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तत्व

तत्व पदार्थ का एक विग्रह है जिससे पदार्थ बने होते हैं।

प्राचीन पश्चिमी चिंतन परम्परा में तत्व चार थे - पृथ्वी, जल, अग्नि, तथा वायु। इसी तरह भारतीय चिंतन परम्परा में इसमें गगन भी शामिल था और इस प्रकार तत्व पांच हुए। परन्तु आधुनिक विज्ञान में तत्वों की संख्या 118 हैं। इनमें से 94 ही प्रकृति में पाये जाते हैं तथा शेष 24 सिंथेटिक तत्व हैं जो प्रायोगिक या अन्य प्रक्रियाओं के दौरान बनते हैं।

भारतीय अध्यात्म और दर्शन की चिंतन परम्परा में तांत्रिकों तथा शैव 36 तत्व मानते हैं। तांत्रिकों का कहना है कि भगवान शिव ने अपने पांच मुखों से पांच आम्नायों का उपदेश किया है जिनमें 36 तत्वों का ही निर्णय किया गया है। ये तत्व इस प्रकार हैं -

1. शिव, 2. शक्ति, 3. सदाशिव, 4. ईश्वर, 5. शुद्ध विद्या, 6. माया, 7. विद्या या अविद्या, 8. कला, 9. सत्र, 10. काल, 11. नियति, 12. जीव, 13. प्रकृति, 14. मन, 15. बुद्धि, 16. अहंकार, 17. गोत्र, 18. त्वक, 19. चक्षु, 20. जिह्वा, 21. घ्राण, 22. वाक्, 23. पाणि, 24. पाद, 25. पायु, 26. उपस्थ, 27. शब्द, 28. स्पर्श, 29. रूप, 30. रस, 31. गन्ध, 32. आकाश, 33. वायु, 34. तेज, 35. जल, तथा 36. पृथ्वी।

इन तत्वों की प्रकृति के अधार पर इनको तीन वर्गों में रखा गया है - सत्, चित्, और आनन्द।

सत्, चित्, तथा आनन्द पहले दो तत्वों शिव और शक्ति में प्रकट या अनावृत्त रहते हैं। इन्हें शिवतत्व या शुद्धतत्व कहा जाता है।

जिनमें सत् तथा चित् अनावृत्त रहता है तथा आनन्द आवृत्त रहता है उसे उन्हें विद्यातत्व या शुद्धाशुद्ध तत्व कहा जाता है। इनमें सदशिव, ईश्वर, तथा शुद्ध विद्या शामिल हैं।

शेष 31 तत्व आत्मतत्व कहे जाते हैं। इनमें केवल सत् अंश ही अनावृत्त या व्यक्त रहता है। ये अशुद्ध तत्व भी कहे जाते हैं। तन्त्र में आत्म शब्द का अर्थ जड़ शरीर ही है। इस आत्म में गुप्त चैतन्य और गुप्त आनन्द है, केवल सत् (होना) ही प्रकट या व्यक्त है।

सांख्य दर्शन में तत्वों की संख्या 25 है। ये हैं -

1. प्रकृति, 2. पुरुष, 3. महान् या बुद्धि, 4. अहंकार,
पांच तन्मात्र - 5. शब्द तन्मात्र, 6. स्पर्श तन्मात्र, 7. रूप तन्मात्र, 8. रस तन्मात्र, 9. गन्ध तन्मात्र,
पांच ज्ञानेन्द्रियां - 10. कान, 11. त्वचा, 12. आंख, 13. रसना, तथा 14. नाक
पांच कर्मेन्द्रियां - 15. हाथ, 16. पांव, 17. जीभ, 18. पायु, तथा 19. उपस्थ
20 . मन,
पंच माहभूत - 21. पृथ्वी, 22. जल, 23. तेज, 24. वायु, तथा 25. आकाश।

सांख्य तत्वों की स्वतंत्र सत्ता नहीं मानते। उनके अनुसार परब्रह्म ही वास्तविक सत्ता है तथा नाम रूप वाले जगत को वास्तविक सत्ता समझना अज्ञान है।

वेदान्ती भी तत्वों की स्वतंत्र सत्ता नहीं मानते तथा जगत को मिथ्या मानते हैं।