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ख्याल

ख्याल भारतीय गायन परम्परा में गीत की एक शैली है। लोक नाटक के एक प्रकार को तथा हास्य प्रधान मालवी गीत को भी ख्याल कहा जाता है।

ख्याल गायन में धुन तथा शैली के अनुसार इसके दो प्रमुख भेद हैं - पहला ढाड़ा या खड़ी रंगत का ख्याल तथा दूसरा लम्बी रंगत या ताबील ख्याल।

इनमें अनेक उपभेद भी हैं - जैसे सिकस्ता ख्याल या लंगड़ी रंगत का ख्याल, लावनिय ख्याल, डेढ़ रंगती ख्याल, छोटी रंगत का ख्याल आदि।

ख्याल गायन के दो प्रमुख अखाड़े हैं - कलगी अखाड़ा तथा तुर्रा अखाड़ा।

ख्याल का प्रारम्भ 18वीं शताब्दी से माना जाता है। उस समय आगरा के आसपास एक विशेष प्रकार की कविता लिखी या रची जा रही थी, जिसे बाद में ख्याल कहा गया।

राजस्थान में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक विशेष प्रकार की लोकनाट्य शैली का जन्म हुआ जिसे भी ख्याल कहा गया। इसमें ऐतिहासिक या पारम्परिक कथाओं का लोक मंचन किया जाता है। यह नाट्य शैली उत्तर प्रदेश की नौटंकी तथा मालवा के नाच से काफी मिलती है। इसमें पद्य में ही संवाद होते हैं। नगाड़ा, सारंगी और ढोलक आदि का प्रमुखता से प्रयोग होता है। इसे गीति नाटक कहा जा सकता है।


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