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गवरी भारतीय गायन विधा में एक स्वर है।

प्रकृति-पुरुष आदिवासी वनवासियों की अपनी निराली दुनियां हैं। इनकी कला, संस्कृति और काज-कर्म प्रकृति के जीवन चक्र और धर्म साहचर्य से अनुप्राणित हैं। इनका तपा हुआ काला तन, सहला हुआ भोला मन रूप लावण्य से सराबोर आदिमपन इनके वनजीवी लालन पालन का मांगलिक महावर है।

गवरी में देव, दानव, मानव और पशु सभी तरह के पात्र होते हैं। शिव पार्वती हमारे देव हैं तो हठिया, खड़ल्या, मियानन दानव। सूर, रीछड़ी, नार पशु हैं तो कजर कंजरी, मीणा, नट, खेतुड़ी, शंकर्या, कालवेलिया, बाणिया, बणजारा बणजारी, गोमा, सकलीगर, बगली, फताफती, देवर भोजाई ये सबके सब ऐसे मानव हैं जो सब कही हैं। जो सबसे घुलेमिले हैं। ये सब एक समग्र जीवन चक्र को रूपायित करते हैं।


गवरी इन्हीं आदिवासी भीलों का आदिम नृत्यानुष्ठान है जिसके मूल में आदिदेव महादेव शंकर और भस्मासुर रागस का आख्यान भारत है। ‘राईबूड़िया’ इसका नायक हैं जो समग्र गवरी रगमंडल का संचाालन करता है। यह शिव और भस्मासुर का संयुक्त प्रतिनिधित्व है। इसका जटा तथा भगव पहनावा शिव को प्रतीती देता है तो हाथ मे धारण किया कड़ा तथा भीमकाय चेहरा-मुखौटा भस्मासुर का रौद्र वीभत्स देता हैं। इसकी नायिका ‘राई’ कहलाती है। यह संख्या में दो होती हैं - शक्ति और पार्वती, दोनों शिव पत्नियां, एक जैसी।

राईबूड़िया महादेव के हाथ मेें लकड़ी का खांडा, कमर में मोटे घुघरूओं की बंधी पट्टी, जांघिया तथा विचित्र कलामय मुखौटा। यह गवरी की गोल नृत्यखाती गम्मत में नहीं रह कर उसके बाहर रहकर उसकी विपरीत दिशा में उल्टे पांव गवरी को अनुशासित करता है। राइयां लाल घाघरा, चूनड़ी, चोला तथा लाख का चुड़ा पहने रहती है। दाढ़ी मुछ को नदनिगी को ढ़कता हुआ कपड़ा राइयों को अजीब बनाता हैं। गवरी में छोटे बड़े सब भील होते हैं। भीलनियां कहीं भाग नहीं लेती। मर्द ही जनाना-मर्दाना बनते हैं।

श्रावणी पूर्णिमा को प्रत्येक भील परिवार का सदस्य देवी गौरज्या के देवल इकट्ठा होता है और देवी से सुख-शांति बनाये रखने, अकाल दुर्भीक्ष से बचाये रखने और सर्व प्रकार के रोग शोक को मिटाये रखने की कामना करता है। देवी इसके लिए गवरी लेने का हुकम देती है। भोपे के डील मे आह्वान होता है। गवरी के मुख्य पात्रों को खांडा बगसीस में मिलता है। देवी की असीम कृपा से हर तीसरे वर्ष गवरी ली जाती है। खम्मा के फटकारे लगते हैं। आनंद उछव होता है। राईबूड़िया परम्परागत पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिता पुत्र के उत्तराधिकार के रूप में बनता चलता है।

सभी पात्र ‘खेल्ये’ कहलाते हैं। विशिष्ट पात्रों में झामटिया पटकथा की प्रस्तुति देता है। कुटकड़िया अपनी कुटकड़ाई शैली से गवरी मे हास्य व्यंग्य की झड़ी देता रहता है। एक गोरनिया होता है जो गवरी में दिखता नहीं मगर इसके प्रदर्शन की आगे से आगे व्यवस्था करता चलता है। एक गाॅव से दूसरे गाॅंव में जाकर अपने गांॅव की ब्याहता कुलीन कन्या को गवरी रमाने की पाती झेलाता है जिसका अर्थ होता है उसके गाॅव की गवरी-गंगा, पीहर की गवरी, ससुराल में आकर खेलेगी। वह राईबूड़िया के लिये लपसी चावल तथा शेष पात्रों के लिए रोटी-कढ़ी की जीमन जीमाती है। दिन में प्रदर्शन होता है पूरे दिन। सभी खेल्मे पूरे चालीस दिनों तक एक समय तक भोजन करते हैं। हरी सब्जी से परे रहते हैं। स्नान नहीं करते हैं। शराब-मांस को छूते तक नहीं। पूर्ण संयम और नेम-नियम से रहते हैं। अपने घर नहीं जाते स्त्री संसर्ग नहीं करते यहां तक कि जूते तक नहीं पहनते हैं। देवी गौरज्या की अराधना में गवरी का यह नृत्यानुष्ठान उनकी धार्मिक चेतना और समर्पण का जबर्दस्त उत्साह है।

