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तमिल भाषा और साहित्य

तमिलों की भाषा को तमिल भाषा तथा इस भाषा में लिखे साहित्य को तमिल साहित्य कहा जाता है। यह भाषा और इसे बोलने वाले लोग भी तमिल कहे जाते हैं। यह द्रविड़ भाषा परिवार की सर्वाधिक प्रचीन भाषा है और इस तरह इसका साहित्य भी इस परिवार का सबसे पुराना साहित्य है। यह तमिल नाडु के रहने वाले लोगों की भाषा है, ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि आज का तमिल प्रदेश बहुत छोटा है, जबकि प्राचीन तमिल प्रदेश की सीमा काफी बड़ी थी। तोल्गाप्पियम् नामक तमिल ग्रंथ में प्रचीन सीमा उत्तर में तिरूपति तथा दक्षिण में कुमरी नदी मानी गयी है। उस समय कुमरी नदी तथा पहरुली नदी के बीच तमिल के 49 देश विद्यमान थे। सागर-प्रलयों में तमिल का सारा विशाल भूभाग विलीन हो गया। इसका विवरण शिलप्पदिकारम् नाक प्राचीन महाकाव्य की टीका में मिलता है। तमिल का तुलनात्मक व्याकरण लिखने वाले काल्डवेल ने अपने ग्रंथ में तमिल प्रदेश की सीमा समस्त कर्नाटक, पूर्व और पश्चिम घाट के नीचे पालघाट से लेकर कुमारी अन्तरीप तथा उत्तर में बंगोपसागर के उपकूल तक 60,009 वर्ग मील में फैली बतायी। अनेक विद्वानों का मत है कि ईसा से अनेक शताब्दियों पूर्व तमिलभाषी प्रदेश पूर्व में जावा द्वीप से लेकर दक्षिण में अफ्रीका तक फैला था। आज यह तमिलनाडु तथा श्रीलंका के कुछ भागों की जन-भाषा है।

तमिल भाषा कितनी पुरानी है इसपर मतभेद हैं परन्तु इस बात में कोई मतभेद नहीं कि संस्कृत, ग्रीक, तथा लैटिन आदि भाषाओं की तरह यह अति प्राचीन तथा सम्पन्न भाषा है। यह भाषा आज भी सामान्य व्यवहार में है जबकि अन्य प्राचीन भाषाएं ग्रन्थों तक ही सिमटकर रह गयी हैं। तमिल ईसा पूर्व कई सौ वर्ष पहले से ही सुसंस्कृत और सुव्यवस्थित है।

तमिल वाङमय का एक प्रामाणिक ग्रंथ है तोल्गाप्पियम्। यह व्याकरण का ग्रंथ है जो संस्कृत के पाणिनि के व्याकरण अष्टाध्यायी से भी पुराना है। अर्थात् ईसा पूर्व 400 के पहले का।

तमिल के महान विद्वान राघवय्यंगार के अनुसार तमिल लिपि का सम्बंध प्राचीन मिस्री लिपि से है। भारत की यही एक भाषा है जिसे ब्राह्मी लिपि से नहीं जोड़ा जाता। इसकी वर्णमाला में 12 स्वर, 18 व्यंजन, तथा एक विसर्ग सदृश अर्धस्वर है। अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में यह वर्णमाला सबसे छोटी है।

इरैयनाकलवियलुरै नामक ग्रंथ ने तीन कविसंघों का वर्णन है। प्रथम कविसंघ ईसा पूर्व 9950 से ईसा पूर्व 5550 तक 4400 वर्षों का है। इसमें 89 कवि थे। इस काल का प्रमुख ग्रन्थ है अगत्तियम् । यह व्याकरण ग्रंथ था जो आज उपलब्ध नहीं है। इसमें 12000 सूत्र थे तथा इसे तमिल का आलोचनात्मक ग्रंथ माना जाता है। इस काल के अन्य प्रमुख ग्रंथ थे - परिपाडल, मुदुनारै, मुदुगुरुकु, तथा कलवियलुरै।

तमिल साहित्य का संवर्धन पाण्डिय राजाओं के संरक्षण में हुआ। उनकी राजधानी दक्षिण मदुरा थी जो सागर में विलीन हो गयी। उसके बाद उन्होंने अपनी राजधानी कपाटपुरम् नामक स्थान पर बनायी, तथा वहां दूसरे कविसंघ की स्थापना की। इसमें 59 सदस्य थे। इस संघ ने लगभग 3700 वर्षों तक साहित्य रचना की। यह संघ ईसा पूर्व 1850 में समाप्त हो गया जिसका कारण सागर की उथल-पुथल ही थी। इस काल के प्रमुख ग्रंथ हैं - तोलगाप्पियम्, महापुराणा, इसैनुणुक्कम्, तथा भूतपुराणम्।

