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दरसनी

दरसनी एक नाथपंथी सम्प्रदाय है। यह गोरखनाथी योगियों का मुख्य सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के साधु अपने कान फाड़कर उसमें एक मुद्रा धारण करते हैं। इस मुद्रा का नाम दर्शनी है जिसके कारण इनका नाम दरसनी (दर्शनी) पड़ा। दर्शन नाम की मुद्रा मिट्टी की भी बनी हो सकती है, हाथी के दांत की भी, या विभिन्न धातुओं की भी। इन दर्शनी साधुओं को कनफटा योगी भी कहा जाता है।

ये साधु कुण्डल भी धारण करते हैं जिसे पवित्री के नाम से भी जाना जाता है। कुमायूं के दरसनी योगी रुई के सूत 'जनेव' भी धारण करते हैं। पवित्री को इसी सूत में बांधकर रखा जाता है। पवित्री हरिण की सींग, पीतल, तांबा या किसी अन्य धातु की भी हो सकती है। इसी रूई के सफेद धागे से बंधी रहती है उनकी सिंगीनाद (सीटी) और उसमें लटकती है रुद्राक्ष।

दरसनी योगी भोजन के पूर्व तथा प्रातः एवं संध्या कालीन उपासनाओं के समय सिंगीनाद को बजाते हैं। वे अपने जनेव को सिंगीनाद जनेव भी कहते हैं क्योंकि यह जनेव सिंगीनाद से बंधा होता है।

दरसनी योगी या साधु अपने कमर में मेखला भी धारण करते हैं। यह मूंज की रस्सी से बना एक प्रकार का कटिबंध है।