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छप्पय

छप्पय एक मात्रिक विषम छन्द है। इसमें रोला के चार पाद और उल्लाला के दो पाद का योग होता है, और इस प्रकार इसमें छब पाद होते हैं। इस कारण यह संयुक्त छन्द की श्रेणी में आता है। भानु ने छप्पय के 71 भेदों का उल्लेख किया है।

रोला के चार पाद 11 तथा 13 मात्राओं के, तथा उल्लाला के दो पाद 15 तथा 13 मात्राओं के होते हैं।उल्लाला के दो भेदों के अनुसार तो पांचवें तथा छठे पाद में 26 तथा 28 मात्राएं भी हो सकती हैं। कवियों में 28 मात्राएं लोकप्रिय हैं। प्रारम्भ में प्रयुक्त रोला के कारण गति का चढ़ाव तथा अन्त में उल्लाला के कारण गति का उतार होता है।

इस छन्द का प्रयोग अनेक कवियों ने वीर तथा समान रसों को अभिव्यक्त करने के लिए तथा युद्ध का वर्णन करने के लिए किया है। परन्तु तुलसीदस, नाभादस तथा हरिश्चन्द्र ने इसका प्रयोग भक्ति रस की अभिव्यक्ति के लिए भी किया है।

छप्पय का प्रयोग करने वाले मुख्य कवियों में हैं चन्द, तुलसी, केशव, नाभादास, भूषण, मतिराम, सूदन, पद्माकर, तथा जोधराज।