उसके बाद वर्तमान मदुरा में तीसरे कविसंघ की स्थापना हुई। इसमें नक्कीरर एक प्रमुख कवि थे। कुल सदस्यों की संख्या 49 थी। यह संघ भी 1850 वर्षों तक ही रहा। इसके खत्म होने का कारण अज्ञात है।

पहले कविसंघ की कोई रचना आज उपलब्ध नहीं है। दूसरे कविसंघ की केवल एक रचना तोलगाप्पियम् ही उपलब्ध है जिसके चरयिता हैं अगस्त्य मुनि के शिष्य तोलगाप्पियर। तोलगाप्पियम् अद्भुत व्याकरण ग्रन्थ है तथा ऐन्द्र व्याकरण से प्रभावित है। तीसरे कविसंघ की अनेक रचनाएं उपलब्ध हैं। उन रचनाओं में वर्णित अनेक मन्दिर तथा मूर्तियां आज भी हैं। इस काल के प्रमुख काव्य संग्रह हैं - एट्टुत्तोगे (आठ संग्रह), पत्तुपाटटु (दस कविताएं) तथा पदिनेण्कील्कणक्कु (अट्ठारह लघु कविता संग्रह)। इनमें श्रृंगार तथा वीर रस का बाहुल्य है। प्रकृति वर्णन भी इनकी विशेषता है। एक प्रसिद्ध ग्रंथ है तिरुक्कुरल जिसमें धर्म, अर्थ, और काम के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। संसार की किसी भी भाषा में धर्म, अर्थ, और काम की इतनी सजीव, सरल, सुन्दर, तथा संक्षिप्त व्याख्या नहीं मिलती। इसके कवि हैं संत तिरुवल्लुवर। इसमें कुल 1330 दोहे हैं। इस संत की महानता यह है कि विभिन्न धर्मों के अनुयायी इन्हें अपने-अपने धर्म का - शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन और यहां तक कि ईसाई – मानते हैं तथा प्रमाण के रूप में तिरूक्कुरल के दोहे उद्धृत करते हैं।

तमिल साहित्य के कालों का विभाजन इस प्रकार है - संघपूर्व काल, संघ काल, संघोत्तर काल, भक्ति काल, कम्बन काल, मध्य काल तथा आधुनिक काल।

संघोत्तर काल में तमिल के प्रमुख महाकाव्यों की रचना हुई। इस काल के पांच सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य हैं - शिलप्पदिकारम्, मणिमेकलै, जीवक-चिन्तामणि, बलयापदि, तथा कुण्जलकेशि। लगभग 600 ईस्वी तक यह काल चला।

600 ईस्वी के आसपास से भक्ति काल प्रारम्भ हुआ। इस दौरान शैव तथा वैष्णव भक्ति रचनाएं प्रचुर मात्रा में हुई। बारह आलवार संत विभिन्न जातियों से हुए जिनकी रचनाओं को नालायिरदिव्यप्रबन्धम् कहा गया। ये वैष्णव थे। इस ग्रन्थ में 4000 पद्य हैं। मन्दिरों में आज भी इनकी रचनाएं गायी जाती हैं। इन्हीं आलावरों में एक आण्डाल नामक एक प्रसिद्ध भक्तिनी हुई। इनका विवाह भगवान विष्णु से हुआ बताया जाता है। आण्डाल के गीतों के संग्रह 'तिरूप्पावै' तथा 'नाच्चियार तिरूमोलि' नाम से प्रसिद्ध हैं।

भक्ति काल में अनेक प्रबंध काव्यों की रचना हुई जिसके कारण इसे प्रबंध काल भी कहा जाता है। प्रमुख प्रबंध काव्यों में शामिल हैं - पेरियपुराण, कम्बनरामायण, तथा नलबेन्वा। कम्बन इस काल के प्रमुख कवि हैं इसलिए इसे कम्बन काल भी कहा जाता है। कम्बन रामायण 12वीं सदी में लिखा गया जिसमें 12000 पद्य हैं। इसमें वृत्तम नामक छन्द का प्रयोग किया गया है तथा नाटकीयता भी है। तमिल काव्य परम्परा का चरमोत्कर्ष इस ग्रन्थ में है।

13वीं सदी के बात 200 वर्षों तक टीका काल रहा क्योंकि इस दौरान पुराने ग्रंथों की टीकाएं ही अधिक लिखी गयीं, तमिल साहित्य में उनका ही प्रभुत्व रहा। नच्चिनाकिनीयार को इस काल का सर्वश्रेष्ठ टीकाकार माना जाता है। यह तमिल साहित्य का मध्य काल था जो 17वीं सदी तक चला।