गवरी सबके लिये है। गांव का कोई चैराह, खुला स्थान ही इसका सर्व दिशीय मंच बन जाता हैं। त्रिशूल रोपी, थाली मादल बजी, भोपे में देवी का उतरना हुआ कि गवरी का रंगमण्डल प्रारम्भ हुआ। दिनभर गाते रहेंगे एक के बाद एक विशिष्ट स्वांग लय। सबको मालूम है सबकी कथा-गाया, भारत, किस्से। संध्या को गवरी समाप्ति के बाद गवरी नूतने वाली बाई की और से बूड़िये को पगड़ी अंगोछा, राई को साड़ी कपड़ा तथा अन्यों को फेंटा और नर्तकों को कसार का एक-एक लड्डू दिया जाता है। गवरी के पात्र पूरे सवा माह तक अभिनेता ही बने रहते हैं।

गवरी में देव, दानव, मानव और पशु सभी तरह के पात्र होते हैं। शिव पार्वती हमारे देव हैं तो हठिया, खड़ल्या, मियानन दानव। सूर, रीछड़ी, नार पशु हैं तो कजर कंजरी, मीणा, नट, खेतुड़ी, शंकर्या, कालवेलिया, बाणिया, बणजारा बणजारी, गोमा, सकलीगर, बगली, फताफती, देवर भोजाई ये सबके सब ऐसे मानव हैं जो सब कही हैं। जो सबसे घुलेमिले हैं। ये सब एक समग्र जीवन चक्र को रूपायित करते हैं।
गवरी जितने आदिम भील उतनी ही आदिम है। कई कथा, किस्से, भारत आरख्यात इसके उद्भव को, उपजीव्य को कथायित-व्यारव्यायित करते हैं। शिव भीलों के जंवाई भी हैं। पार्वती बेनकुंवाई हैै। कैलाश पर रहते-रहते पार्वती की अपने पीहर की याद हो आती है। उसका मन उचट जाता है। वह अपने सगे समधियों और ग्रामवासियों से मिलने को आतुर हो उठती हैं। शिवजी मस्तधनी उसे मना कर देते हैे बोलते हैं। पीहर में क्या है तुम्हारे! किससे मिलोगी! काका बाबा तो सब मर चुके हैं। पार्वती कहती है और भी बहुत कुछ है मिलने को। सारे के सारे वृक्ष हैं। लताएं हैं, जड़-जड़ेलिया हैं, पूरी प्रकृति है, मे उसी से मिलकर चली आउूंगी। शिवजी फिर एक बात फेंकते हैं - रूंख बेलड़ी सब जोर की हवा चलने से धाराशायी हो गये हैं। पार्वती कहती है कोई बात नहीं, मेंै अपने पीहर के सीमाड़े के पत्थरों से ही मिलकर चली आऊंगी।


कितनी आत्मीयता है। कितना प्रेम है! अपनी भूमि, वनस्पति के प्रति। जड़ चेतना के प्रति! पशु पक्षी के प्रति! पराई धरती चाहे कितनी ही सुखद-अभिराम हो मगर अपनी धरती की उससे कोई होड़ नहीं। सवा महीने की कौल कर पार्वती चली जाती है। पीहर में वह अपनी उन सारी सखी सहेलियों की याद करती है जो सब पराये घर की मेहमान बन चुकी होती हैं। पार्वती गवरी का मण्डल रचाकर गांव-गांव उनसे मिलने जाती हैं। वृक्षों से, पत्थर से, सखी सहेलियों से प्रत्येक जन-जन से मिलने को रचा है यह गवरी का नृत्योत्सव जो तब से भीली समुदाय का जीवनधर्म बन गया है।

गवरी- गौरांदे पार्वती, गांव की गुलमंेहदी सब ओर अपना प्रेमरंग बिखेरती हैं। गवरी-गौरांदे पार्वती, एक ऐसा वनफूल है जो पूरे सवा माह तक फूला रहकर चहुंुओर अपनी गंध-सुगंध बिखेरता है। उससे सबकुछ मगन मस्त हो उठता है। फसलें लहलाहा उठती हैं अपनी बेटी को पाकर। सब ओर प्यार फूटता है जैसे पड़वा फूटती है।

गवरी-गौरांदे पार्वती, दिव्य आत्मा की प्रतिमूर्ति। जीवनशुद्धि देने वाली। एक ऐसा फल जो कभी विफल नहीं होता। गवरी-गौरांदे पार्वती, शाश्वत जीवन की सफल फल श्रुति।

