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चैतन्य महाप्रभु अचिन्त्यभेदाभेदवाद के प्रवर्तक थे। उनका जन्म नवद्वीप में सन् 1485 ई में हुआ था। वह एक तरह से मध्यमार्गी थे और स्वयं को मध्य मत के मानते भी थे। वह भक्ति योगी थे तथा कीर्तन आदि में अपना समय बीताते थे। दशमूल श्लोक के रचयिता के रुप में भी उन्हें जाना जाता है।
उनका स्वयं का लेखन अधिक मात्रा में उपलब्ध नहीं है परन्तु उनके शिष्यों के अनेक ग्रन्थों में उनके मतों की पुष्टि की गयी है।
चैतन्य महाप्रभु ने परमात्मा और उनकी शक्ति को कृष्ण और राधा माना। वह तो कृष्ण को ही भगवान मानते थे, भगवान का अवतार नहीं, जबकि अनेक अन्य संत और विद्वान कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार मानते रहे हैं। वृन्दावन ही उनके लिए अमरपुरी था। उनका मानना था कि वृन्दावन के निवासी मुक्त हैं।
चाहे जो भी हो, चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों ने उन्हें ही भगवान कृष्ण का अवतार मान लिया। यही कारण है कि चैतन्य महाप्रभु के पंथ में उनके अनुयायी उन्हें साक्षात कृष्ण मानते हैं, तथा वे एकमात्र उनकी ही उपासना करते हैं।
ब्रह्मसूत्र के भाष्य के रुप में ही चैतन्य श्रीमद् भागवत पुराण की प्रतिष्ठा है। यह अलग बात है की वह स्वयं मध्य भाष्य के प्रति सम्मान रखते थे। मध्य भाष्य में जहां-जहां उन्हें आपत्ति थी वहां-वहां उनके विचार सुनिश्चित हो गये थे, तथा भागवत को ही प्रधानता दी।

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