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छायानाट्य

छायानाट्य पुत्तिलकाओं का एक नृत्य है जिसे छायाकृतियों द्वारा अभिनीत किया जाता है। पुतलियों या कठपुतलियों पर प्रकाश डालकर उसकी छाया पर्दे पर दिखायी जाती है।

छायानाट्य चीन में ईसा पूर्व के काल में काफी प्रचलित थे। वहां से यह नृत्य भारत आया, भारत से फिर फारस, अरब देशों, अफ्रीका और उसके बाद यूरोपीय देशों तक गया।

चीन में इन छायाओं को पारदर्शी रंगों से रंगीन भी बना दिया जाता था परन्तु यूरोप पहुंचते-पहुंचते रंगीन करने की कला का लोप हो गया।

19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में छायानाट्य का फिर से प्रचार शुरु हुआ तथा यूरोप में काफी लोकप्रिय हुआ। नाट्यशालाओं में पर्दे लगने लगे थे जिनपर छायानाट्य दिखाये जाते थे। चित्रपट (सिनेमा) के आविष्कार के पहले की यह स्थिति थी। 1880 से 1890 के बीच ये वहा अत्यन्त लोकप्रिय थे। चलचित्रों के आविष्कार की प्रेरणा यहां से भी मिली। छायापट, ध्वनि, रंग एक चल आकृतियों से युक्त छायानाटक सिनेमा के आविष्कार से लगभक सौ वर्ष पहले ही आ गये थे।

भारत में भी एक समय में छाया नाट्य काफी लोकप्रिय थे। दक्षिण भारत में 16 तथा 17 वीं शताब्दी तक ऐसे नाटक लोकप्रिय थे।