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कारिका

कारिका दर्शनशास्त्र, व्याकरण, साहित्य आदि विषयों में लिखे गये उन श्लोकों को कहा जाता है जिनमें थोड़े से ही शब्दों में बहुत से शास्त्रार्थ व्यक्त कर दिये जाते हैं। छन्दोबद्धता के कारण ये स्मरणीय हो जाते हैं तथा सूत्र के रूप में अनेक बातों को एक साथ कहने की इसमें सुविधा होती है।

इस प्रकार कारिकाओं में लिखे गये साहित्य को कारिका साहित्य कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में तो इसका विशाल भंडार है, जो अत्यन्त गंभीर और महत्वपूर्ण है।

नागार्जुन की माध्यमिक कारिकाएं कारिका शैली में लिखी प्राचीनतम रचनाएं हैं जो द्वितीय शताब्दी के उत्तरार्ध की हैं। यही कारण है कि उन्हें इस शैली का प्रवर्तक कहा जाता है। परन्तु मौलिक कारिकाएं तो नागार्जुन की कारिकाओं से भी प्राचीन हैं।

नागार्जुन की कारिकाओं में मुख्यतः शून्यवाद का प्रतिपादन किया गया है। उनकी युक्तिषष्ठिका तथा विग्रहव्यावर्तिनी या शून्यतासप्तति नामक कृतियां भी कारिका शैली में ही हैं।

नाट्यशास्त्र में भरत मुनि के सूत्र, जो भरतसूत्र के रूप में विख्यात हैं, भी कारिका शैली में ही हैं।

सांख्य दर्शन पर ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका दूसरी या तीसरी शताब्दी की हैं।

व्याकरण पर भर्तृहरि की कारिकाएं, साहित्य पर मम्मट की 143 कारिकाएं, न्यायशास्त्र पर विश्वनाथ की न्यायपंचानन की कारिकावली आदि कारिका साहित्य विख्यात हैं।


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