यह गौरांदे-गवरल-गवरी पार्वती अकेली नहीं है। नौ लाख देवियों का खेला है। नौ कली भारत भारत का कीर्तिनाद है। आदमी भी इसीलिए नौ द्वारे का पिंजड़ा बना हुआ है। भारत में कई भारत हैं, महाभारत हैं। एक भारत है जिसमें प्रलभ होने पर सब कुछ मिट गया। बचा तो केवल सुमेर, पर्वत। यही फूटा था मेंहदी का झाड़ और आई थी देवी अंबाव सब देवियों को लेकर। यह छह-छह माह की नींद सोती। आॅंख लगते ही पाताल से, सातवें पाताल से बड़ल्या वृक्ष आता, छाया करता, रक्षा करता। आॅंख खुलते ही अलौप हो जाता। एक बार देवी ने देख लिया। कोपलें पकड़ली। बोली-पाताल से आ क्यों नहीं जाते, यहीं जमी पर कोई नई रचना करें। बड़ ने बड़ी मनुहारे की अंत में आया पर अकेला नहीं। अपने साथ नीम, पारस, मरवा, मोगरा, बैर, आम, नारेल।

बड़ल्या दूध-दही से सींचा गया। धीरे-धीरे वह बाहर दीधा मैं फैला। थाली थाली जितनी उसके पात-पात। प्रत्येक पात पर सिंदूरी निशान। यह थरपित हुआ खमनौर हल्दीघाटी के पास देवल उनका स्थल पर। आज भी फेला है यह बड़ल्या। गवरी अपने मूल में इसी उत्साह आनंद कर प्रकटीकरण है, उत्सव उछव है। नाच की गोल होती गम्मत घाई समग्र पृथ्वी की परिक्रमा है। राई पार्वती का प्यार का नाम है। राई आई है इसलिए पूरी परथिनी की परिक्रम में यह गवरी की घाई है। यह हमारे भारतीय मानस की जन कल्याणी समग्रता है। यही शाश्वतता है।

मादल-महादेव का दल है। थाली पार्वती की रखवाली। जहां-जहां मादल बजती है वहां-वहां थाली बजती हैं। मादल-थाली मिलकर महादेव-पार्वती का राई भारत नाचते हैं। पूरा विश्व एक राई है, रंगमण्डल हैं जहां शिव और उनके समग्र गण नाचते हैं। रासते हैं, लीनयुक्त होते हैं वहां संपूर्ण रंग राग शाश्वत हो उठते हैं। सब दिशाएं खुली हैं सब नाच रहे हैं। नाचने वाला नचा रहा है। नाच शक्ति देता हैं। भक्ति देता है। शौर्य और शिव देता है सुचित्र और सुचेतना देता है। यही गवरी का मूल निकाय है।

जब मैं बहुत छोटा था, अपने गाॅंव कानोड़ के रावले मेे आई गवरी को दिनभर देखता रहा। मैं ही नहीं था, पूरा गाॅंव था। तब से यह गवरी मेरे अन्तस मे एक अलौकिक आया के रूप में मुझे समागई। उस दिन मैंने अपने छोटे से मन में इसे न जाने कितनी बार लौकिक-अलौकिक, अलौकिक लौकिक होते आत्मसात किया। इसी दिव्यानुभूति ने आगे जाकर मुझे शोध की प्रेरणा दी तब मैं गांव-गांव घूमा, भटका। कई गवरियां देखीं। भारत गाथाएं सूनीं। बूड़ियों राइयों, भोपों से मिला और जब पीएच.डी. ली तो कई महानुभाव हंसते रहे, गवरी की, मेरी और पीएच.डी. की मखौल उड़ाते रहे। वह समय ही ऐसा था।
उसी गवरी पर बीस साल बाद उदयपुर के आदिम जाति शोध संस्थान ने जब राष्ट्ीय कार्यशाला करने की सोची तो अतिरिक्त निदेशक डा0 नरेन्द्र व्यास को इस बात की बधाई दी कि गवरी के बहाने वे भारतीय लोकरंगी प्रदर्शनीकारी चेतना को राष्ट्रव्यापी स्वर देने जा रहे हैं और एक ऐसे आदिम लोकशैली को प्रस्तुत करने जा रहे हैं जिसमें समग्र भारतीय रंग चेतना के मूल तत्व मुखरित हुए, उद्घाटित हैं। इसलिए यह गवरी उदयपुर खण्ड के आदिवासी भीलों की धरोहर होती हुई भी अपने व्यापक फलक पर दिखाई देती हैं।

इतना सब कुुछ होने पर भी यह सही है। की बदलते परिवेश में अब इस प्रकार साॅंस्कृतिक विरासत से भील लोग स्वयं ही परे होते जा रहे हैं। इससे गवरी का समाज सीमित हुआ है। सामाजिक संगठनों ने भी अपना बदलाव लिया है। कुछ आथर््िाक परेशानियों ने भी इसके रंग को बदरंग किया है। बाहरी वातावरण का भी कम असर नहीं पड़ा है। संस्कृति के इन स्वरूपों पर देशकाल और व्यावसायिकता ने भी बड़ा प्रभाव छोड़ा है। युवकों की सोच ओर उनकी समझ ने भी इसे झकझोरा है। कई गांवों में गवरी बंद भी हो गई है। कई-नई चुनौतियां भी आ खड़ी हो गई है। ऐसी स्थिति में गवरी के भविष्य पर भी कई प्रश्नचिह्न लगे हैं।