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चैता

चैत्र मास में गाये जाने वाले एक प्रकार के भोजपुरी लोकगीतों को चैता कहा जाता है। चैता को घांटो के नाम से भी जाना जाता है। जब इसे घांटो कहा जाता है तब इन गीतों में उत्तर प्रदेश के बलिया के बुलाकीदास का नाम बार-बार आता है। मैथिली में इन गीतों को चैतवार कहा जाता है जिनमें वसन्त की मस्ती और रंगीन मिजाजी देखने को मिलती है। इनमें गजब की लोच होती है। इन गीतों की प्रमुख विशेषताएं हैं इनकी पेशलता, मनोहरता, तथा द्रावकता जो किसी भी अन्य प्रकार के गीतों में नहीं पायी जाती।

चैता प्रेम के गीत हैं। स्वाभाविक रूप से प्रेम के सभी पक्ष इसमें मिलते हैं। चैता के गेय विषय मुख्य रूप से सम्भोग तथा विप्रलम्भ श्रृंगार होता है। परन्तु अन्य विषयों पर भी चैता के गीत मिलते हैं। पति-पत्नी के प्रणय सम्बंधी विषय से लेकर श्रीकृष्ण के गोपियों के छेड़ने तक के विषय मिलते हैं। वैसे भोजपुरी के संत कवियों ने भी अनेक चैता गीत लिखे हैं। कहीं प्रेमी और प्रेमिक या पति और पत्नी के बीच मधुर सम्बंधों तथा वियोग या विमुखता की पीड़ा भी गेय विषय होते हैं। इन गीतों में प्रमुख रूप से झाल और ढोलक वाद्य ही बजाये जाते हैं।

चैता दो प्रकार के होते हैं - झलकुटिया तथा साधारण।

झलकुटिया में सामूहिक रूप से झाल कूटकर बजाया जाता है। झाल कूटना एक प्रकार से झाल बजाने का तरीका है। जब इसे सामूहिक रूप से गाया जाता है तब गवैये दो दलों में विभक्त हो जाते हैं। पहले दल का व्यक्ति गीत की प्रथम पंक्ति को गाता है तथा दूसरे दल के व्यक्ति उसपर समवेत स्वर में टेक देते हैं। इस प्रकार चैता काफी देर तक गाया जाता है। इसमें टेक के रुप में 'अहो रामा चैत मासे' या 'हो रामा चैत मासे' का प्रयोग करते हैं। वैसे तो चैता की प्रत्येक पंक्ति के प्रारम्भ में रामा तथा अन्त में हो रामा या अहो रामा का प्रयोग मिलता है। पंक्तियों के प्रारम्भ में आरोह तथा अन्त में अवरोह होता है।

साधारण चैता में कोई व्यक्ति विशेष बिना झाल या बाद्य की सहायता से गाता है।

चैता का एक उदाहरण -

रामा नदिया के तीरवा चनन गाछी बिरवा हो रामा।

घांटो का एक उदाहरण -

दास बुलाकी चहत घांटो गावे हो रामा, गाई गाई बिरहिन समुझावे हो रामा।