2।।
काहू के संग मोह न ममिता, वंगी सिरजनहारा।
मन ही मन सौं समझि सयाना, आनंद एक अपारा।।3।।
काम कल्पना कदे न कीजै, पूरण ब्रह्म पियारा।
इहि पंथि पहुंचि परगहिं दादू, सोतत सहजि संभारा।।4।।

स्पष्ट है कि दादू पंथ के विचारों पर कबीरपंथ, सूफी दर्शन, तथा उपनिषदों का प्रभाव है।
दादूपंथ की नाद-कुल-परम्परा बुढ्ढन से प्रारम्भ होती है, जिन्हें एच एच विल्सन ने संत कबीर का शिष्य बताया है।
इस पंथ के प्रमुख उपसम्प्रदाय हैं – खालसा, नागा, उत्तरगढ़ी, विरक्त, तथा खाकी। महन्त जेतराम के समय में उपसम्प्रदायों का बनना शुरु हुआ था क्योंकि संत दादू के निधन के बाद पंथ को संगठित रखने की योग्यता वाला कोई व्यक्ति नहीं रहा। नराने में खालसा उपसम्प्रदाय का केन्द्र बना। विरक्त सम्प्रदाय के संत घूम-घूमकर दादू के उपदेशों का प्रचार करते थे इसलिए उनका कोई केन्द्र नहीं है। खाकी भी ऐसा ही करते हैं। सुन्दरदास ने नागा उपसम्प्रदाय की स्थापना की थी जबकि बनवारीदास ने उत्तरगढ़ी की।

दादू के 52 प्रमुख शिष्य थे जिनमें सुन्दरदास, रज्जब, गरीबदास, जगजीवन, वषनाजी, भिस्किनीदास, वाजिदजी, फकीरदास विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए।

दादूपंथी साहित्य निर्गुण साहित्य है। इसने निर्गुण धारा के सर्वाधिक कवि दिये। किसी भी अन्य सम्प्रदाय में इतने निर्गुण कवि नहीं हुए। स्वयं दादू के 20 हजार पद, साखी, तथा बानगी रचे। दादू के दो शिष्यों सन्तदास तथा जगन्नाथदास ने एक काव्य संग्रह तैयार किया जिसका नाम है ‘हरदेववाणी’। ‘जीवन परची’ की रचना जनगोपाल ने की। रज्जब साहब ने 5352 छन्द रचे। उनकी प्रमुख दो रचनाएं हैं – ‘वाणी’ तथा ‘सर्व्वांगी’। सुन्दरदास ने विख्यात ‘ज्ञानसमुद्र’ तथा ‘सर्वांगयोगप्रदीपिका’ सहित 42 ग्रंथ रचे। गरीबदास ने 15 ग्रंथ रचे जिनमें 23,000 छन्द हैं। राधोदास, जो दादू के प्रमुख शिष्यों में थे, ने ‘भक्तमाल’ नाम से एक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। अन्य अनेक शिष्यों ने हजारों पद रचे। सुन्दरदास, जो भाषाविद और व्याकरणज्ञ भी थे, को इस पंथ के सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है।