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गीत

गाये जाने वाले पदों को गीत कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति भगवान शंकर से मानी जाती है। भारतीय संगीतशास्त्र में कहा गया है कि भगवान शंकर ने जब संसार के लोगों को दुखी देखा तो उन्हें दया आ गयी तथा इस दुख निवारण के लिए उन्होंने गीत और वाद्य प्रकट किया जिसके सहारे व्यक्ति दुखों से मुक्ति पा सकता है।

इस प्रकार स्वर और सुर दोनों भगवान शिव ने ही प्रकट किये। उन्हीं को नादब्रह्म भी कहा जाता है। नाद के दो रूप हैं। एक से व्यंजनों का तथा दूसरे से स्वरों अर्थात् सुर, ताल, लय आदि प्रकट किये जाते हैं। साम-संहिता-भाष्य ने स्वर-ग्राम की अभिव्यक्ति को गीत माना है। मीमांसा ने सामवेद में सहस्र प्रकार के गीतों के होने की चर्चा की है। ध्यान रहे कि साम का अर्थ गायन भी है।

गीत दो प्रकार के हैं - वैदिक गीत तथा लौकिक गीत।

लौकिक गीत भी दो प्रकार के हैं - मार्ग तथा देशी।

मार्ग शास्त्रीय है तथा इसके आदि आचार्य भगवान शंकर हैं। इसलिए इस प्रकार का गायन भगवान शंकर के प्रसन्न करने के लिए ही किये जाने का विधान है।

देशी गीत की पद्धतियां स्थान विशेष की परिस्थितियों के आधार पर बनी होती हैं। साहित्य में इसी को गीत कहा जाता है।


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