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तान्त्रिक मत

तान्त्रिक मत भारत में प्रचलित एक विचारधारा है जिसमें तत्व-चिन्तन की अपेक्षा साधना-पद्धति को प्रधानता दी जाती है। इसमें किसी एक देवता या शक्ति को सृष्टि का मूल तत्व माना जाता है। इसमें यंत्रों का विशेष महत्व होता है। इसमें देवताओं के प्रतीक बीजाक्षरों और वर्णों का विधान होता है। भूतसिद्धि, कुण्डलिनी योग, रहस्यमयी साधनाएं, गुह्य वामाचार, दीक्षा और गुरू का भी इसमें अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान होता है।

भारत में 600 से 1200 ईस्वी के बीच अनेक तान्त्रिक समुदायों का उदय हुआ और इस प्रकार अनेक तान्त्रिक मत फैल गये। परन्तु 600 ईस्वी के पहले भी भारत में तान्त्रिक मत थे। ऐसे मत कहां से आये इसपर सर्वमान्य तथ्य उपलब्ध नहीं है। केवल धारणाएं हैं, जैसे कि आर्य बाहर से आये और तन्त्र भी बाहर से आये, या आर्य भी भारत के ही हैं और तन्त्र भी, या तन्त्र भ्रष्ट ब्राह्मणों द्वारा चलाए गये, या तन्त्र मूलतः भारत के प्राचीन आदिवासियों या नीच जातियों की पद्धतियां हैं, आदि।

परन्तु इतना सही है कि पुराने तन्त्रों को आगम (जो बाहर से आये, अर्थात् अनार्य पद्धतियों से आर्य पद्धतियों में आये) कहा जाता है। शुद्ध वैदिक दृष्टि से ये बाहरी तत्व था, अर्थात् ये तन्त्र अवैदिक हैं। ऋक्, साम, और यजुः वेदों में इनका उल्लेख नहीं है। अथर्व वेद में मारण, मोहन, उच्चाटन, यन्त्र, मन्त्र रक्षा, सिद्धि, गुह्य साधना आदि का उल्लेख है। परन्तु अथर्व वेद की चर्चा श्रीमद्भगवद्गीता में भी नहीं है, इसे बहुत बाद में चौथा वेद माना गया। जिन लोगों में तन्त्र परम्पराएं थीं उन्हें आर्य लोग व्रात्य भी कहते थे। प्रारम्भ में कुलीन ब्राह्मणों में ऐसी तंत्र परम्पराएं नहीं थीं।

तान्त्रिक काल (600-1200) में यह मत भारत में काफी प्रभावी रहा और अनेक कुलीन जातियों और कुलीन ब्राह्मणों ने भी इसे अपनाया। तान्त्रिक आचार्यों ने घोषित किया कि वेदों तथा पुराणों, श्रुतियों और स्मृतियों का युग समाप्त हो गया तथा अब केवल तन्त्रों का युग है। इसका इतना प्रभाव पड़ा कि भारतीय समाज में तन्त्र को भी वैदिक श्रुतियों के समकक्ष गिना जाने लगा।

तान्त्रिक मत में तान्त्रिक साधनाओं को दो भागों में बांटा गया है - दक्षिण तथा वाम। इस प्रकार ये या तो दक्षिण मार्ग हैं या वाम मार्ग, और इस प्रकार इनकी साधना पद्धतियां दक्षिमाचार और वामाचार कहलायीं।

दक्षिणाचार में प्रातःकाल संध्या, मध्याह्न में जप, ऊन के आसन पर बैठना, दूध-शर्कर का पान, रुद्राक्ष की माला धारण करना, तथा अपनी पत्नी से ही साधना की तरह संभोग करने का विधान है।

वामाचार में इसके विपरीत विधान हैं। इसमें नृदन्त की माला, कपाल का पात्र, छोटी कच्ची मछलियों का चर्वण, मांसभक्षण, तथा सभी जातियों की परस्त्रियों से मैथुन का विधान है। इसमें पांच विशेष विधान हैं जिसमें पंचमकार – मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा तथा मैथुन – का सेवन किया जाता है। जब ये भैरवीचक्र करते हैं तो साधक और साधिकाएं मिलते हैं तता मद्यपान के बाद मैथुन साधना करते हैं। इसमें जाति का कोई भेद नहीं रहता। इसमें सभी वर्ण के साधक और साधिकाएं द्विज ही माने जाते हैं। कहा जाता है कि गंगा के जल में मिलकर बाहरी जल भी गंगाजल हो जाता है उसी तरह भैरवीचक्र में मिलकर नीच जातियां या वर्णों के लोग भी ब्राह्मण ही हो जाते हैं।

भैरवीचक्र के तीन भेद हैं - वीर, राज, तथा देव। राजचक्र में स्त्रियां यामिनी, योगिनी, रजकी, श्वपची, तथा कैवर्त्तक नारी के रूप में व्यवहृत होती हैं। ये पांच शक्तियां मानी जाती हैं। देवचक्र में राजवेश्या, नागरी, गुप्त-वेश्या, देव-वेश्या तथा ब्राह्म-वेश्या नामक पांच शक्तियां मानी जाती हैं। नागरी किसी भी रजस्वला कन्या को कहते हैं।

शास्त्रों में विशेषकर आगमसार में संकेत मिलता है कि इस सभी बातों के कुछ अन्य सांकेतिक अर्थ बी हो सकते हैं जो विशेष रूप से दीक्षित लोग ही जानते होंगे, वरना यदि मद्यपान से मुक्ति मिलती तो सभी शराबी, तथा मैथुन से मुक्ति मिलती होती तो मैथुनरत सभी जीव कबके मुक्त हो गये होते। यही कारण है कि ऐसी साधनापद्धतियों पर चलने को खड़ग की धार पर चलने से भी ज्यादा खतरनाक बताया गया है।

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