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तुक

काव्यशास्त्र में तुक तुकांत का ही दूसरा नाम है। जब किसी छन्द के दो चरणों के अन्त में अन्त्यानुप्रास आये तो उसे तुक या तुकांत कहते हैं। इसमें स्वर तथा व्यंजन दोनों वर्णों की समानता और उनमें एकता होती है। यह हिंदी काव्यों की स्थिति है। उदाहरण के लिए देखा, रेखा में खा की तुकबन्दी हुई।

परन्तु उर्दू और फारसी में स्वर के एक होने पर भी तुक बन जाता है। उदाहरण के लिए देखा, भाला में आ की तुकबन्दी हुई।

जहां तक संस्कृत का सवाल है स्तोत्रों, अष्टपदियों, एवं षट्पदियों में ही तुक मिलता है। अन्य पद्यों में तुक बहुधा नहीं मिलता। अपवाद स्वरूप ही मिलता है।

हिन्दी कविता में तुक लोकभाषाओं की गेय परम्पराओं से विकसित हुआ। कुछ दोहरे तुकान्त भी मिलते हैं अर्थात् किसी चरण के अन्तिम दो शब्द किसी दूसरे चरण के अन्तिम दो शब्दों के साथ तुकबन्दी में प्रयुक्त किये जाते हैं।

भिखारीदास ने अपने काव्यनिर्णय में तीन प्रकार के तुकों की चर्चा की है - उत्तम, मध्यम, तथा अधम। उत्तम के भी तीन रूप बताये गये - समसरि, विषमसरि, तथा कष्टसरि।

समसरि गुरु का उदाहरण – दरसौ, सरसौ, परसौ, बरसौ।
विषमसरि का उदाहरण – नीरन, गंभीरन, धीरन, तीरन।
कष्टसरि का उदाहरण – मुसकात हैं, सरसात हैं, प्रभात हैं, जात हैं। (प्रभात तुक कष्टसरि है)

मध्यम के रुप हैं - असंयोगमिलित, स्वरमिलित, तथा दुर्मिल।

असंयोगमिलित का उदाहरण – व्यही, चाहि। (चाहि के स्थान पर च्याहि होता तो संयोग मिलित हो जाता)
स्वर या सुरमिलित का उदाहरण – रोई, कोई।
दुर्मिल का उदाहरण – उज्ज्वल, निर्मल, स्रीफल, हिमंचल।

अधम तुक के रूप हैं - अमिलसुमिल, आदिमत्त अमिल, तथा अन्तमत्त अमिल।
उदाहरण – पलकें, अलकें, झलकें, छकें। (छकें अमिल है)

वीप्सा, याम, और लाटिया नाम से तीन भेद और दिये गये हैं।

वीप्सा का उदाहरण – धनु, धनु, छनु, छनु, तनु, तनु, वनु, वनु।
लाटिया का उदाहरण – फिरत हैं, फिरत हैं, फिरत हैं, फिरत हैं। लाटिया गुरु रदीफ के साथ आनेवाला काफिया है।

भानु ने तुकों के छह भेद बताये हैं। ये हैं - सर्वान्त्य, समान्त्य-विषमान्त्य, समान्त्य, विषमान्त्य, समविषमान्त्य, तथा भिन्न-तुकान्त।