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चपलता

चपलता तैंतीस संचारी भावों में से एक है। यह मानव की एक मनोवैज्ञानिक अवस्था है। भरत के अनुसार इसके विभाव हैं - प्रेम, घृणा, अधैर्य, ईर्ष्या, विरोध आदि तथा इसके अनुभाव हैं - कठोर वचन, प्रतारणा, पीटना, मारना, बांधना आदि। विश्वनाथ के अनुसार मात्सर्य, द्वेष, राग आदि के कारण मन स्थिर नहीं रहना चपलता है। भर्त्सना, परुषता, स्वच्छन्दता आदि का आचरण इसमें प्रमुख है।

चपलता दो प्रकार की हैं - प्रकृतिगत तथा आगन्तुक।

प्रकृतिगत चपलता भावदशा मे रूप में अभिव्यक्त होती है परन्तु आगन्तुक चपलता का सम्बंध किसी स्थायी भाव से होता है।

पद्माकर ने इसका एक अच्छा उदाहरण यह दिया है -
झांकति है कबहूं झंझररीन झरोखनि त्यों सिरकी सिरकी मैं
झांकति ही खिरकी मैं फिरै थिरकी-थिरकी खिरकी-खिरकी मैं।

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