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कालाग्निरुद्र

भारतीय योग परम्परा में, विशेषकर नाथ सम्प्रदाय के योगियों में, कालाग्निरुद्र ऊर्ध्वगमन के देवता माने जाते हैं।

यह ऊर्ध्वगमन बिन्दु या शुक्र का ऊर्ध्वगमन है। ब्रह्मचर्य तथा वज्रौली साधना द्वारा इस गति को प्राप्त किया जाता है। जब बिन्दु ऊर्ध्वगामी हो जाता है तो प्राण और मन स्वयमेव नियंत्रित हो जाता है। बिन्दु की चंचलता के नाश से प्राण और मन दोनों की चंचलता भी समाप्त हो जाता है। इसके साथ ही कुंडलिनी जागृत हो जाती है। यह उद्बुध कुण्डलिनी जब लिंगत्रय को भेदती हुई सहस्रार तक पहुंच जाती है तो योगी को मोक्ष मिल जाता है।

शुक्र की इस ऊर्ध्व गति को भी कालाग्निरुद्र कहते हैं, जबकि कालाग्नि शुक्र की अधोगति को कहते हैं। शुक्र के अधिगमन के देवता को भी कालाग्नि कहा जाता है।

कालाग्नि के प्रभाव में ही व्यक्ति को सिद्धियां और मोक्ष नहीं प्राप्त हो पातीं। कालाग्निरुद्र के प्रभाव से व्यक्ति सिद्धियों की प्राप्ति भी करता है मोक्ष की भी।


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