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कर्म

मनुष्य जो कुछ भी करता है वह उसके कर्म हैं। कर्म का यही सामान्य अर्थ है। व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक कर्म करने के लिए विवश है। सोना, जागना, खाना, पीना आदि सभी कर्म ही तो हैं। इस अर्थ में अकर्म, निष्कर्म, विकर्म, सुकर्म, कुकर्म आदि सभी कर्म ही हो गये। प्रयेक कर्म का कोई न कोई कारण होता है और प्रत्येक कर्म का कोई न कोई फल होता है। अच्छे कर्मों के अच्छे फल होते हैं तथा बुरे कर्मों के बुरे फल होते हैं। अर्थात् कर्म उसके कारण और फल के बीच की कड़ी है और इस प्रकार कर्मबंधन का सृजन होता है। कारण-कर्म-फल का चक्र बन जाता है।

अध्यात्म में इसी कर्मबंधन से मुक्ति को मोक्ष कहा जाता है।

मनुस्मृति में कर्म तीन प्रकार के बताये गये हैं - कायिक, वाचिक तथा मानसिक। इसमें भी उत्तम, मध्यम तथा अधम तीन-तीन भेद हैं।

हिन्दू या सनातन धर्म में काल के आधार पर कर्म तीन प्रकार के बताये गये हैं - संचित (जो कर्म किया जा चुका), प्रारब्ध (पूर्वकृत कर्म का जो फल भोगा जाता है), तथा क्रियमाण (जो कर्म वर्तमान में किये जा रहे हैं)।

कर्म के तीन प्रकार के फल होते हैं - अच्छे, बुरे तथा मिश्रित। परन्तु श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार जब कर्म को ज्ञान की अग्नि में तपाकर योगस्थ कर दिया जाता है तो कर्मबंधन का अनन्त काल तक चलने वाला चक्र टूट जाता है और व्यक्ति इससे मुक्त हो जाता है। इसलिए उसमें श्रीकृष्ण अर्जुन से 'ज्ञानदग्ध कुरु कर्माणि' तथा 'योगस्थ कुरु कर्माणि' का निर्देश करते हैं।


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