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कवि समय

कवि समय का अर्थ है कवि समाज में प्राचीन काल से ही मान्य परम्पराएं तथा परिपाटियां। राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में कवि समय को परिभाषित करते हुए कहा कि परम्परा से चली आती हुई जिन अशास्त्रीय एवं अलौकिक बातों का कवि वर्णन करते हैं उन्हें कवि समय कहते हैं।

उदाहरण के लिए, पूर्व के कवियों के वर्णन उसी रूप में आज उपलब्ध न होने पर भी जब कोई कवि वैसा ही वर्णन करता है तो ऐसा करना कवि समय हुआ। कवि समय के उपयोग को दोष नहीं माना जाता। इसके उपयोग को लेकर राजशेखर सचेत करते हुए कहते हैं कि कुछ कवि समय तो पूर्व परम्परा से प्रतिष्ठित हैं परन्तु कुछ को धूर्तों ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए चला दिया है।

राजशेखर का यह कवि समय उनके पूर्व हुए वामन के काव्य समय से भिन्न है। काव्य समय में व्याकरण, छन्द एवं लिंग से सम्बंधित परम्परा ही आती है।

कवि समय के तीन भाग हैं - स्वर्ग्य, पातालीय तथा भौम। स्वर्ग्य में स्वर्गलोक, देवाताओं आदि से सम्बंधित बातें आती हैं। पातालीय में पाताल लोग के सम्बंधित बातें आती हैं तथा भौम में पृथ्वी लोक से सम्बंधित बातें आती है।

भौम कवि समय के चार भेद हैं - जातिरूप, द्रव्यरूप, क्रियारूप तथा गुणरूप। इनके भी तीन-तीन भेद किये गये हैं - असत्, सत् और नियम। ये सब मिलाकर भौम कवि समय के 12 रूप हुए।


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