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काया


काया का सामान्य अर्थ है शरीर। यही काया माध्यम है जिसके सहारे मनुष्य इस संसार में श्रेष्ठतम को पाने का प्रयत्न करता है। यही साधन है सभी साध्यों का। योगियों एवं साधकों ने इसे साधना में बहुत महत्व दिया है। इसे मलावरणमुक्त शुद्ध और सहज निरंजन रुप में रखना ही साधना के मूल में है और इसके हासिल हो जाने की अवस्था में मनुष्य महासुख की अनुभूति करता है।

महायानी आचार्चों के अनुसार काया तीन प्रकार के हैं - निर्माण-काया, सम्भोग-काया, तथा धर्म-काया। इसे ही त्रिकाय सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किया गया है। इसके माध्यम से भगवान बुद्ध के दिव्य रूप की परम्परा प्रारम्भ की गयी थी। भगवान बुद्ध की इन तीन कायाओं के मूल में तीन धातुओं - रूपधातु, काम-धातु तथा धर्म-धातु की परिकल्पना की गयी तथा इन्हीं से क्रमशः निर्माण-काया, सम्भोग-काया, तथा धर्म-काया का सृजन बताया गया।

निर्माण-काया में बुद्ध मनुष्य रूप धारण करते हैं तथा उसी तरह जीवनयापन करते हैं जिस तरह संसार में लोग करते हैं। सम्भोग-काया में भगवान बुद्ध का स्वरूप बोधिसत्व का हो जाता है जिसमें आनन्द और करुणा की प्रधानता होती है। धर्म-काया में वह तीनों लोकों में स्वयं को सभी आवासों, क्लेशों, और संस्कार से मुक्त आनादि, अनन्त, अजर, अमर तथा अपरिवर्तनशील रूप में अभिव्यक्त करते हैं।

सिद्धों के प्रज्ञोपाय सिद्धान्त में चार काया की चर्चा है - निर्माण-काया, सम्भोग-काया, धर्म-काया, तथा वज्र-काया। वज्र-काया को स्वभाव-काया, सह-काया, या महासुख-काया भी कहा जाता है। उनके अनुसार मनुष्य चार कायाओं का धारण कर सकता है। निर्माण-काया में वह सांसारिकता के अनुरूप व्यवहार करता है। सम्भोग-काया में वह आनन्द या करुणा में रहता है। धर्म-काया में वह धर्म करता है। चौथी वज्र-काया को सहज-काया बताया गया है जो द्वयता तथा क्लेशादि मलावरण से मुक्त निरंजन है, जो निरावृत्त, शुद्ध, तथा सहजरूप है।