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क्रोध

क्रोध एक मनोदशा है। साहित्य में यह रौद्र रस का स्थायी भाव है। जब इसका प्रकटीकरण ईर्ष्या या जलन, अथवा मौन धारण के रूप में होता है तब इसे अमर्ष कहा जाता है। यह मनोविकार क्रोध तभी कहलाता है जब इसका प्रकटीकरण उत्कट और प्रबल रूप में हो।

साहित्यदर्पण में कहा गया कि शत्रु इत्यादि प्रतिकूल विषयों में तीक्ष्णता का उद्बोध क्रोध कहलाता है।

रमदहिन मिश्र ने कहा कि असाधारण अपराध, विवाद, उत्तेजनापूर्ण अपमान आदि से उत्पन्न हुए मनोविकार को क्रोध कहते हैं। अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' कहते हैं कि हृदय के प्रिय और अनुकूल भावों पर आघात होने से क्रोध का प्रादुर्भाव होता है।

क्रोध आने पर व्यक्ति उसे अनेक प्रकार से व्यक्त करता है। भौंहें चढ़ाना, ओठ काटना, ताल ठोंकना, अतीत में किये गये अपने कामों की बड़ाई करने लगना, ललकारना, उग्रता, आवेग, दांत निकालना, आंखों का लाल हो जाना आदि अनेक रूपों में इसका प्रकटीकरण होता है।

भारतीय अध्यात्म में मनुष्य को क्रोध से मुक्त रहने को कहा गया है। श्रीमद् भगवद् गीता में जब अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछते हैं कि आखिर न चाहते हुए भी व्यक्ति पाप कर्मों इस प्रकार क्यों नियोजित होता है मानो उसे बलपूर्वक लगा दिया गया है। भगवान श्रीकृष्ण उत्तर में कहते हैं - काम एष, क्रोध एष। अर्थात् यह काम और क्रोध ही है जिसके कारण व्यक्ति पाप कर्मों में लिप्त हो जाता है।

क्रोध अपने सभी रूपों में विनाशकारी है, इसलिए व्यक्ति को क्रोध न करने की ही सलाह दी जाती है।


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