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गोपी

गोपी शब्द गोप का स्त्रीवाचक है, तथा गोप गौ पालन करने वाला भारत का एक समुदाय। इस प्रकार गोप समुदाय की स्त्रियां गोपी कही जाती हैं। गोपी शब्द सामान्यतः इसी अर्थ में लिया जाता है। परन्तु ऋग्वेद में भगवान विष्णु के लिए गोप, गोपति तथा गोपा शब्दों का प्रयोग हुआ है, क्योंकि उनके पास तृतीय पाद-क्षेप में अनेक गऊएं होती हैं जिनमें भूरिश्रृंग (अनेक सींगों वाली) गऊएं भी शामिल हैं। ऋग्वेद के विष्णु की व्याख्या भी अनेक प्रकार से की गयी है। कुछ विद्वान भगवान विष्णु के सूर्य मानते हैं जो पूर्व दिशा में उदित होकर अन्तरिक्ष को नापते हुए अपने तृतीय पाद-क्षेप में आकाश में फैल जाते हैं। ये विद्वान सूर्य के चारों ओर घूमने वाले ग्रह-नक्षत्रों को ही गोपी कहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का ही अवतार माना गया है। गोपाल कृष्ण तथा गोपियों सम्बंधी कथाएं भारत में अत्यन्त लोकप्रिय रहे हैं। गोपी-कृष्ण लीला भागवत धर्म का एक अंग है। लौकिक परम्परा में राधा-कृष्ण की जोड़ी प्रसिद्ध है। कृष्ण भक्ति सम्प्रदायों में गोपी-कृष्ण और राघा-कृष्ण की व्याख्या बड़े ही आध्यात्मिक रूप से की गयी है। इस प्रकार राधा-भाव या गोपी-भाव से कृष्ण भक्ति की भी लम्बी परम्परा है। भक्ति के इन भावों की अत्यन्त गंभीर और रहस्यपूर्ण व्याख्याएं उपलब्ध हैं।

महाभारत के हरिवंश नामक अध्याय में कृष्णावतार का कारण बताया गया है। उसके अनुसार वसुदेव पूर्व जन्म में कश्यप थे तथा उन्हें कुबेर की गौ हरण करने के अपराध में शाप मिला था। उसी शाप के कारण वह गौओं के बीज गोप रुप में जन्मे। कश्यप की स्त्री अदिति तथा सुरभी का जन्म देवकी तथा रोहिणी के रूप में हुआ। भगवान विष्णु ने देवताओं को ब्रज में जन्म लेने की आज्ञा देकर स्वयं कृष्ण के रूप में इन्हीं के यहां जन्म लिया। देवताओं ने पांचाल देश के कुरुवंश तथा वृष्णिवंश में जन्म लिया। हरिवंश से संकेत मिलता है कि गोप-गोपियां भी देवी-देवता ही थे।

वैष्णव पुराण में भी गोप-गोपियों की दैवी उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है।

श्रीमद्भागवत में गोपियों को देवताओं की स्त्रियां कहा गया जिन्होंने भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण के लिए जन्म लिया था।

पद्म पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में गोलोक की चर्चा है जहां कृष्ण के राधा और गोपियों के संग नित्य रहने की बात कही गयी है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया कि गोलोक में श्रीकृष्ण ने राधा तथा गोपियों को ब्रज में जन्म लेने की आज्ञा दी थी और उसके बाद उन्होंने स्वयं जन्म लिया था। देवी देवताओं ने भी गोप-गोपियों के रूप में जन्म लिया था।

पद्मपुराण के अनुसार दण्डकारण्य के कृष्णभक्तों और मुनियों ने भी गोपियों का जन्म पाया था।

तंत्र शास्त्रों में कृष्ण के वंशी की तान को अनाहत नाद, कालिन्दी को सुषुम्ना नाड़ी तथा गोपियों को योगिनी बताया गया है।

गोपियों को कई स्थानों पर 'श्रुतिरूपिणी' भी कहा गया है।

कृष्ण भक्ति सम्प्रदायों के ग्रंथों में गोपियों की उत्पत्ति के सम्बंध में अनेक अन्य रोचक कहानियां मिलती हैं जो विचारणीय हैं।

निम्बार्क के सनकादि या हंस सम्प्रदाय में कृष्ण की दो शक्तियों का उल्लेख है - ऐश्वर्य शक्ति तथा माधुर्य या प्रेम शक्ति। रमा, लक्ष्मी तथा भू उनकी ऐश्वर्य शक्तितयां हैं जबकि राधा और गोपियां उनकी प्रेम शक्ति।

गौड़ीय वैष्णव मत में गोपियां भगवान कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति हैं जो उनके साथ हमेशा प्रकट और अप्रकट रूप में विराजमान रहती हैं। वृन्दवन की गोपियों को भगवान कृष्ण की स्वरूप-शक्ति-प्रादुर्भाव-रुपा माना गया है।

वल्लभ सम्प्रदाय या पुष्टिमार्ग में भी गोलोक की गोपियों की उत्पत्ति स्वयं श्रीकृष्ण के आनन्दकाय से मानी गयी है जिन्होंने वृन्दावन में गोपियों के रूप में जन्म लिया था। गोपियों को इसमें धर्मरूप माना गया तथा कृष्ण को ब्रह्म रूप। राधा गोपियों में सिद्ध-शक्ति हैं इसलिए उन्हें स्वामिनी माना गया। गोपियों की श्रीकृष्ण का ही विस्तार माना गया और कहा गया कि जिस प्रकार बालक अपना ही प्रतिबिम्ब देखकर प्रसन्न होता है उसी प्रकार भगवान कृष्ण भी गोपियों के रूप में अपने ही स्वरूप विस्तार देखकर प्रसन्न रहते हैं। गोपियों का कृष्ण की रस-शक्ति माना गया जो उनसे अभिन्न हैं। केवल वृन्दावन की लीला में वे भिन्न प्रतीत होती हैं।

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