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ज्योतिष में मुहूर्त

ज्योतिष में मुहूर्त शुभाशुभ फल बताने वाले किसी भी समय को कहते हैं। फलित ज्योतिष के अनुसार गणना कर के निकाला गया कालखंड ‘मुहूर्त’ कहलाता है।

इसके तहत लोगों की रुचि उस समय को जानने में होती है जिस समय उसे करने पर फल शुभ होता है। लोग यह भी जानना चाहते हैं कि कौन सा समय अशुभ फल देने वाले हैं।

शुभ फल देने वाले समय को शुभ मुहूर्त करते हैं तथा अशुभ फल देने वाले को अशुभ मुहूर्त।

विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, विद्यारंभ, नींव पूजन, नामकरण संस्कार, व्यापार प्रारंभ, सेवाकरण, नवीन वाहन क्रय आदि के लिए लोग ज्योतिषि से शुभ मुहूर्त पूछते हैं। फिर उन मुहूर्तों के नाम भी विवाह मुहूर्त, गर्भाधान मुहूर्त आदि रखे जाते हैं।

कोई समय शुभ है या अशुभ इसकी जानकारी संबंधित नक्षत्र, तिथि, वार, मास आदि के आधार पर किया जाता है।

मुहूर्त जातक के भाग्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए मुहूर्त चयन में जातक की वर्तमान दशा-अंतर्दशा का भी ध्यान रखा जाता है। चयनित मुहूर्त में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि गोचरवश अंतर्दशा का स्वामी, महादशेश से षडाष्टक या द्वादश भावगत न हो। शुक्र ग्रह सांसारिक सुखो का कारक है। अतः समस्त कार्यों में शुक्र दोष पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

शुक्रास्त का समय चिरस्थायी कार्य प्रारंभ करने के लिए उपयुक्त समय नहीं माना जाता।

मुहूर्त चयन में चर कार्यों हेतु चर लग्न व स्थिर कार्यों हेतु स्थिर लग्न को प्राथमिकता दी जाती है।

1, 4, 7, 10 लग्न चर व 2, 5, 8, 11 लग्न को स्थिर लग्न माना जाता है।

शुभ तिथि के चयन में इस बात का विशेष ध्यान दिया जाता है कि चंद्रमा, जन्म राशि से 4, 6, 8, 12 भावगत न हो।
मुहूर्त चयन में ‘भद्रा’ का भी विचार आवश्यक समझा जाता है। यदि चंद्रमा 1, 2, 3, 8 राशि में हो तो भद्रावास स्वर्ग में, 6, 7, 8, 10 राशि में हो तो भद्रावास पाताल लोक में, तथा 4, 5, 11, 12 राशि में हो तो भद्रावास मृत्यु लोक में होता है। भद्रा का वास जहां होता है, वहीं का फल प्राप्त होता है।

जन्म नक्षत्र, जन्म मास, जन्म तिथि, पिता की मृत्यु की तिथि, क्षय तिथि, क्षय मास, अधिक मास, 13 दिन का पक्ष तथा शुक्रास्त में शुभ कार्य नहीं किये जाते।

कार्यारम्भ के लिए शुभ तिथियों के चयन में युग तिथियों व अमावस्या का बचाव किया जाता है। युग तिथियां हैं- कार्तिक शुक्ल नवमी - सतयुग आरंभ की तिथि। वैशाख शुक्ल तृतीया - त्रेता युग आरंभ की तिथि। माघ कृष्ण अमावस्या - द्वापर युग आरंभ की तिथि। श्रावण शुक्ल त्रयोदशी - कलियुग आरंभ की तिथि।

तिथियां 4 प्रकार की होती हैं- 1, 6, 11 तिथि को ‘नंदा’ 2, 7, 12 तिथि को ‘भद्रा’ 3, 8, 13 तिथि को ‘जया’ 4, 9, 14 तिथि को ‘रिक्ता’ और 5, 10, 15 तिथि को ‘पूर्णा’ तिथि कहते हैं।

यदि नन्दा तिथियां (1, 6, 11) शुक्रवार को, भद्रा तिथियां (2, 7, 12) बुधवार को, जया तिथियां (3, 8, 13) मंगलवार को, रिक्ता तिथियां (4, 9, 14) शनिवार को तथा पूर्णा तिथियां (5, 10, 15) गुरुवार को पड़े, तो सिद्ध योग होता है।

‘पुष्य नक्षत्र’ को नक्षत्रों का सम्राट कहा गया है जो कि शनि ग्रह का नक्षत्र है। यह नक्षत्र, ‘विवाह’ को छोड़कर शेष अन्य कार्यों के लिए शुभ होता है।

वार और नक्षत्र भी मिलकर ‘सिद्ध योग’ का निर्माण करते हैं। रविवार को अश्वनी, तीनो उत्तरा, हस्त, मूल, पुष्य नक्षत्र, सोमवार को मृगशिरा, अनुराधा, रोहिणी, श्रवण और पुष्य नक्षत्र, मंगलवार को अश्वनी, आश्लेषा, कृत्तिका और उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र, बुधवार को कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, अनुराधा और हस्त, गुरुवार को अश्वनी, अनुराधा, पुनर्वसु, रेवती और पुष्य नक्षत्र, शुक्रवार को अश्वनी, अनुराधा, पुनर्वसु, श्रवण और रेवती नक्षत्र तथा शनिवार को रोहिणी, स्वाती और श्रवण नक्षत्र ‘सिद्धि योग’ बनाते हैं। रवि-पुष्य व गुरु-पुष्य योग सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।

कोई मुहूर्त पंचम नक्षत्रों में पड़ रहा है तो चंद्रमा का बल भी देखा जाता है।
‘तारा’ का विचार कार्यारम्भ के लिए आवश्यक समझा जाता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा - नव संवत् आरंभ या बासंतिक नवरात्रि का प्रथम दिन हमेशा शुभ होता है। फिर भी आश्विन शुक्ल दशमी - दशहरा माघ शुक्ल पंचमी - बसंत पंचमी वैशाख शुक्ल तृतीया - अक्षय तृतीया कार्तिक शुक्ल एकादशी - प्रबोधनी एकादशी (देव उठावनी एकादशी) फाल्गुन शुक्ल द्वितीया- फलेरा दोज आषाढ़ शुक्ल नवमी - भड्डली नवमी मुहूर्त चयन में शुभ तिथियां प्राप्त हो जाने के बाद भी लग्न शुद्धि करने की परम्परा है।

सर्व सिद्धि प्रदायक अभिजीत मुहूर्त है। 8वां मुहूर्त ‘अभिजीत मुहूर्त’ कहलाता है। जब शुभ लग्न या शुभ मुहूर्त बनता न दिखायी पड़ रहा हो तो अभिजीत मुहूर्त का सहारा लिया जाता है। केवल बुधवार को यह छोड़ा जाता है।

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