18वीं सदी से तमिल साहित्य का आधुनिक काल आया। इसमें गद्य का विकास हुआ। ईसाई मिशनरी आये जिन्होंने तमिल में बहुत काम किया। तमिल के प्रसिद्ध लेखक वेदनायकम् पिल्लै ने हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाया तथा तमिल में अनेक ग्रंथों का निर्माण किया। सर्वसमरसकीर्तन, नीतिनूल, तथा पेणमणिमालै इनके प्रमुख ग्रंथ हैं। ईसाइयों ने तमिल भाषा का सरल व्याकरण तथा शब्दकोश बनाया। बीरमामुनि नामक ईसाई संत (फादर वैस्की) ने तमिल में तेम्बावाणी काव्य लिखा जिसमें ईसा के बारे में बताया गया है। इनका व्यंग्य प्रधार ग्रंथ है परमार्थ गुरूकदै। इस युग के मुसलमान लेखकों में प्रसिद्ध हैं मुहम्मद इब्राहिम, मुहम्मद हुसेन, नायिनार, मस्तान साहिब, गुलाब कादिर आदि।

19वीं सदी के प्रसिद्ध गद्यलेख हैं आरुभुगनावलर। इस सदी में नाटक, गद्य, उपन्यास, कहानी और गीत प्रचुर मात्रा में लिखे गये। संस्कृत के अनेक प्रमुख ग्रंथों का भी तमिल में अनुवाद हुआ। इस काल के प्रमुख लेखक हैं - नागनाद पडिंदर, दामोदरम् पिल्लै, मीनाक्षीसुन्दरम् आदि। लोकगीतों की दृष्टि से गोपाल कृष्ण भारतीय की रचना नन्दनचरित्र भी उल्लेखनीय है। 19 वीं सदी के अन्त में लिखे गये प्रसिद्ध उपन्यास हैं - प्रतापमुदालियारचरित्रम्, कमलाम्बालचरित्रम्, पदमावतीचरित्रम्, तथा जटावल्लवर।

20वीं शती में अंग्रेजी का प्रभाव हुआ। तमिल में नयी भाषा शैली का सूत्रपात हुआ। आधुनिक ढंग के साहित्य, नाटक, काव्य आदि की रचनाएं होने लगीं। सुन्दरम् पिल्लै ने मनोन्य णीयम् नामक काव्यनाटक की रचना की। सूर्यनानायण शास्त्री ने शेक्सपीयर की शैली का अनुकरण कर कई नाटक लिखे जिनमें मानविजय, कलावती, तथा रूपवती नामक नाटक प्रसिद्ध हैं। मुदलियार ने नाटकों की कमी को पूरा करने के लिए 80 नाटक लिखे।

सब्रह्मण्यम भारती इस युग के अमर कवि हैं। ये राष्ट्रवादी कवि हैं। जासूसी उपन्यास लिखने वालों में आरणी कुप्पुसामी मुदलियार तथा सामाजिक उपन्यासकारों में बडबूर डरैसामी अय्यंगार तथा रंगराज प्रसिद्ध हैं। कृष्ममूर्ति ने भी अनेक स्थायी महत्व के उपन्यास लिखे जिनमें शिवगामियिन्शपदम तथा पर्तिवनकनऊ उल्लेखनीय हैं। अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास लेखक हुए – वरदराजन, महादेवन, कण्णन, मणि, जीवा, अनुत्तमा, सरस्सती तथा गुहप्रिया।

पत्र-पत्रिकाओं के प्रसार के कारण तमिल में कहानी लेखन भी लोकप्रिय हुआ। पुराने कहानीकारों में अय्यर भारती तथा बंकटमणि प्रसिद्ध हैं। बाद के प्रमुख कहानीकार हुए – राजाजी, पुदुमैप्पित्तन, अकिलन, कल्की, जीवा, राजगोपालन और पिच्चमूर्ति। इस युग के प्रमुख आलोचकों में स्वामीनाद अय्यर, राघवय्यबर, राघवय्यर, का. पिल्लै, सोमसुन्दर भारती, वैयापुरि पिल्लै, ब. वरदराजन, श्रीनिवास राघवन, सेतुपिल्लै तथा मीनाक्षीसुन्दरम् पिल्लै। ज्ञानसम्बंधन भी आधुनिक आलोचकों में उच्चस्तरीय माने जाते हैं। निबन्ध लेखकों में कल्याणसुन्दर मदलियार अद्वितीय माने जाते हैं।