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दक्खिनी

दक्खिनी, दकनी, या दखनी नाम से उस भाषा या साहित्य को अभिहित किया जाता है जो दक्षिण भारत के बहमनी वंश तथा बीजापुर, गोलकुण्डा, एवं अहमदनगर से सम्बंधित मसलमान कवियों और लेखकों की भाषा रही। पन्द्रहवीं से अट्ठारहवीं सदी तक दक्खिनी भाषा और साहित्य का प्रभाव रहा। इस भाषा को उस समय राजभाषा जैसा सम्मान प्राप्त था। यह हिन्दवी या हिन्दी का दक्षिणी रूप ही था। उस समय की उस क्षेत्र की अन्य भाषाएं थीं - मराठी, तमिल, तेलुगु, तथा कन्नड़।

उत्तर भारत से गये मुसलमान हिन्दवी लेकर वहां गये थे तथा धीरे-धीरे अन्य प्रचलित भाषाओं के संसर्ग से एक विशेष दक्खिनी शैली बन गयी। इसमें मध्ययुगीन खड़ी बोली (मेरठ के आसपास की) तथा बांगरू के नमूने देखने को मिलते हैं।

ध्यान रखने की बात यह है कि उस समय उत्तर भारत में हिन्दवी एक भाषा मात्र थी परन्तु इस भाषा में उस समय दक्खिनी साहित्य लिखे गये।

दक्खिनी साहित्य के पहले ग्रंथकार हुए ख्वाजाबंदानवाज (1318-1432), जिन्होंने मिराजुल आशिकीन नामक ग्रंथ लिखा। पहले कवि हुए निजामी जो बहमनी सुलतान अहमदशाह तृतीय के शासनकाल (1460-62) के दौरान थे। इस भाषा की प्रारम्भिक रचनाओं में हैं कदमराव व पदम। मुल्ला वजही का प्रसिद्ध गद्य ग्रंथ 1635 ईस्वी में लिखा गया।

इस काल की प्रमुख काव्य रचनाओं में हैं गवासी की 'मसनवी सैफुलमुल्क' तथा 'बंदीउज्जमाल' (1626), तूतीनामा (1639), वजही की 'उतुल मुश्तरी' (1609), तथा इल निशाती की 'मसनवी फूलबन' (1655)।

वली औरंगाबादी दक्खिनी के अन्तिम तथा उर्दू के प्रथम कवि माने जाते हैं।

गोलकुण्डा के कुतुबशाही राजा मु. उली कुदुबशाह खुद अच्छे कवि थे तथा उनकी रचनाएं कुल्लियात नाम से प्रकाशित हैं।

दक्खिनी के सभी कवि मुसलमान थे। उनकी कविताओं में भारतीयता विशेष तत्व है, तथा केवल लिपि ही फारसी है। फारसी अरबी के शब्द पर आज की उर्दू से भी कम और केवल तद्भव रूप में।