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जगतानुबोध

चित्त का भ्रान्ति से मुक्त होना जगतानुबोध है। ऐसा तब होता है जब व्यक्ति इस संसार के वास्तविक स्वभाव का ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

यहां यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि शून्यवादियों ने चित्त का अस्तित्व नहीं माना था और इन अनस्तित्व के साथ ही इसे अनुत्पाद कहा था। परन्तु विज्ञानवादियों ने चित्त का अस्तित्व माना और इस संसार को चित्त की एक भ्रान्ति माना। इस प्रकार जगतानुबोध विज्ञानवाद ही हुआ जिसमें संसार के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर चित्त को इस भ्रान्ति (संसार) से मुक्त करना होता है।

जगतानुबोध के लिए आवश्यक है जगत के वास्तविक स्वरूप को जानना। सिद्धों ने इसका विवेचन करने के क्रम में चार चीजों का जिक्र किया। ये हैं - कन्ध (स्कन्ध), भूअ (भूत), आअत्तण (आयतन) और इन्दी (इन्द्रीय)। उन्होंने कहा कि इनकी चेतना का प्रवाह ही संसार है। चर्यापद की भव-नदी यही है और ये ही बौद्ध परम्परा में चार महाभूत हैं। इसी परम्परा में सरहपा के चार महाभूत थे - पृथ्वी, अप् (जल), तेज (अग्नि) और गन्धवह (वायु)। काण्हपा ने इसमें एक महाभूत गगन को जोड़ कर पांच महाभूत बताये। ये ही भव के आधार हैं इसलिए इन्हें भूत कहा गया। इन्द्रियां इनके विषय इन्हीं भूतों पर आश्रित हैं। पृथ्वी का विषय है गन्ध, और इसका इन्द्रिय है नासिका। जल का विषय है रस या स्वाद, तथा इन्द्रिय है जिह्वा या रसना। तेज का विषय है रूप, तथा इन्द्रिय है नेत्र। वायु का विषय है स्पर्श तथा इन्द्रिय है त्वचा। आकाश का विषय है शब्द तथा इन्द्रिय है श्रोत्र।

इन पांचों पर आधारित हैं पांच विज्ञान – चाक्षुष, श्रोत्रिय, घ्राण, रसना तथा काया या त्वचा। पांचों इन्द्रियां इन विज्ञानों की अधिष्ठात्री हैं।

विज्ञानवाद में मन को छठी इन्द्रिय माना गया है। यह मन ही मनोविज्ञान की अधिष्ठात्री है। सिद्घों ने भी कहीं कहीं छह इन्द्रियों का उल्लेख इसी आधार पर किया है।

जिस आयतन की चर्चा की गयी है उसका अर्थ है निवासस्थल। इस प्रकार यदि हम पुष्प देखते हैं तो पुष्प का दर्शन चाक्षुष विज्ञान हुआ, तथा पुष्प रूप या विषय आयतन एवं चक्षु इन्द्रिय आयतन। इस प्रकार छह विज्ञानों के 12 आयतन समेत कुल 18 धातुओं से इस संसार का निर्माण माना गया है। वस्तुगत दृष्टकोण से वस्तुओं के धर्मों का समवेत स्वरूप संसार है जबकि चित्तगत दृष्टिकोण से 18 धातुओं के योग को ही संसार माना गया है।

प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त से शून्यवाद ने सभी धर्मों का नैरात्म्य सिद्ध किया परन्तु विज्ञानवाद ने सभी धर्मों को भी चित्तगत माना।

सभी धर्मों में पांच प्रकार के साम्य माने गये तथा इसी के अनुरूप पांच स्कन्धों का वर्गीकरण हुआ। ये हैं - रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान।

अतः यह संसार क्या है? उत्तर है - स्कन्ध, भूत, आयतन, इन्द्रिय, और विषय का विकार।