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गौणी भक्ति

गौणी भक्ति एक प्रकार की भक्ति है जिसे गौणभक्ति या साधनभक्ति भी कहा जाता है। पराभक्ति की साधना के मार्ग की यह पहली सीढ़ी है। कहा जाता है कि पराभक्ति की साधना में अनेक बाधाएं आती हैं जो गौणी भक्ति से स्वतः दूर हो जाती हैं।

नारदीय भक्तिसूत्र के अनुसार गुणभेद से ये तीन प्रकार की हैं - सात्विकी, राजसी तथा तामसी। इनमें तामसी भक्ति की अपेक्षा राजसी तथा राजसी भक्ति की अपेक्षा सात्विक भक्ति को श्रेष्ठ माना जता है।

सात्विकी भक्ति वह है जो भक्ति के लिए ही की जाती है।

राजसी भक्ति वह है जिसमें विषय, यश तथा ऐश्वर्य की कामना से भक्ति की जाती है।

तामसी भक्ति वह है जिसमें हिंसा, दम्भ, मत्सरता आदि का भी समावेश रहता है।

आर्तभेद से भी ये तीन प्रकार की हैं - अर्थार्थी, आर्त तथा जिज्ञासु। इन्हें सकाम भक्ति भी कहा जाता है।

अर्थार्थी भक्ति वह है जिसमें व्यक्ति धन आदि सांसारिक वस्तुओं के लिए भक्ति करता है।

आर्त भक्ति वह है जिसमें व्यक्ति दुखी होकर उसके निवारण के लिए भक्ति करता है।

जिज्ञासु भक्ति वह है जिसे भगवान को जानने की इच्छा से कोई व्यक्ति भक्ति करता है।

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