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गुणीभूत व्यंग्य

जिस व्यंग्य में व्यंगार्थ अप्रधान होता है उसे गुणीभूत व्यंग्य कहते हैं। यह काव्य का दूसरा भेद है। इसे मध्यम काव्य माना जाता है।

गुणीभूत व्यंग्य के आठ भेद हैं - अगूढ़, अपरांग, वाच्यसिद्ध्यंग, अस्फुट, संदिग्धप्रधान, तुल्यप्रधान, काक्वाक्षिप्त तथा असुन्दर।


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