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कहानी

कहानी साहित्य की एक विधा है जिसमें गद्य का उपयोग किया जाता है। वैसे तो कहानी का शाब्दिक अर्थ कथा होता है, परन्तु आकार में जो छोटी कथा होती है उसे ही हिन्दी साहित्य में कहानी कहा जाता है। चूंकि यह अंग्रेजी में पहले से ही प्रचलित 'शॉर्ट स्टोरी' की विधा से पहले बंगला में गल्प के रूप में और बाद में हिन्दी में कहानी के रूप में आया, इसलिए इसे 'लघु कथा', जो 'शॉर्ट स्टोरी' का हिन्दी अनुवाद के अर्थ में ही आया, ही कहना उपयुक्त माना जाता है। अर्थात् कहानी एक लघु कथा है। यदि इसका आकार बड़ा हो जाये तो वह लघु न रहकर कथा या स्टोरी हो जायेगी, तथा कहानी या शॉर्ट स्टोरी नहीं रह जायेगी। हिन्दी कथा साहित्य के अन्य बड़े रूप हैं उपन्यास या उपन्यासिका। संक्षेप में कहानी गद्य साहित्य का एक छोटा, अत्यंत सुसंघटित और अपने आप में परिपूर्ण कथारूप है।

कहानी या लघु कथा केवल आकार में छोटी होती है परन्तु इसमें कथा के सभी तत्व विद्यमान रहते हैं। कथ्य या कथावस्तु, कथानक, पात्र, देश-काल, परिस्थितियां आदि सभी इसमें पाये जाते हैं। इसके शिल्प विधान में एकता होती है। इसमें न केवल जीवन का वर्णन होता है बल्कि उसकी व्याख्या भी होती है, व्यापक मानवीय सत्यों का अन्वेषण या उद्घाटन होता है। यह जीवन की व्याख्या करते हुए उसे सार्थकता प्रदान करती है और उसका दिशा-निर्देश भी करती है। इसमें अत्यन्त छोटे रूप में जीवन का एक सुसंघटित और अपने आप में पूर्ण चित्रण किया जाता है। कहानी साहित्य का सबसे स्वाभाविक और सबसे अधिक स्वच्छन्द रूप है।

कहानी, जिसमें 2500 से 10000 तक शब्द होते हैं, स्वयं में एक लघु कथा है। परन्तु कई लोग 'छोटी कहानी' शब्दावली का प्रयोग करते हैं जिसका अर्थ होगा एक छोटी लघु कथा। इस प्रकार छोटी लघु कथा या छोटी कहानी वह है जिसमें 2500 से भी कम शब्द होते हैं। परन्तु यदि 10000 से अधिक शब्द हुए तो उसे बड़ी कहानी अर्थात् बड़ी लघु कथा मान जाता है। 20000 से अधिक शब्दों वाली कहानी लघु उपन्यास या उपन्यासिका का रूप ग्रहण कर लेते है। वैसे शब्द संख्या का यह कोई नियम नहीं है परन्तु ऐसी मान्यता प्रचलित हो गयी है।

कथा की परम्परा अत्यंत प्राचीन है परन्तु हिन्दी साहित्य में एक विधा के रूप में कहानी जिस अर्थ में आया है उसका इतिहास उन्नीसवीं शताब्दी से प्रारम्भ होता है। विश्व साहित्य और परम्पराओं में कथा की परम्परा भी बहुत पुरानी है, परन्तु एक अलग विधा के रूप में कहानी या शॉर्ट स्टोरी का उदय तो उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में यूरोप में ही हुआ। इसका कारण था समाचार पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन सुलभ होना, तथा पाठकों को आकर्षित करने के लिए शॉर्ट स्टोरी लिखवाया जाना।

कहानी का यह स्वरूप जर्मनी, इंगलैंड, रूस, तथा फ्रांस में सबसे पहले प्रकट हुआ। पहले कहानियां समाचार पत्र-पत्रिकाओं में छपीं और बाद में उनका संकलन प्रकाशित हुआ। इस प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों में ही कहानी की यह नयी विधा स्थापित हो गयी। परन्तु सम्पूर्ण यूरोप में इस विधा को पूर्ण स्वीकृति 1830-40 के दौरान मिली।

उदाहरण के लिए, जर्मनी में ई टी डब्ल्यू हॉफमैन की कहानियां 1814 से 1821 के बीच प्रकाशित हुईं, जेकब और विल्हम ग्रिम की परी कथाएं और पौराणिक कथाएं 1812 से 1815 के बीच प्रकाशित हुईं, जॉन लुडविग टीक की कहानियां भी इसी दौर में छपीं। इंगलैंड में रह रहे अमेरिकी लेखक वाशिंगटन इर्विंग की स्केच बुक 1819-20 में प्रकाशित हुई। नैथनील हॉथॉर्न तथा एडगर एलन पो की कहानियां भी इस दौर में लोकप्रिय हुईं। रूस में एलेक्जेण्डर पुश्किन और निकोलाई की कहानियां 1831 के बाद की हैं। फ्रांस में प्रॉस्पर मेरिमी का कहानी संग्रह 1829 में प्रकाशित हुआ। थियोफिल गौतिए तथा बालजाक की कहानियां 1830 से आनी शुरु हुईं।

कहानी के भेद

कहानी के तत्वों की दृष्टि से कहानी के चार भेद हैं - कथानक या घटना प्रधान कहानी, चरित्र प्रधान कहानी, वातावरण प्रधान कहानी और भाव प्रधान कहानी।

इन भेदों के अन्तर्गत अनेक अन्य विभाजन भी किये गये हैं, जैसे ऐतिहासिक कहानी, सामाजिक कहानी, मनोवैज्ञानिक कहानी, मनोविश्लेषणात्मक कहानी, साहसिक कहानी, रोमांटिक कहानी, जासूसी कहानी आदि।

कहानी की शैली के भेद

शैली या शिल्प विधान के दृष्टिकोण से भी कहानियों के अनेक भेद पाये जाते हैं। भाषापक्ष के दृष्टिकोण से मुख्य धारा की कहानी, आंचलिक कहानी आदि का भेद किया जाता है और रूप विधान के दृष्टिकोण से ऐतिहासिक शैली, वर्णनात्मक शैली, आत्मकथात्मक शैली, उत्तमपुरुषात्मक शैली, पत्रात्मक शैली, तथा डायरी शैली आदि का भेद मिलता है।


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