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कृष्णभक्ति शाखा

हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल) को हिन्दी साहित्य के इतिहासकार रामचन्द्र शुक्ल ने चार प्रमुख शाखाओं में विभक्त किया है, जिनमें एक है कृष्णभक्ति शाखा। यह विभाजन सर्वमान्य हो गया है।

कृष्णभक्ति शाखा भक्ति काल की सगुण भक्ति धारा की दो शाखाओं में से एक है। दूसरी शाखा है रामभक्ति शाखा।

कृष्णभक्ति शाखा के कवि परम सत्य को सौन्दर्य तथा आनन्द के रूप में मूर्तिमान करते हैं। ये कवि मानसी तथा रागानुगा भक्ति को ही प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए बाह्य आचरण तथा मर्यादा तो तुच्छ वस्तु है। इसलिए उनके काव्य में रस और भाव की ही प्रमुखता मिलती है। यह इहलौकिकता से परलौकिकता की ओर जाती है।

कृष्णभक्ति शाखा में पतन भी आया तथा आचरण, मर्यादा, और भक्तिभाव में कमी आयी तथा उसके स्थान पर कवियों ने श्रृंगार और रस के बहाने कृष्ण का लम्पटीकरण तक किया। इस बात को भुला दिया गया कि कृष्ण ने छह वर्ष की बाल्यावस्था में गोपियों के वस्त्र चुराये थे, सातवें वर्ष गोवर्धन धारण किया था, आठवें वर्ष रास लीला रचायी तथा नौवें वर्ष वे वृन्दावन छोड़कर मथुरा चले गये थे। लेकिन कृष्ण और राधा का वर्णन युवा और युवती के प्रेम के रूप में किया गया। आठ वर्ष से कम उम्र के कृष्ण, 10 से कम की राधा, और लगभग सभी उम्र की गोपियों के बाल रूपी कृष्ण से प्रेम को जिस ढंग से कृष्णभक्ति में श्रृंगार के नाम पर चित्रित किया गया है उसे तो कृष्ण और गोपियों के चरित्र का स्वाभाविक बालक के रुप में कृष्ण से प्रेम का चित्रण नहीं माना जा सकता।

यह अलग बात है कि इस शाखा का प्रभाव अब भी भारतीय समाज में है और इसका काव्य हिन्दी साहित्य का प्रधान अंग है।


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