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खेचरी

भारतीय हठयोग परम्परा में खेचरी योग की एक मुद्रा है।

इस मुद्रा में योगी अपने जीभ को उलटकर तालू से सटाते हैं तथा अपनी दृष्टि को ललाट पर दोनों भौंहों के बीच केन्द्रित करते हैं।

ऐसी अवस्था में कहा जाता है कि जीभ और चित्त दोनों आकाश में स्थित होते हैं। ख को आकाश कहते हैं इसलिए इस मुद्रा का नाम खेचरी पड़ा।

कहा जाता है कि जो व्यक्ति खेचरी मुद्रा का अभ्यास करता है उसे किसी प्रकार का रोग नहीं होता।

इसी खेचरी मुद्रा में योगी के स्थित होने को गोमांस भक्षण भी कहते हैं। गो का अर्थ इन्द्रिय होता है तथा जीभ भी एक इन्द्रिय है। जीभ को उलटकर तालू में लगाने को इसी कारण गोमांस भक्षण कहते हैं। अर्थात् योगी को योग में अपने इन्द्रियों को वश में करना होता है।

खेचरी मुद्रा के महत्व पर गोरखबानी में इस प्रकार कहा गया है -
मुख मध्ये खेचरी मुद्रा, स्वाद बिस्वाद से उत्पनी।
स्वाद बिस्वाद समोकृत्वा, मुद्रा तो भई खेचरी।

स्पष्ट है, योगियों को निर्देश दिया गया है कि जीभ के स्वाद के पीछे न भागें, बल्कि जीभ को नियंत्रित कर लें तथा स्वाद और बिस्वाद को समभाव में रखें।

सामान्य जीवन में भी अनेक परिवारों में या गायत्री परिवार जैसे संगठन में अस्वाद व्रत रखा जाता है। उस दिन भोजन में बिल्कुल सादा होता है, न नमक, न कोई मसाला आदि।

इसे ही जीभ की तपस्या कहते हैं।


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