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खण्डित व्यक्तित्व

खंडित व्यक्तित्व किसी भी व्यक्तित्व का वह स्वरुप होता है जिसमें उसके विभिन्न घटक विकारग्रस्त होने के कारण असम्बद्ध या विकीर्ण हो जाते हैं। सामान्य अवस्था में व्यक्तित्व के सभी घटकों में सामंजस्य होता है, जो मानसिक रोग के शिकार हो जाने पर भंग हो जाता है। सामान्य अवस्था में एक स्थाई तथा समेकित इकाई की भांति वाला जो व्यवहार होता है वह नष्ट हो जाता है। इसके कारण व्यक्तित्व के विभिन्न रूप असम्बद्ध से हो जाते हैं। एक ही व्यक्ति के अनेक चरित्र सामने आते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जटिल रोगियों में असम्बद्ध भाव, विचार, प्रेरणा आदि की संख्या इतनी अधिक हो जाती है कि एक ही व्यक्तित्व में कई अन्य स्वतंत्र व्यक्तित्व उभर आता है। ये व्यक्तित्व कभी-कभी एक साथ भी रह सकते हैं और कभी-कभी बारी-बारी से प्रकट होते हैं, तथा एक व्यक्तित्व को दूसरे व्यक्तित्व के बारे में ज्ञान भी नहीं रह जाता। अनेक व्यक्तित्वों वाले मरीजों में सिबिल का उदाहरण दिया जाता है। ऐसे भी मरीज मिलते हैं जिनका एक व्यक्तित्व धर्मात्मा का तथा दूसरा पापी का, और तीसरा सामान्य, चौथा कोई अन्य व्यक्तित्व होते हैं। उनका इलाज जटिल होता है।

आम जनजीवन में भी खण्डित व्यक्तित्व के उदाहरण पर्याप्त मिलते हैं। कथनी और करनी का अन्तर इसी खण्डित व्यक्तित्व का परिणाम है। बहुत लोग भीतर से धार्मिक, बाहर से धर्मनिरपेक्ष, और तीसरे धर्मविरुद्ध व्यक्तित्व के देखे जा सकते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार खण्डित व्यक्तित्वों का जीवन प्रबल मानसिक संघर्षों वाला होता है। वास्तव में प्रबल मानसिक संघर्षों के कारण ही खण्डित व्यक्तित्व की मनोदशा उत्पन्न होती है जिसका इलाज संभव है।


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