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चेतना

चेतन जीवधारियों में एक विशेषता है जिसके कारण वस्तुओं, व्यवहारों, और विषयों का ज्ञान होता है। इसी ज्ञान को चेतना कहा जाता है। चेतना शब्द का प्रयोग मनोवैज्ञानिक तथा दार्शनिक रूप से किया जाता है। साहित्य या दर्शन में चेतना के स्थान पर चैतन्य शब्द का प्रयोग ही बहुधा देखने को मिलता है, तथा चेतना शब्द का अधिक प्रयोग मनोविज्ञान में ही किया जा रहा है।

जहा मनोवैज्ञानिक अर्थ में इसका प्रयोग होता है वहां चेतना की प्रमुख विशेषताएं हैं - प्रवाह अर्थात् निरन्तर परिवर्तनशीलता, और उस प्रवाह की विभिन्न अवस्थाओं में अविच्छिन्न एकता तथा साहचर्य। इसी के कारण जो अनुभव हमें पूर्व में हो चुका होता है वह बाद में भी स्मरण में आता है। परन्तु मानसिक संघर्ष, अत्यधिक दमन, तथा भावनात्मक आघातों के कारण कई बार साहचर्य का गुण नष्ट भी हो जाता है। उस स्थिति में चेतना बिखर जाती है तथा व्यक्तित्व खण्डित हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति वहुव्यक्तित्व का भी हो जाता है।

परन्तु विज्ञानवादी तथा प्रत्ययवादी दार्शनिक चेतना को शाश्वत तथा एकमात्र सत्ता मानते हैं। इस अर्थ में चेतना और कुछ नहीं बल्कि आत्मा है।